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February, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दहेज लोभियों को सबक

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मंडप भी सजा ,शहनाई बजी ,
आई वहां बारात भी , मेहँदी भी रची ,ढोलक भी बजी , फिर भी लुट गए अरमान सभी . समधी बात मेरी सुन लो ,अपने कानों को खोल के , होगी जयमाल ,होंगे फेरे ,जब दोगे तिजोरी खोल के . आंसू भी बहे ,पैर भी पकड़े , पर दिल पत्थर था समधी का , पगड़ी भी रख दी पैरों में , पर दिल न पिघला समधी का . सुन लो समधी ये भावुकता ,विचलित न मुझे कर पायेगी , बेटे पर खर्च जो मैंने किया ,ये मुझको न दे पायेगी . देख पिता की हालत को , बेटी का घूंघट उतर गया . सम्मान जिन्हें कल देना था , उनसे ही माथा ठन गया . सुन लो बाबूजी बात मेरी ,अब खुद की खैर मना लो तुम , पकड़ेगी पुलिस तुम्हें आकर ,खुद को खूब बचा लो तुम . सुनते ही नाम पुलिस का वे , कुछ घबराये ,कुछ सकुचाये , फिर माफ़ी मांग के जोड़े हाथ , बोले रस्मे पूरी की जाएँ . पर बेटी दिल की पक्की थी ,बाबूजी से अड़कर बोली , अब शादी न ये होगी कभी ,बोलो चाहे मीठी बोली . ए लड़की !बोलो मुँह संभाल , तू लड़की है ,कमज़ोर है , हम कर रहे बर्ताव शरीफ , समझी तू शायद और है . बेटी से ऐसी भाषा पर ,बाप का क्रोध भी उबल पड़ा , समधी को पकड़ के  खुद ही पुलिस में  देने चल पड़ा . आ गयी पुलिस , ले गयी पकड़ , लालच के …

शहंशाही मर्दों की ,क़ुबूल की है कुदरत ने ,

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तखल्लुस कह नहीं सकते ,तखैयुल कर नहीं सकते ,

तकब्बुर में घिरे ऐसे ,तकल्लुफ कर नहीं सकते .

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मुसन्निफ़ बनने की सुनकर ,बेगम मुस्कुराती हैं ,

मुसद्दस लिखने में मुश्किल हमें भी खूब आती है ,

महफ़िलें सुन मेरी ग़ज़लें ,मुसाफिरी पर जाती हैं ,

मसर्रत देख हाल-ए-दिल ,मुख्तलिफ ही हो जाती है .

मुकद्दर में है जो लिखा,पलट हम कर नहीं सकते ,

यूँ खाली पेट फिर-फिर कर तखल्लुस कह नहीं सकते .

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ज़बान पर अवाम की ,मेरे अशआर चढ़ जाएँ ,

मुक़र्रर हर मुखम्मस पर ,सुने जो मुहं से कह जाये ,

मुखालिफ भी हमें सुनने ,भरे उल्फत चले आयें ,

उलाहना न देकर बेगम ,हमारी कायल हो जाएँ .

नक़ल से ऐसी काबिलियत हैं खुद में भर नहीं सकते ,

यूँ सारी रात जग-जगकर तखैयुल कर नहीं सकते .

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शहंशाही मर्दों की ,क़ुबूल की है कुदरत ने ,

सल्तनत कायम रखने की भरी हिम्मत हुकूमत ने ,

हुकुम की मेरे अनदेखी ,कभी न की हकीकत ने ,

बनाया है मुझे राजा ,यहाँ मेरी तबीयत ने .

तरबियत ऐसी कि मूंछे नीची कर नहीं सकते ,

तकब्बुर में घिरे ऐसे कभी भी झुक नहीं सकते .

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मुह…

धर्म का.. दिया बुझाके चल दिये.

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     कविवर गोपाल दास ''नीरज''ने कहा है -
  ''जितनी देखी दुनिया सबकी दुल्हन देखी ताले में
   कोई कैद पड़ा मस्जिद में ,कोई बंद शिवाले में ,
    किसको अपना हाथ थमा दूं किसको अपना मन दे दूँ ,
   कोई लूटे अंधियारे में ,कोई ठगे उजाले में .''
धर्म के   ये ही दो रूप हमें भी दृष्टिगोचर होते हैं .कोई धर्म के पीछे अँधा है तो किसी के लिए धर्म मात्र दिखावा बनकर रह गया है .धर्म के नाम पर सम्मेलनों की ,विवादों की ,शोर-शराबे की संख्या तो दिन-प्रतिदिन तेजी से बढती जा रही है लेकिन जो धर्म का मर्म है उसे एक ओर रख दिया गया है .आज जहाँ देखिये कथा वाचक कहीं भगवतगीता ,कहीं रामायण बांचते नज़र आयेंगे ,महिलाओं के सत्संगी संगठन नज़र आएंगे .विभिन्न समितियां कथा समिति आदि नज़र आएँगी लेकिन यदि आप इन धार्मिक समारोहों में कथित सौभाग्य से  सम्मिलित होते हैं तो ये आपको पुरुषों का  बड़े अधिकारियों, नेताओं से जुड़ने का बहाना ,महिलाओं का एक दूसरे की चुगली करने का बहाना  ही नज़र आएगा .
     दो धर्म विशेष ऐसे जिनमे एक में संगीत पर पाबन्दी है तो गौर फरमाएं तो सर्वाधिक कव्वाली,ग़ज़ल गायक आपको उसी धर्म विशेष …

तेजाबी गुलाब है मीडिया का वैलेनटाइन

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  ''गूंजे कहीं शंख कहीं पे अजान है ,
  बाइबिल है ,ग्रन्थ साहब है,गीता का ज्ञान है ,
दुनिया में कहीं और ये मंजर नहीं नसीब ,
  दिखलाओ ज़माने को ये हिंदुस्तान है .''
 ऐसे हिंदुस्तान में जहाँ आने वाली  पीढ़ी के लिए आदर्शों की स्थापना और प्रेरणा यहाँ के मीडिया का पुनीत उद्देश्य हुआ करता था .स्वतंत्रता संग्राम के समय मीडिया के माध्यम से ही हमारे क्रांतिकारियों ने देश की जनता में क्रांति का बिगुल फूंका था .आज जिस दिशा में कार्य कर रहा  हैं वह कहीं से भी हमारी युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक व् प्रेरक नहीं कहा जा सकता .आज १४ फरवरी वेलेंटाइन डे के नाम से विख्यात है .एक तरफ जहाँ इस दिन को लेकर युवाओं के दिलों की धडकनें तेज़ हो रही हैं वहीँ दूसरी ओर लाठियां और गोलियां भी चल रही हैं और इस काम में बढ़ावा दे  रहा है हमारा मीडिया -आज का मीडिया .
     जहाँ एक ओर मीडिया की सुर्खियाँ हुआ करती थी -
''जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमे रसधार नहीं ,
 वह ह्रदय नहीं है पत्थर है जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं .''

''पूछा उसने क्या नाम बता ?
  आज़ाद !पिता को क्या कहते ?
  स्वाधीन पिता का नाम ,…

प्यार से भी मसलों का हल निकलता है.

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"  प्यार है पवित्र पुंज ,प्यार पुण्य धाम है.

पुण्य धाम जिसमे कि राधिका है श्याम  है .

श्याम की मुरलिया की हर गूँज प्यार है.

प्यार कर्म प्यार धर्म प्यार प्रभु नाम है."

एक तरफ प्यार को "देवल आशीष"की उपरोक्त पंक्तियों से विभूषित किया जाता है तो एक तरफ प्यार को "बेकार बेदाम की चीज़ है"जैसे शब्दों से बदनाम किया जाता है.कोई कहता है जिसने जीवन में प्यार नहीं किया उसने क्या किया?प्यार के कई आयाम हैं जिसकी परतों में कई अंतर कथाएं    छिपी हैं .प्रेम विषयक दो विरोधी मान्यताएं हैं-एक मान्यता के अनुसार यह व्यर्थ चीज़ है तो एक के अनुसार यह  जीवन में सब कुछ है .पहली मान्यता को यदि देखा जाये तो वह भौतिकवाद  से जुडी है .जमाना कहता है कि लोग प्यार की अपेक्षा दौलत को अधिक महत्व देते हैं लेकिन यदि कुछ नए शोधों पर ध्यान दें तो प्यार का जीवन में स्थान केवल आकर्षण तक ही सीमित  नहीं है वरन प्यार का जीवन में कई द्रष्टिकोण  से महत्व है .न्यू   हेम्पशायर विश्व विध्यालय के प्रोफ़ेसर एडवर्ड लीमे और उनके येल विश्व विध्यालय के साथियों ने शोध में पाया कि जिन लोगों को दुनिया में बहुत प…

भावुक सहनशील नारी शक्ति स्वरूप

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ये सर्वमान्य तथ्य है कि महिला शक्ति का स्वरुप है और वह अपनों के लिए जान की बाज़ी  लगा भी देती है और दुश्मन की जान ले भी लेती है.नारी को अबला कहा जाता है .कोई कोई तो इसे बला भी कहता है  किन्तु यदि सकारात्मक रूप से विचार करें तो नारी इस स्रष्टि की वह रचना है जो शक्ति का साक्षात् अवतार है.धेर्य ,सहनशीलता की प्रतिमा है.जिसने माँ दुर्गा के रूप में अवतार ले देवताओं को त्रास देने वाले राक्षसों का संहार किया तो माता सीता के रूप में अवतार ले भगवान राम के इस लोक में आगमन के उद्देश्य को  साकार किया और पग-पग पर बाधाओं से निबटने में छाया रूप  उनकी सहायता की.भगवान विष्णु को अमृत देवताओं को ही देने के लिए और भगवान् भोलेनाथ  को भस्मासुर से बचाने के लिए नारी के ही रूप में आना पड़ा और मोहिनी स्वरुप धारण कर उन्हें विपदा से छुड़ाना पड़ा.    हमारे संस्कृत ग्रंथों में कहा गया है - "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवता."        प्राचीन काल  का इतिहास नारी की गौरवमयी  कीर्ति से भरा पड़ा है.महिलाओं ने समय समय पर अपने साहस पूर्ण कार्यों से दुश्मनों के दांत खट्टे किये हैं.प्राचीन काल में स्त्रियों…

उफ ये समाज और बेटियाँ

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समाज की बलि चढ़ती बेटियां

'साहब !मैं तो अपनी बेटी को घर ले आता लेकिन यही सोचकर नहीं लाया कि समाज में मेरी हंसी उड़ेगी और उसका ही यह परिणाम हुआ कि आज मुझे बेटी की लाश को ले जाना पड़ रहा है .'' केवल राकेश ही नहीं बल्कि अधिकांश वे मामले दहेज़ हत्या के हैं उनमे यही स्थिति है दहेज़ के दानव पहले लड़की को प्रताड़ित करते हैं उसे अपने मायके से कुछ लाने को विवश करते हैं और ऐसे मे बहुत सी बार जब नाकामी की स्थिति आती है तब या तो लड़की की हत्या कर दी जाती है या वह स्वयं अपने को ससुराल व् मायके दोनों तरफ से बेसहारा समझ आत्महत्या कर लेती है .
   सवाल ये है कि ऐसी स्थिति का सबसे बड़ा दोषी किसे ठहराया जाये ? ससुराल वालों को या मायके वालों को ....जहाँ एक तरफ मायके वालों को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता होती है वहां ससुराल वालों को ऐसी चिंता क्यूं नहीं होती ?
   इस पर यदि हम साफ तौर पर ध्यान दें तो यहाँ ऐसी स्थिति का एक मात्र दोषी हमारा समाज है जो ''जिसकी लाठी उसकी भैंस '' का ही अनुसरण करता है और चूंकि लड़की वाले की स्थिति कमजोर मानी जाती है तो उसे ही दोषी ठहराने से बाज नह…