सोमवार, 24 अप्रैल 2017

क्या आदमी सच में आदमी है ?


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''आदमी '' प्रकृति की सर्वोत्कृष्ट कृति है .आदमी को इंसान भी कहते हैं , मानव भी कहते हैं ,इसी कारण आदमी में इंसानियत , मानवता जैसे भाव प्रचुर मात्र में भरे हैं ,ऐसा कहा जाता है किन्तु आदमी का एक दूसरा पहलु भी है और वह है इसका अन्याय अत्याचार जैसी बुराइयों से गहरा नाता होना .कहते हैं सृष्टि के आरम्भ में आदमी वानर था , वानर अर्थात पशु , सभी ने ये फ़िल्मी गाना सुना ही होगा -
'' आदमी है क्या बोलो आदमी है क्या -आदमी है बन्दर -जूते उठाके भागे कपडे चुराके भागे .....''
और धीरे धीरे सभ्यता विकसित हुई और वह पशु से आदमी बनता गया किन्तु जैसे कि एक पंजाबी कहावत है -
'' वादडिया सुजादडिया जप शरीरा  नाल .''
अर्थात बचपन की लगी आदतें शरीर के साथ-साथ जाती हैं ,ठीक वैसे ही जो ये सभ्यता का आरम्भकाल मानव जीवन का आरम्भकाल है अर्थात बचपन के समान है ,उसमे पशु होने के कारण वह आज तक भी उस प्रवृति अर्थात पशु प्रवृति से मुक्त नहीं होने पाया है और पशु प्रवृति के लिए ही कहा गया है -
''यही पशु प्रवृति है कि आप आप ही चरे .''
और इसी प्रवृति के अधीन मनुष्य भी केवल अपने अपने लिए ही जीता नज़र आता है .
हम सभी जानते हैं कि आदमी में दिमाग होता है ..दिमाग वैसे सभी में होता है, देवी सप्तशती भी यही कहती है किन्तु आदमी के अनुसार केवल आदमी में दिमाग होता है और यह मानना भी पड़ता है क्योंकि सृष्टि में मौजूद प्रत्येक वस्तु,जीव -जंतु ,जड़ी-बूटी आदि सभी व्यर्थ हैं यदि आदमी अपने दिमाग का इस्तेमाल कर इन्हें सही दिशा में प्रयोग न करे और वह इनका प्रयोग करता है किन्तु जहाँ तक दिशा की बात है अपने अपने दिमाग के अनुसार वह इनका सही व् गलत दिशा में इस्तेमाल करता है ,सही व् गलत तरह से इस्तेमाल करता है .
आमतौर पर देखा जाता है कि कस्बों व् गावों में आज तक भी यांत्रिक सुविधाओं की आधुनिक प्रणाली का इस्तेमाल न के बराबर है .यहाँ आज तक भी ढोहा-ढाही के लिए झोटा-बुग्गी का इस्तेमाल किया जाता है .आज सुबह की ही बात है घर के सामने से एक झोटा बुग्गी में ईंटें लादकर ले जाई जा रही थी कि अचानक सड़क पर झोटा गिर पड़ा [भैंस के नर को झोटा कहते हैं ] उसके गिरने से ईंटें भी गिर पड़ी तो शोरगुल सुनकर हमारा ध्यान उधर गया ,देखा मिलजुलकर लोगों ने उसे उठाया और ईंटें भरकर पुनः चलने की तैयारी की ,वह एक ही कदम आगे बढ़ा होगा कि पुनः गिर गया ,आते जाते एक महोदय ने कहा भी कि इस झोटे में दम ही कहाँ है हड्डी-हड्डी चमक रही है पर इन पैसों के अंधों को न दिखता है न सुनता है .साफ दिखाई दे रहा था कि झोटा कमजोर है उसका एक पैर जमीन पर ठीक नहीं रखा जा रहा है तब भी उन्होंने पुनः उसे खड़ा किया ईंटें लादी और फिर चलने की कोशिश की , वह लड़खड़ा ही रहा था कि किसी तरह लोगों ने संभाला और फिर उसे निकालकर , बुग्गी खड़ीकर उसे कहीं ले गए .ये है इंसानियत जो तब जागी जब बार बार ईंटों के गिरने के कारण अपने पेट पर ही लात लगने की सम्भावना बन आई .
ऐसे ही एक और इंसान हैं जिनके पास गाड़ी है और जिनका कहना है कि मेरी गाड़ी के आगे आकर आज तक कोई कुत्ता नहीं बचा क्योंकि भाईसाहब !अगर इन्हें बचाऊंगा तो मैं नहीं मर जाऊंगा क्या ? ये है मानवता जो निरीह जीव-जंतु को कुचल डालने पर कांपती नहीं .
लोग कबूतर को पिंजरे में कैद रखते हैं और उन्हें ऐसा कर कैदी समान बनाते हैं कि बस एक निश्चित दूरी तक उड़कर वापस वे उनके पिंजरों में बैठ जाते हैं ये क्या है ? मात्र एक शौक उन्हें कैदी बनाने का .आज गाय काटकर मारी जा रही है .गाय की बछिया उससे चुराकर मारी जा रही है या बेचीं जा रही है .खतरनाक से खतरनाक जानवर को सर्कस में खिलौनों की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है और यह सब करने के बावजूद इंसान अपने को प्रकृति की सर्वोत्कृष्ट कृति होने का दम भर रहा है जबकि वास्तविकता यह है कि जहाँ भी इंसान की चल रही है वहां अन्याय , अत्याचार की तस्वीरें दिखाई पड़ रही हैं .भले ही वह नर रूप में नारी पर अन्याय कर रहा हो या मानव बनकर पशुओं पर ,अपनी तरफ से वह अन्याय अत्याचार की हदें पर ही कर रहा है जो सभ्यता के आरम्भ से आज तक पशुवत कर्म ही कहे जा सकते हैं फिर वह इंसान बना कहाँ वह तो आज भी पशु ही है -
''नर बनकर यह नारी का कर रहा काम तमाम ,
इंसान बनकर पशुओं को दे वीभत्स अंजाम ,
क्रूरता की सीमायें पार कर रहा सारी
इसके कर्म से मानव जाति हो रही है बदनाम .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

बेटी की...... मां ?



बेटी पैदा होने पर चार साल से सह रही पति की प्रताड़ना
बेटी का जन्म पर चाहे आज से सदियों पुरानी बात हो या अभी हाल-फ़िलहाल की ,कोई ही चेहरा होता होगा जो ख़ुशी में सराबोर नज़र आता होगा ,लगभग जितने भी लोग बेटी के जन्म पर उपस्थित होते हैं सभी के चेहरे पर मुर्दनी सी ही छा जाती है.सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि बेटी का जन्म सुनकर उसे जन्म देने वाली माँ भी ख़ुशी के पल से दूर नज़र आती है और मर्दों के इस समाज द्वारा यह ठीकरा माता उर्फ़ नारी के सिर पर ही फोड़ दिया जाता है कि माँ स्वयं नारी होकर भी बेटी अर्थात नारी का जन्म नहीं चाहती इसी से यह साबित होता है कि नारी ही नारी की सबसे बड़ी दुश्मन है अब नारी नारी की दुश्मन कैसे है यह मुद्दा तो बहुत लम्बे विचार-विमर्श का है किन्तु माँ स्वयं नारी होकर बेटी अर्थात नारी का जन्म क्यों नहीं चाहती यह मुद्दा अभी की ही एक घटना प्रत्यक्ष रूप में साबित करने हेतु पर्याप्त है -
[शर्मनाक: बेटी पैदा हुई तो पत्नी को निर्वस्त्र कर छत पर घुमाया-अमर उजाला से साभार ]
एक तरफ केंद्र सरकार देश में बेटी बचाओ अभियान चला रही है, तो दूसरी तरफ एक मां के लिए बेटी पैदा करना अभिशाप बन गया। इसके लिए वह पिछले चार साल से पति की प्रताड़ना सह रही है।
हद तब हो गई जब पति ने महिला को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया। यही नहीं, महिला को पति ने छत पर धूप में निर्वस्त्र घूमाया। इससे महिला बेहोश हो गई। होश में आने पर किसी तरह से उसने अपनी बहन को फोन किया और आपबीती बताई।
इसके बाद महिला की बहन लक्ष्मी ने पुलिस को सूचना दी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। यहां तक कि महिला सेल में भी शिकायत दर्ज नहीं की गई। सुनवाई नहीं होने पर महिला की बहन ने एसएसपी से शिकायत की। इसके बाद बाड़ी ब्राह्मणा पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया।
[पति की प्रताड़ना से उसके दो बच्चों की मौत हो चुकी--महिला को उपचार के लिए मेडिकल कालेज अस्पताल में भर्ती कराया गया है। घायल सुमन कुमारी बिश्नाह के पल्ली मोड़ की रहने वाली है। उसने बताया कि उसका पति राकेश कई सालों से मारपीट रहा है। उनकी चार साल की बेटी है।
इसके लिए ही उसे पिछले चार साल से प्रताडि़त किया जा रहा है। पिछले कुछ दिनों से पति का अत्याचार बढ़ गया। उसके सिर पर पत्थर से मारा और लहूलुहान कर दिया। पति जुआ खेलता है और शराब पीकर तंग करता है। उसने बैंक का कर्ज चुकाने के लिए मारना शुरू कर दिया है।
महिला की बहन लक्ष्मी ने बताया कि वह शिकायत लेकर बाड़ी ब्राह्मणा पुलिस स्टेशन और महिला सेल जम्मू में गई थी, लेकिन कहीं पर मामला दर्ज नहीं किया गया। इसके बाद एसएसपी से गुहार लगाने पहुंची, तब जाकर मामला दर्ज किया गया।
घायल महिला ने यह भी बताया कि पति की प्रताड़ना से उसके दो बच्चों की मौत हो चुकी है। अब वह दूसरी बच्ची को भी मारना चाहता है। एसएचओ बाड़ी ब्राह्मणा भरत शर्मा का कहना है कि आरोपी पति के खिलाफ 498 ए के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है। आरोपी अभी गिरफ्त से बाहर है।]
बेटी का जन्म और इस तरह के अत्याचार माँ अपने पर तो सहकर भी बर्दाश्त कर सकती है किन्तु वह जानती है कि यह अत्याचार मात्र यहीं तक रुकने वाला नहीं है इसका सामना उसकी बेटी को पहले अपने पिता के घर में और फिर अपनी ससुराल में उसी की तरह करना पड़ेगा इसलिए वह नहीं चाहती कि उसकी कोख से कोई भी बेटी जन्म ले और उसी की तरह दुःख सहे.अब यह निश्चित करना हम सभी का काम है कि क्या वास्तव में माँ अपनी बेटी की उसी तरह दुश्मन है जैसे नारी नारी की या फिर उसे इस पुरुष सत्तात्मक समाज ने ऐसा बनने को मजबूर कर दिया है ?
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

नारी क्यूं बनती है बेचारी


       दुष्कर्म आज ही नहीं सदियों से नारी जीवन के लिए त्रासदी रहा है .कभी इक्का-दुक्का ही सुनाई पड़ने वाली ये घटनाएँ आज सूचना-संचार क्रांति के कारण एक सुनामी की तरह नज़र आ रही हैं और नारी जीवन पर बरपाये कहर का वास्तविक परिदृश्य दिखा रही हैं .
भारतीय दंड सहिंता में दुष्कर्म ये है -
भारतीय दंड संहिता १८६० का अध्याय १६ का उप-अध्याय ''यौन अपराध ''से सम्बंधित है जिसमे धारा ३७५ कहती है-
Central Government Act
Section 375 in The Indian Penal Code, 1860
375. Rape.-- A man is said to commit" rape" who, except in the case hereinafter excepted, has sexual intercourse with a woman under circumstances falling under any of the six following descriptions:-
First.- Against her will.
Secondly.- Without her consent.
Thirdly.- With her consent, when her consent has been obtained by putting her or any person in whom she is interested in fear of death or of hurt.
Fourthly.- With her consent, when the man knows that he is not her husband, and that her consent is given because she believes that he is another man to whom she is or believes herself to be lawfully married.
Fifthly.- With her consent, when, at the time of giving such consent, by reason of unsoundness of mind or intoxication or the administration by him personally or through another of any stupefying or unwholesome substance, she is unable to understand the nature and consequences of that to which she gives consent.
Sixthly.- With or without her consent, when she is under sixteen years of age.
Explanation.- Penetration is sufficient to constitute the sexual intercourse necessary to the offence of rape.
Exception.- Sexual intercourse by a man with his own wife, the wife not being under fifteen years of age, is not rape.
      ये आंकड़े इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि आज ये घटनाएँ किस कदर नारी जीवन को गहरे अंधकार में धकेल रही हैं -
     अश्लीलता का असर -
राज्य                २०१२              २०१३
आंध्र प्रदेश          २८                  २३४
केरल                 १४७                १७७
उत्तर प्रदेश         २६                  १५९
महाराष्ट्र            ७६                  १२२
असम                ०                    १११
भारत               ५८९                  १२०३
      -सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम के तहत दर्ज मामले [पोर्नोग्राफी के चलते जहाँ महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा बढ़ रही है वहीं मासूम भी इसके दुष्प्रभाव से बचे हुए नहीं हैं .आंकड़े लोकसभा ]


       और ये हैं कुछ गंभीर मामले -
१- दामिनी गैंगरेप केस -१६ दिसंबर २०१२
२-ग्वालियर में महिला जज द्वारा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जज पर यौन उत्पीड़न का आरोप
३- विशाखापट्नम में नौसेना में महिला अफसर [सब लेफ्टिनेंट महिला अफसर ]द्वारा कमांडर रैंक के अफसर पर   यौन प्रताड़ना का आरोप
४- शामली जिले में ९० वर्षीय महिला से रिश्ते के पौत्र द्वारा रेप
५- बदायूं  में दो बहनों के साथ बलात्कार के बाद हत्या
६- बंगलुरु में शहर के एक नामी गिरामी स्कूल में एक छह साल की बच्ची के साथ बलात्कार
७- बंगलुरु में आर्मी एविएशन कॉर्प्स में तैनात एक महिला अधिकारी की इज़्ज़त लूटने का प्रयास .
         ये तो चंद घटनाएँ हैं मात्र उदाहरण उस अभिशाप का जो नारी जीवन को मर्मान्तक ,ह्रदय विदारक चोट देता है किन्तु ये समाज और ये पुरुष जाति इस घटना को मात्र संवाद सहानुभूति तक ही सीमित कर देती है .गावों में जहाँ दुष्कर्मी को कभी पांच जूते मारकर व् कभी गधे पर मुंह काला करके गावं में घुमाने तो कभी कुछ रुपयों का जुर्माने की सजा दी जाकर बरी कर दिया जाता है वहीँ इस तरह की घटना पर रक्षा मंत्री /वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली जी द्वारा 'एक छोटी सी घटना ''जैसी संवेदना हीन प्रतिक्रिया दी जाती है .
      किन्तु जैसे कि सहानुभूति कुछ देर के लिए दर्द को भुला तो सकती है खत्म नहीं कर सकती वैसे ही ऐसे में यदि इस घटना पर नारी को सहानुभूति मिल भी जाये तो उसकी अंतहीन पीड़ा का खात्मा नहीं हो सकता उसे इस सम्बन्ध में स्वयं को मजबूत करना होगा और इस ज़ुल्म के खिलाफ खड़ा होना ही होगा .


नारी नहीं है बेचारी 
     साक्षी नाम की १५ वर्षीय लड़की और उत्तर प्रदेश का सी.ओ.स्तर का अधिकारी अमरजीत शाही ,कोई सोच भी नहीं सकता था कि एक १५ वर्षीय नाजुक कोमल सी लड़की उसका मुकाबला कर पायेगी पर उसने किया और अपना नाम तक नहीं बदला क्योंकि उसका मानना है कि मुजरिम वह नहीं उसका उत्पीड़न करने वाला  है और उसी की हिम्मत का परिणाम है कि १४ अगस्त को शाही को अपहरण ,बलात्कार और आतंकित करने के जुर्म में दोषी पाया गया और तीन दिन बाद उसे १० साल की सख्त कारावास और ६५,००० रूपये का अर्थ दंड भरने की  सजा सुनाई गयी.
    शामली में ९० वर्षीय वृद्धा ने कोर्ट में रेप की दास्तान बयान की और उसके दुष्कर्मी को १० साल का कारावास मिला .
        बंगलुरु में महिला अधिकारी की इज़्ज़त लूटने के प्रयास में जवान बर्खास्त .
   कंकरखेड़ा मेरठ की आशा कहती हैं कि महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों को रोकने के लिए सिर्फ कानून से काम चलने वाला नहीं .कानून की कमी नहीं पर इसके लिए समाज को भूमिका निभानी होगी .लाडलो पर अंकुश लगाना होगा .
  नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में २०१३ में दर्ज किये गए रेप के मामले में प्रत्येक १०० मामलों में ९५ दोषी व्यक्ति पीड़िताओं के परिचित ही थे .अभी हाल ही में घटित लखनऊ निर्भया गैंगरेप में भी दोषी मृतका का परिचित ही था .इसलिए ऐसे में महिलाओं की जिम्मेदारी  बनती है कि वे सतर्क रहे और संबंधों को एक सीमा में ही रखें .
      बच्चों की शिकायतों पर गौर करें और ज़रूरी कदम उठायें संबंधों को मात्र संबंध ही रहने  दें न कि अपने ऊपर बोझ बांयें  .
       सामाजिक रूप से बच्चों की और अपनी दोस्ती को घर के बाहर ही निभाने पर जोर दें और बच्चों से उनके दोस्तों के बारे में जानकारी  लेती रहें .
        यही  नहीं कानून ने भी इस संबंध में नारी का साथ निभाने में कोई कमी नहीं छोड़ी है और भले ही यह अपराध उन्हें   तोड़ने की लाख कोशिश करे किन्तु वे टूटें नहीं बल्कि इसका डटकर मुकाबला करें .

   आज यदि देखा जाये तो महिलाओं के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है और इसका एक परिणाम तो ये हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए है और स्त्री का आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं जहाँ एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है वहीँ कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर  उसे नित्य-प्रति नए खतरों का सामना करना पड़ता है .
कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी हैं किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव  नहीं हो पाया है.इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ''विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.सी.३०११ ''का निर्णय विशेष महत्व रखता है इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीडन को रोकने के लिए विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं .न्यायालय ने यह कहा ''कि देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्थान पर महिलाओं के यौन शोषण से बचाने के लिए पर्याप्त संरक्षण प्रदान नहीं करती हैं और इसके लिए विधि बनाने में काफी समय लगेगा ;अतः जब तक विधान मंडल समुचित विधि नहीं बनाता है न्यायालय द्वारा विहित मार्गदर्शक सिद्धांत को लागू किया जायेगा .

न्यायालय ने ये भी निर्णय दिया कि ''प्रत्येक नियोक्ता या अन्य व्यक्तियों का यह कि काम के स्थान या अन्य स्थानों में चाहे प्राईवेट हो या पब्लिक ,श्रमजीवी महिलाओं के यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित उपाय करे .इस मामले में महिलाओं के अनु.१४,१९ और २१ में प्रदत्त मूल अधिकारों को लागू करने के लिए विशाखा नाम की एक गैर सरकारी संस्था ने लोकहित वाद न्यायालय में फाईल किया था .याचिका फाईल करने का तत्कालीन कारण राजस्थान राज्य में एक सामाजिक महिला कार्यकर्ता के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना थी .न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्नलिखित मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये-
[१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं - सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी छींटाकशी करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम [१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शारीरिक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी  छींटाकशी करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम या विनियमों में यौन उत्पीडन रोकने सम्बन्धी नियम शामिल किये जाने चाहिए और ऐसे नियमों में दोषी व्यक्तियों के लिए समुचित दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए .
[स] प्राईवेट क्षेत्र के नियोक्ताओं के सम्बन्ध में औद्योगिक नियोजन [standing order  ]अधिनियम १९४६ के अधीन ऐसे निषेधों को शामिल किया जाना चाहिए.
[द] महिलाओं को काम,आराम,स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञानं के सम्बन्ध में समुचित परिस्थितियों का प्रावधान होना चाहिए और यह सुनिश्चित किया  जाना चाहिए  कि महिलाओं को काम के स्थान में कोई विद्वेष पूर्ण वातावरण न हो उनके मन में ऐसा विश्वास करने का कारण हो कि वे नियोजन आदि के मामले में अलाभकारी स्थिति में हैं .
[२] जहाँ ऐसा आचरण भारतीय दंड सहिंता या किसी अन्य विधि के अधीन विशिष्ट अपराध होता हो तो नियोक्ता को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध समुचित प्राधिकारी को शिकायत करके समुचित कार्यवाही प्रारंभ करनी चाहिए .
[३]यौन उत्पीडन की शिकार महिला को अपना या उत्पीडनकर्ता  का स्थानांतरण करवाने का विकल्प होना चाहिए.
न्यायालय ने कहा कि ''किसी वृत्ति ,व्यापर या पेशा के चलाने के लिए सुरक्षित काम का वातावरण होना चाहिए .''प्राण के अधिकार का तात्पर्य मानव गरिमा से जीवन जीना है ऐसी सुरक्षा और गरिमा की सुरक्षा को समुचित कानून द्वारा सुनिश्चित कराने तथा लागू करने का प्रमुख दायित्व विधान मंडल और कार्यपालिका का है किन्तु जब कभी न्यायालय के समक्ष अनु.३२ के अधीन महिलाओं के यौन उत्पीडन का मामला लाया जाता है तो उनके मूल अधिकारों की संरक्षा के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत विहित करना ,जब तक कि  समुचित विधान नहीं बनाये जाते उच्चतम न्यायालय का संविधानिक कर्त्तव्य है.
- -इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने  दिल्ली डेमोक्रेटिक वर्किंग विमेंस फोरम बनाम भारत संघ [१९९५] एस.सी.१४ में पुलिस स्टेशन पर पीड़िता को विधिक सहायता की उपलब्धता की जानकारी दिया जाना ,पीड़ित व्यक्ति की पहचान गुप्त रखा जाना और आपराधिक क्षति प्रतिकर बोर्ड के गठन का प्रस्ताव रखा है .
-भारतीय दंड सहिंता की धारा ३७६ में विभिन्न प्रकार के बलात्कार के लिए कठोर कारावास जिसकी अवधि १० वर्ष से काम नहीं होगी किन्तु जो आजीवन तक हो सकेगी और जुर्माने का प्रावधान भी रखा गया है .
-महिलाओं की मदद के लिए विभिन्न तरह के और भी उपाय हैं -
-आज की  सबसे लोकप्रिय वेबसाइट फेसबुक पर महिलाओं की मदद के लिए पेज है -
helpnarishakti@yahoo.com
-राष्ट्रीय महिला आयोग से भी महिलाएं इस सम्बन्ध में संपर्क कर सकती हैं उसका नंबर है -
  011-23237166,23236988
-राष्ट्रीय महिला आयोग को शिकायत इस नंबर पर की जा सकती है -
 23219750
-दिल्ली निवासी महिलाएं दिल्ली राज्य महिला आयोग से इस नंबर पर संपर्क कर सकती हैं -
011 -23379150  ,23378044
-उत्तर प्रदेश की महिलाएं अपने राज्य के महिला आयोग से इस नंबर पर संपर्क कर सकती हैं -
0522 -2305870 और ईमेल आई डी है -up.mahilaayog@yahoo.com
     आज सरकार भी नारी सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है और उसकी यह प्रतिबद्धता दिखती है अब दुष्कर्म पीड़िताओं की मदद के लिए निर्भया केंद्र खुलेंगे जिसमे पीड़िताओं को २४ घंटे चिकित्सीय सहायता मिलेगी और जहाँ डाक्टर ,नर्स के अलावा वकील भी केन्द्रों पर मौजूद रहेंगे .यही नहीं अब सरकार गावों में खुले में शौच को भी इस समस्या से जोड़ रही है और मोदी जी ने स्वतंत्रता दिवस पर इस सम्बन्ध में त्वरित प्रबंध किये जाने के प्रति अपना दृढ संकल्प दिखाया है .
   अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने क्लिंटन फाउंडेशन के कार्यक्रम में कहा कि महिलाओं और लड़कियों में आर्थिक व् सामाजिक रूप से आगे बढ़ने की असीमित क्षमता है इसके लिए ज़रूरी है कि वे अपने निर्णय खुद लें और आज उन्हें दिखाना ही होगा कि ये कहर भी झेलकर वे आगे बढ़ती रहेंगी और इसका डटकर मुकाबला करती रहेंगी .

शालिनी कौशिक
  [कौशल ]

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

हाय रे औरतों की बीमारी




कवि शायर कह कह कर मर गए-

  ''इस सादगी पे कौन न मर जाये ए-खुदा,''

''न कजरे की धार,न मोतियों के हार,

न कोई किया सिंगार फिर भी कितनी सुन्दर हो,तुम कितनी सुन्दर हो.''

पर क्या करें आज की महिलाओं  के दिमाग का जो बाहरी सुन्दरता  को ही सबसे ज्यादा महत्व देता रहा है और अपने शरीर का नुकसान तो करता ही है साथ ही घर का बजट  भी बिगाड़ता है.लन्दन में किये गए एक सर्वे के मुताबिक ''एक महिला अपने पूरे जीवन में औसतन एक लाख पौंड यानी तकरीबन ७२ लाख रूपए का मेकअप बिल का भुगतान कर देती है  .इसके मुताबिक १६ से ६५ वर्ष तक की उम्र की महिला ४० पौंड यानी लगभग तीन हज़ार रूपए प्रति सप्ताह अपने मेकअप पर खर्च करती हैं .दो हज़ार से अधिक महिलाओं के सर्वे में आधी महिलाओं का कहना था कि'' बिना मेकअप के उनके बॉय  फ्रैंड उन्हें पसंद ही नहीं करते हैं .''

''दो तिहाई का कहना है कि उनके मेकअप किट की कीमत ४० हज़ार रूपए है .''

''ब्रिटेन की महिलाओं के सर्वे में ५६ प्रतिशत महिलाओं का कहना था कि १५०० से २००० रूपए का मस्कारा खरीदने में ज्यादा नहीं सोचती हैं .''

    ये तो चंद आंकड़े हैं जो इस तरह के सर्वे प्रस्तुत करते हैं लेकिन एक भेडचाल  तो हम   आये दिन अपने आस पास ही देखते रहते हैं वो ये कि  महिलाएं इन्सान बन कर नहीं बल्कि प्रोडक्ट  बन कर ज्यादा रहती हैं .और बात बात में महंगाई का रोना रोने वाली ये महिलाएं कितना ही महंगा उत्पाद हो खरीदने से झिझकती नही हैं .और जहाँ तक आज की युवतियों की कहें कि उन्हें बॉय फ्रैंड कि वजह से मेकअप करना  पड़ता  है तो ये भी उनकी भूल ही कही जाएगी .वे नहीं जानती सादगी की कीमत-

''इस सादगी पे कौन न मर जाये ए खुदा .''

               और फिर ये तो इन मेकअप की मारी महिलाओं को सोचना  ही होगा कि आज जितनी बीमारियाँ  महिलाओं में फ़ैल रही हैं उसका एक बड़ा कारण इनके मेकअप के सामान हैं .और एक शेर यदि वे ध्यान दें तो शायद इस ओर कुछ प्रमुखता कम हो सकती है.राम प्रकाश राकेश कहते हैं-

गागर छलका करती सागर नहीं छलकते देखे,

    नकली कांच झलकता अक्स  हीरे नहीं झलकते देखे,

कांटे सदा चुभन ही देते,अक्स  फूल महकते देखे.

  तो फिर क्या सोचना फूल बनने की चाह में वे कांटे क्यों बनी जा रही हैं .कुछ सोचें और इन्सान बने प्रोडक्ट नहीं.

                 शालिनी  कौशिक

                         (कौशल)

रविवार, 9 अप्रैल 2017

नारी शक्ति सिरमौर-कोई माने या न माने

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''कुछ लोग वक़्त के सांचों में ढल जाते हैं ,
कुछ लोग वक़्त के सांचों को ही बदल जाते हैं ,
माना कि वक़्त माफ़ नहीं करता किसी को
पर क्या कर लोगे उनका जो वक़्त से आगे निकल जाते हैं .''
   नारी शक्ति को लेकर ये पंक्तियाँ एकदम सटीक उतरती हैं क्योंकि नारी शक्ति ही इस धरती पर एक ऐसी शक्ति है जिसने वक़्त के सांचों में ढलना तो सीखा ही सीखा उसने उन्हीं सांचों को बदलने का काम भी पूरे मनोयोग से किया और इसीलिए आज नारी शक्ति जो मुकाम दुनिया में हासिल कर चुकी है उसका मुकाबला करना या कहूं उसे किसीसे कमतर आंकना वक़्त के लिए भी सहज नहीं है .
           नारी शक्ति को हमारे इस समाज में हमेशा से सामान्य जन कहूं या विद्धवत जन कहूं सभी ने कमजोर आँका है ,कम बुद्धि आँका है ,यही नहीं ''औरतों की अक्ल घुटनो में होती है '' ऐसे ऐसे उपमान भी नारी के माथे धरे जाते हैं और ये नारी ही है जो सब कुछ सुन-सुनकर भी
''तू हर तरह से ज़ालिम मेरा सब्र आज़माले ,
तेरे हर सितम से मुझको नए हौसले मिले हैं .''
    शेर की तर्ज़ पर अपनी धुन में लगी रहती है और कुछ न कुछ उपलब्धि हासिल करती रहती है इतिहास साक्षी है कि जब भी नारी को समाज व् राष्ट्र ने अपनी योग्यता दिखाने  का अवसर और अधिकार दिया तब तब नारी ने अपने को नेतृत्व  की कसौटी पर खरा साबित किया है .विश्व में महिलाओं की योग्यता का एक भरा पूरा इतिहास है .भारतीय महिलाओं द्वारा विश्व में अपनी योग्यता का कीर्तिमान नेतृत्व के क्षेत्र में स्थापित किया गया है .
   कर्नाटक प्रदेश के एक छोटे से राज्य कित्तूर के राजा मल्ल्सर्जा की पत्नी रानी चेनम्मा थी .१८१६ ईस्वी  में  मल्लसर्जा का असामयिक निधन होने पर और फिर उसके बाद पुत्र रुद्र्सर्जा के उत्तराधिकारी होने पर श्री भगवान को प्यारे हो जाने पर अंग्रेजों ने कित्तूर को हड़पने का प्रयास किया .पुत्र की मृत्यु के बाद रानी चेनम्मा ने अपना कर्तव्य समझकर राज्य की बागडोर संभाली और अंग्रेजों के साथ प्रथम युद्ध में नेतृत्व विहीन अंग्रेजी सेना पर विजय प्राप्त की .
   इंदौर के राजघराने में एक आदर्श हिन्दू कुलवधू की तरह रहने वाली अहिल्या बाई होल्कर भगवद्भक्त व् धार्मिक किस्म की महिला थी .दुर्भाग्य से मात्र २९ वर्ष की आयु में उनके पति खंडेराव की अचानक मृत्यु हो गयी .पति की मृत्यु से व्यथित होकर उन्होंने भी आत्मदाह करना चाहा  पर सास-ससुर ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया .मल्हार राव ने उन्हें उन्हें सारे अधिकार सौंप दिए .अहिल्याबाई ने अपनी कुशलता व् साहस से इंदौर का शासन प्रबंध संभाल लिया .पुत्र मालेराव की संरक्षिका बनकर कर्मठता से राज्य व्यवस्थाओं का सञ्चालन करने लगी .पुत्र की मृत्यु के पश्चात् भी वे विचलित नहीं हुई और  राज्य के शासन को सुचारू रूप से चलाती रही और इंदौर राज्य पर १७६६ से १७९५ तक शासन किया उन्होंने भीलों के विद्रोह को दबाया.काशी  ,मथुरा और अयोध्या के जन्मस्थलों को मुक्त करने के लिए बहुत प्रयास किये .उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर के खंडहरों के पास एक नया मंदिर भी बनवाया .
  .झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा खूब लड़ी मर्दानी के रूप में इतिहास में प्रसिद्ध रानी लक्ष्मीबाई गंगाधर राव की पत्नी थी .उनकी मृत्यु पर वह झाँसी की शासिका बनी .गंगाधर राव के निस्संतान होने के कारण रानी ने दामोदर राव को अपना उतराधिकारी बनाया ,परन्तु अंग्रेजों ने इसे नहीं माना और 'व्यपगत सिद्धांत ' के तहत लॉर्ड डलहौजी ने झाँसी को हड़पना चाहा रानी ने चतुरता से इस कठिन परिस्थिति का सामना किया और १८५७ में हुए विद्रोह से पूर्व ही किले पर अपना कब्ज़ा पुनर्बहाल किया .उन्होंने जीते जी अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार नहीं की और अपनी व् राज्य की आजादी के लिए संघर्ष किया  .जनरल ह्यूरोज़ ने अपने दुर्जेय शत्रु के बारे में कहा था कि,''यहाँ वह औरत सोई हुई है ,जो विद्रोहियों में एकमात्र मर्द थी .''
   महिलाओं का इतिहास न केवल सत्ता के नेतृत्व में स्वर्णिम रहा है अपितु महिलाओं ने सत्ता को कुशल नेतृत्व दिए जाने में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है .

शिवाजी की माता जीजाबाई का नाम विश्व में ऐसी ही माताओं [महिलाओं]में स्थान पाता है .शादी के कुछ वर्षों के पश्चात् पति शाहजी द्वारा छोड़े जाने पर उन्होंने बालक शिवाजी का पालन पोषण किया ,उन्हें हिन्दू धर्म तथा शास्त्रों की शिक्षा दी .वे उन्हें रामायण और महाभारत की कहानियां सुनाया करती थी .उन्होंने शिवाजी को अपने गौरवशाली अतीत का परिचय दिया .उन्होंने विश्व के समक्ष मातृत्व का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया और शिवाजी का राज्याभिषेक किया .
    गौंडवाना के शासक संग्राम शाह के बेटे की पत्नी रानी दुर्गावती ने पति की मृत्यु के बाद शासन सत्ता संभाली और अपने अल्पवयस्क  पुत्र वीर नारायण को गद्दी पर बिठाकर उसकी संरक्षिका बनकर कुशलता पूर्वक शासन किया और साहस का परिचय दिया .
     बीजापुर के भूतपूर्व सुल्तान की पत्नी तथा अहमदनगर के सुल्तान बुरहान की बहन चांदबीबी एक योग्य महिला थी वह मृतक सुल्तान के पुत्र बहादुर की बुआ लगती थी .वह अपने भतीजे के पक्ष में थी .बीजापुर का शासन उन्होंने आदिलशाह के वयस्क  होने तक भली-भांति संभाला था .अहमदनगर में वे सुल्तान बहादुर के पक्ष में थी .वजीर से अनबन हो जाने पर वह स्वयं सुल्तान बहादुर के साथसतारा के किले में कैद हो गयी .इस फूट का लाभ उठाते हुए अकबर ने गुजरात के सूबेदार शाहजादे मुराद और अब्दुर्रहीम खान-खाना के नेतृत्व में आक्रमण करने भेजा .चांदबीबी  ने दुर्ग की रक्षा करने में अद्भुत साहस का परिचय दिया और १५९६ ईस्वी  में समझौता कर लिया .बहादुर को जो अल्पवयस्क  था अहमदनगर का सुल्तान मान लिया गया .
    इस प्रकार भारत का प्राचीन इतिहास सत्ता में रजिया सुल्तान ,ताराबाई ,सावित्रीबाई आदि महिलाओं की शौर्यगाथाओं से भरा हुआ है .ये उदाहरण तो ऐसे हैं जिन्होंने रुढियों से दबे भारतीय समाज में महिला शक्ति की चिंगारी पैदा की थी और सम्पूर्ण विश्व के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया था ,किन्तु आज जब प्रतिस्पर्धा का युग है तब भी महिलाओं ने अपनी इस चिंगारी को बुझने ही नहीं दिया है अपितु इसके प्रज्ज्वलित रहने में घी डालने का काम किया है .
   आधुनिक युग में विश्व के कई देश महिलाओं के नेतृत्व में प्रगति की ओर अग्रसर हैं .विश्व में प्रथम महिला प्रधानमंत्री के गौरव श्रीलंका की श्रीमाओ भंडारनायके ने प्राप्त किया था .मारियो एस्तेला ने  अर्जेंटीना की राष्ट्रपति के रूप में विश्व की प्रथम महिला राष्ट्रपति के रूप में स्थान पाया था और अब कई देश ऐसे हैं जो महिला नेतृत्व में प्रगति की ओर बढ़ रहे हैं .भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ,श्रीलंका की राष्ट्रपति चन्द्रिका कुमारतुंग ,पाक प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ,म्यांमार की आंग सान सू की ,ब्रिटेन की मार्गरेट थैचर आदि कितनी ही महिलाओं ने सत्ता में अपनी श्रेष्ठता साबित की .यह महिला नेतृत्व ही है जो बांग्लादेश जैसे कट्टरपंथी  देश में भी महिला नेतृत्व में सुरक्षित महसूस करने की प्रवृति  उत्पन्न करता है .वहां सत्ता खालिदा जिया और शेख हसीना वाजेद के हाथों में ही एक लम्बे समय तक पलटती रही ..यह सत्ता में महिलाओं की योग्यता ही है जो अमेरिका के राष्ट्रपति को अपनी कैबिनेट में विदेश मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद महिलाओं को प्रदान कराती है .मेडलिन अल्ब्राईट और कौंडोलीज़ा  राइस  ने अमरीकी विदेश मंत्री के पद को सुशोभित ही नहीं किया अपितु उसे विश्व में एक नई पहचान भी दिलाई है .
   महिलाओं के नेतृत्व की सफलता पर पुरुष प्रधान इस विश्व में महिलाओं की योग्यता पर अनेकों प्रश्न खड़े कर महिलाओं की योग्यता को दरकिनार करने की कोशिश की जाती है .उनके बारे में कहा जाता है कि वह कमजोर है .पुरुषों की अपेक्षा कम शक्तिशाली है .पुरुषों के मुकाबले कम दिमाग रखती है .वह भावुक होती है और तुरंत निर्णय पर पहुँचने में अक्षम होती है .

यदि इन्ही आरोपों के मद्देनज़र महिलाओं की ताकत के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो यह आरोप कहीं से भी गले के नीचे नहीं उतरता .भारत की सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री की उपाधि अब तक केवल श्रीमती इंदिरा गाँधी को प्राप्त है जिन्होंने कठोर सैनिक कार्यवाही द्वारा पाकिस्तानी आक्रमण की सम्भावना हमेशा के लिए समाप्त की .वे भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में एक मजबूत प्रधानमंत्री साबित हुई .जिनकी मजबूती की मिसाल आज भी भारतीय सेना और जनता के मुख पर है .अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर की आतंकवादी कार्यवाही के मद्देनज़र इंदिरा गाँधी ही थी जिन्होंने राजनीतिक महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर देश हित को देखा और वहां सेना भेजकर आतंकवादी कार्यवाही पर रोक लगाई .
   प्रथम आई.पी.एस.महिला किरण बेदी तो कुशल प्रशासन के क्षेत्र में एक मिथक बन चुकी है बड़े से बड़े दुर्दांत गुंडे उनके नाममात्र से कांपते थे .अपनी प्रशासनिक क्षमता के बल पर वह संयुक्त राष्ट्र संघ की पुलिस विभाग के शीर्ष पद पर विराजमान रही और अब पुडुचेरी की राज्यपाल का पद सुशोभित कर रही हैं .
   राजनीति के क्षेत्र में दिमाग से आशय कूटनीति से होता है और पाकिस्तान से अलगकर स्वतंत्र बांग्लादेश का निर्माण कराना श्रीमती इंदिरा गाँधी की कूटनीतिक सफलता ही थी .ऐसे ही किसी भी राष्ट्र के लिए विदेश मामले सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं क्योंकि राष्ट्र को अन्य राष्ट्रों के प्रति विभिन्न नीतियाँ अपनाकर राष्ट्रहित  देखना पड़ता है .ऐसे में कौडोलिज़ा राईस को जॉर्ज बुश द्वारा अपना विदेश मंत्री बनाना महिला के दिमाग की क्षमता पर उठे सब सवालों को दरकिनार करने हेतु पर्याप्त है .

यह महिला शक्ति ही है जिसका बखान हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी अति सुन्दर शब्दों में किया गया है .देवी सप्तशती की कथा के अनुसार देवताओं को भी महिषासुर ,चंड-मुंड ,शुम्भ-निशुम्भ आदि राक्षसों से रक्षा हेतु देवी दुर्गा की शरण में जाना पड़ा था और उन्होंने ही राक्षसों का वध कर देवताओं को भयमुक्त राज्य प्रदान किया था .

भावुकता को स्त्री की कमजोरी कहना एक पत्थर ह्रदय पुरुष का ही काम है .भावुकता तो वह गुण है जो स्त्री को जगत जननी के रूप में प्रतिष्ठापित किये है .दूसरों के दुःख दर्द को समझना और महसूस करना ही भावुकता है और आज के कठोर हो चले संसार में नारी का यही गुण है जो नारी को सत्ता दिलाने और सत्ता में उसकी सफलता को सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है .

आज संसार महिलाओं की योग्यता को पहचान चुका है और इसी का प्रभाव है जो यूरोप ,एशिया ,अमरीका ,अफ्रीका आदि सभी स्थानों पर महिला नेतृत्व की स्थापना हो रही है .संसार में आज तक कितने ही पुरुषों ने तानाशाह के रूप में शासन कर जनता से बर्बरतापूर्वक व्यवहार  किया है और ऐसे शासकों द्वारा प्रगति के सम्बन्ध में भी कोई विशेष प्रयास नहीं किये गए .आज समय महिलाओं के साथ है और सम्पूर्ण विश्व के वासी अपने घावों पर मरहम लगाने हेतु महिला नेतृत्व को स्वीकार कर रहे हैं .विश्व की सबसे छोटी इकाई परिवार है और परिवार के सभी सदस्यों की सफल जीवन की सूत्रधार महिला ही होती है ,किन्तु ऐसा नहीं कि वह केवल परिवार तक सीमित होती है या केवल एक परिवार को ही सफल कर सकती है .विश्व में महिलाओं ने अपनी योग्यता द्वारा यह साबित कर दिया है कि भले ही वह छोटे से परिवार से जुडी हो या विश्व रुपी विस्तृत परिवार से ,दोनों से सम्बद्ध हो अपने परिवार को सफलता की ओर अग्रसर करने में सक्षम है .नेपोलियन बोनापार्ट ने नारी में निहित इन्ही संभावनाओं को लक्ष्य करके कहा था ,''मुझे एक योग्य माता दो ,मैं तुमको एक योग्य राष्ट्र दूंगा .''और आज यह बात विश्व में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बना चुकी है .
    और महिलाओं के दिमाग की ही यदि बात की जाये तो आज का सबसे कठिन और केवल दिमाग के ही इस्तेमाल का क्षेत्र है कानून और यहाँ झंडे गाड़ने में भी महिलाएं पीछे नहीं हैं इसका सबसे पहले उदाहरण प्रस्तुत किया न्यायमूर्ति फातिमा बीवी ने ,जो हमारे सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनी -

न्यायमूर्ति फातिमा बीबी (जन्म: 30 अप्रैल 1927)सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश हैं। वे वर्ष 1989 में इस पद पर नियुक्त होने वाली पहलीभारतीय महिला हैं। उन्हें 3 अक्टूबर 1993 कोराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (भारत) की सदस्य बनाया गया। उनका पूरा नाम मीरा साहिब फातिमा बीबी है। वे तमिलनाडू की पूर्व राज्यपाल भी रह चुकी हैं।
     और नारी शक्ति का मस्तक गर्व से ऊँचा कर दिया हमारी इन नारी शक्तियों ने जो देश की सबसे महत्वपूर्ण हाई कोर्ट की अब चीफ जस्टिस बनी हुई हैं .
   देश की महिलाओं ने न्यायिक सेवा में एक नया इतिहास बनाया है। ऐसा पहली बार हुआ है कि देश के चार बड़े हाईकोर्ट दिल्ली, बॉम्बे, मद्रास और कलकत्ता की चीफ जस्टिस महिलाएं हैं।31 मार्च को इंदिरा बनर्जी के मद्रास हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस बनते ही न्यायिेक सेवा में ये नया इतिहास बन गया। इससे पहले 22 अगस्त 2016 को मंजुला चेल्लूर बॉम्बे हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस बनीं। वहीं, निशिता निर्मल म्हात्रे एक दिसंबर 2016 से कलकत्ता हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश हैं और इनसे  पहले  21 अप्रैल 2014 से जी.रोहिणी दिल्ली हाई कोर्ट की पहली महिला चीफ जस्टिस के रूप  में कार्यभार संभाल रही हैं।
        अब ऐसे में नारी शक्ति के सम्बन्ध में और कुछ कहना सूरज को दीपक दिखाने के समान  होगा और क्या फर्क पड़ता है कोई माने या न माने,पर वास्तविकता यही है कि नारी शक्ति विश्व को संचालित करती है ,विश्व की सिरमौर है .मैं तो समस्त नारी शक्ति को सलाम करते हुए बस इतना ही कहूँगी -
तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने ,
दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी .
जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत
कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी।''

शालिनी कौशिक
   [कौशल ]

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

जिन्हें न शर्म लेश


बहुत बार देखी  हैं
       हथेली की रेखाएं
किताबों में लिखा
     जिन्हें सर्वश्रेष्ठ ,
उमर आधे से ज्यादा
    है बीत गयी
खोया ही खोया
    पाया बस क्लेश ,
नहीं कोई चाहत
      है अब पाल रखी
नहीं लेना दुनिया से
     है कुछ विशेष ,
सुकूँ से बिता लें
      सम्मान से रह लें
जो चार दिन इस
    जहाँ में अवशेष ,
मगर लगता लड़ना व्
      भिड़ना पड़ेगा
सबक दे दें उनको
     जिन्हें न शर्म लेश .

शालिनी कौशिक
  (कौशल)


रविवार, 2 अप्रैल 2017

स्वच्छता अभियान :नेपाल गुरु

   उत्तर प्रदेश में इस वक़्त ब्लॉक स्तर पर केंद्र सरकार के '' स्वच्छ  भारत मिशन ग्रामीण'' के अन्तर्गत '' खुले में शौच मुक्त ''अभियान को लेकर कार्य जोरों पर है .उत्तर प्रदेश पंचायत राज विभाग के सचिव अमित कुमार गुप्ता के अनुसार '' प्रदेश के तीस जिले  दिसंबर तक खुले में शौच मुक्त हो जायेंगे .'' . साथ ही मंडल के पंचायत राज उपनिदेशक अनिल कुमार सिंह ने बताया -'' कि प्रदेश में पहला शामली जिला है जो खुले में शौच मुक्त हो चुका है .जिले में ३२ हज़ार २०८ शौचालय बनाये गए हैं .''
     अब अगर हम शामली जिले द्वारा इस मिशन के लिए की गयी मेहनत को दृष्टिगोचर करें तो हमें यहाँ के जिलाधिकारी श्री सुजीत कुमार ,सी.डी.ओ. यशु रस्तोगी और यहाँ के अन्य कर्मचारियों की मेहनत को भी ध्यान में रखना होगा जिसके बारे में हमें कैराना के प्रभारी ए.डी.ओ.पंचायत श्री धर्म सिंह जी ने विस्तार से बताया .उनके अनुसार -'' जिलाधिकारी के आदेशों के तहत सभी कर्मचारीगण सुबह को चार बजे खेतों में पहुँच जाते थे और लोगों को खुले में शौच के कारण आने वाली समस्याओं के सम्बन्ध में जागरूक करते थे साथ ही लोगों को समझाते थे कि इस तरह वे बीमारियों को तो बढ़ावा दे ही रहे हैं साथ ही अपराधों में भी सहयोग कर रहे हैं .इसके साथ ही साथ गांवों में लोगों की रूढ़िवादिता को  ध्यान में रखते हुए उन्हें इस सम्बन्ध में भी समझाया गया और उनकी आर्थिक परेशानी को मद्देनज़र रखते हुए शौचालयों के सम्बन्ध में अनुदान भी दिया गया और अन्य जरूरी जानकारी दे उनकी इस सम्बन्ध में मदद भी की गयी .''
    ब्लॉक स्तर पर पूरे जिले में की गयी जिलाधिकारी व् सी.डी.ओ. की मेहनत रंग लाई है और शामली जिला खुले में शौच मुक्त होने जा रहा है किन्तु मात्र शामली जिला खुले में शौच मुक्त होने से इस प्रदेश या भारत देश का कल्याण होने वाला नहीं है क्योंकि जितना व्यय केंद्र सरकार इस योजना पर कर रही है वह बहुत ज्यादा है और परिणाम बहुत कम .साथ ही भारत का या कहें कि उत्तर प्रदेश का शामली जिला इतनी पुरानी सोच वाला भी नहीं है जितनी पुरानी सोच कहूँ या कहूँ कि पिछड़ा हुआ उत्तर प्रदेश या भारत का अन्य क्षेत्र है और उनके बारे में ये कहना या सोचना कि वे ३० दिसंबर तक खुले में शौच मुक्त हो जायेंगे ,असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है .

  भारत सरकार की ही तरह नेपाल सरकार ने भी खुले में शौच पर रोक लगाने हेतु कड़े कदम उठाये .नेपाल सरकार ने अपने नागरिकों को सख्त हिदायत दी कि जो भी खुले में शौच के लिए जायेगा ,वह तमाम सरकारी सुविधाओं से वंचित हो जायेगा . एक जून २०१६ के अमर उजाला में प्रकाशित समाचार के अनुसार इसके लिए प्रत्येक परिवार को राशन कार्ड की तरह एक सफाई कार्ड दिया जा रहा है . यही कार्ड पात्रता की पहचान होगा .सफाई कार्ड के अभाव में व्यक्ति को न तो नेपाल सरकार से नागरिकता प्रमाण पत्र मिलेगा और न ही बिजली पानी का कनेक्शन ,पेंशन ,विवाह प्रमाण -पत्र अथवा अन्य कोई भी सुविधा। 
अब जिस तरह भारत में खुले में शौच मुक्त किये जाने को लेकर प्रशासन को मेहनत करनी पड़ रही है और लोगों की नासमझी झेलनी पड़ रही है उसे देखते हुए इस मिशन की सफलता के लिए एक दशक की उम्मीद किया जाना भी कम नहीं कहा जा सकता है .
  .ऐसे में यहाँ जनहित को देखते हुए जबरदस्ती किया जाना भी गलत नहीं कहा जा सकता .तुलसीदास जी ने भी रामचरित मानस के सुन्दर कांड में कहा है -
''विनय न मानत जलधि जड़ ,गए तीन दिन बीत,
बोले राम सकोप तब भय बिन होये न प्रीत .''
        काले धन पर शिकंजा कसने के लिए मोदी जी पहले ही ऐसा कदम उठा चुके हैं जिसे हमारे प्रभु श्री राम ने सागर को रास्ता देने के लिए उठाया तो ऐसे में अब इस कार्य की सफलता के लिए नेपाल का अनुसरण हमें करना ही होगा तब इस पुनीत कार्य में हम अति शीघ्र सफलता प्राप्त कर सकते हैं और फिर इस वक़्त देश में स्वच्छता अभियान ऐसे समर्पण भाव से चलाया जा रहा है कि चिकित्सक चिकित्सा छोड़ और पुलिस सुरक्षा व् अपराधों का सफाया छोड़ अपने कार्यस्थलों पर झाड़ू लगा रहे हैं जैसे सब स्थान पहले से गंदे व् अस्वच्छ थे तो फिर जो जगह सरकार भी अपने सफाई के कार्यस्थल में चुन रही है वहां सहयोग करना इनका परम कर्तव्य बनता ही है और जहाँ तक रही भारतीयों की नेचर अर्थात प्रकृति तो उनके सामने कलेक्टर की भी वह हैसियत नहीं जो कि एक सिपाही की है .ऐसे में अगर एक एक सिपाही भी खेत में उन्हें इस काम से रोकने के लिए खड़ा कर दिया जाये तो ब्लॉक के कर्मचारियों या जिले के अफसरों की वहां उपस्थिति की ज़रुरत नहीं पड़ेगी और सरकार अपना लक्ष्य सरलता  से ही हासिल कर लेगी .वैसे भी हमें अपना लक्ष्य प्राप्त करना है तो जैसे भी हो करना चाहिए .कहा भी गया है -
''जहाँ काम आवे सुई ,कहा करे तलवार .''

शालिनी कौशिक 
    [कौशल ]

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

#जागो रे आम आदमी


किसी शायर ने कहा है -

''कौन कहता है आसमाँ में सुराख़ हो नहीं सकता ,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों .''

भारतवर्ष सर्वदा से ऐसी क्रांतियों की भूमि रहा है जिन्होंने हमेशा ''असतो मा सद्गमय ,तमसो मा ज्योतिर्गमय ,मृत्योर्मामृतं गमय''का ही सन्देश दिया है और क्रांति कभी स्वयं नहीं होती सदैव क्रांति का कारक भले ही कोई रहे पर दूत हमेशा आम आदमी ही होता है क्योंकि जिस तरह से लावा ज्वालामुखी के फटने पर ही उत्पन्न होता है वैसे ही क्रांति का श्रीगणेश भी आम आदमी के ह्रदय में उबलते क्रोध के फटने से ही होता है .

डेढ़ सौ वर्षों की गुलामी हमारे भारतवर्ष ने झेली और अंग्रेजों के अत्याचारों को सहा किन्तु अंग्रेजों को हमारे क्रांतिकारियों के सामने हमेशा मुंह की खानी पड़ी .हमारे देश के महान क्रन्तिकारी चंद्रशेखर आजाद को गिरफ्तार करने के बावजूद वे उन्हें तोड़ नहीं पाये .उनकी वीरता अंग्रेजों के सामने भी अपने मुखर अंदाज में थी -

''पूछा उसने क्या नाम बता -आजाद ,
पिता को क्या कहते -स्वाधीन,
पिता का नाम -
और बोलो किस घर में हो रहते ?
कहते हैं जेलखाना जिसको वीरों का घर है ,
हम उसमे रहने वाले हैं ,उद्देश्य मुक्ति का संघर्ष है .''

साइमन कमीशन का भारत की जनता ने कड़ा विरोध किया और अंग्रेजों की लाठियों की मार को भी झेला-

''लाठियां पड़ी गिर पड़े जवाहर लाल वहां ,
औ पंत गिरे थे ऊपर उन्हें बचाने को .''

ये एक आम आदमी की ही ताकत थी जिसने ब्रिटिश हुकूमत को खौफ से भर दिया था .अल्फ्रेड पार्क में स्वयं की गोली से शहीद हो चुके चंद्रशेखर आजाद के मृत शरीर के पास तक जाने की हिम्मत ब्रिटिश पुलिस में नहीं थी ,कई गोलियां उनके मृत शरीर पर बरसाकर ही वह आगे बढ़ने का साहस कर पायी थी .

सत्य व अहिंसा के दम पर अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाले महात्मा गांधी को तो ब्रिटिश हुकूमत कभी भुला ही नहीं पायेगी जिन्होंने बिना किसी हथियार के हथियारों से लैस फिरंगियों को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया -

''दुनिया में लड़ी तूने अजब ढब की लड़ाई ,
दागी न कहीं तोप न बन्दूक चलाई ,
दुश्मन के किले पर भी न की तूने चढ़ाई
वाह रे फ़कीर खूब करामात दिखाई .
चुटकी में दुश्मनों को दिया देश से निकाल.
....दुनिया में तू बेजोड़ था इंसान बेमिसाल .''
...जिस दिन तेरी चिता जली रोया था महाकाल .
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल.''
. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत एक ''सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य'' बना .यहाँ राजशाही ख़त्म हुई जनता का शासन आरम्भ हुआ और आम आदमी की ताकत पर यह लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बना .

२०१२ आम आदमी की ताकत के हिसाब से अगर देखा जाये तो अति महत्वपूर्ण वर्ष कहा जायेगा .जहाँ आज तक बलात्कार पीड़िता को स्वयं जनता ही अपराधी का दर्जा देती थी वही दामिनी गैंगरेप कांड में दामिनी के साथ खड़ी हो गयी .पूरा देश एक स्वर में दामिनी के लिए न्याय मांग रहा था और मांग रहा था उसके लिए जीवन की दुआएं .अभूतपूर्व दृश्य उपस्थित था, कड़ाके की ठण्ड के बावजूद जनता आंदोलन रत थी और सारे देश में जैसे किसी को अन्य कोई समस्या रह ही नहीं गयी थी ,रह गयी थी तो केवल दामिनी की चिंता और उसके अपराधियों के लिए फांसी की सजा की मांग ,सरकार हिल गयी थी जनता के वे तेवर देखकर और समझ में आ गया था कि जनता को यूँ ही जनार्दन नहीं कहा जाता .

उसके बाद आम आदमी की ताकत दिखाई प्रसिद्द समाजसेवी अन्ना हज़ारे ने जिन्होंने सरकार को ही अल्टीमेटम दे दिया लोकपाल के लिए और यह जनता की ही ताकत है जो लोकपाल पास हुआ है .
है .

आरोप-प्रत्यारोप आम आदमी करता है किन्तु सर्वजन हिताय व् सर्वजन सुखाय के लिए और जब वह अपनी ताकत से उस स्थिति में आता है तब काम करता है और यह साबित करता है कि ऐसा कुछ नहीं जो आम आदमी के हाथ में न हो ,उसके हाथ में सब कुछ है बस उसे उस दिशा में सोचना भर होता है क्योंकि -

''आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है ..''

आज आम आदमी न केवल परिवर्तन ला सकता है बल्कि ला रहा है .ये आम आदमी के दिमाग की ही ताकत है जो अग्नि-५ बना और उसने चीन के दिल में भारत के लिए दहशत भर दी,ये आम आदमी की ही सामूहिक शक्ति है जो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को कारगिल के बाद भारत आने को मजबूर कर पायी ,ये आम आदमी की ताकत है जो उसे सूचना का अधिकार दिलाती है जिससे सरकारी तंत्रो में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने में उसे मदद मिलती है ,ये आम आदमी की ताकत है जो माँ को पिता के साथ संतान के शैक्षिक अभिलेखों में स्थान दिलाती है और ये भी आम आदमी की ही ताकत है जो बार-बार गिरने के बावजूद ,विध्वंस के बावजूद इस देश को खड़ा करती है और आम आदमी की इसी ताकत को इस देश ने माना है और उसे महत्व दिया है .आम आदमी यहाँ अपनी ताकत को विश्व में एक आदर्श रूप में प्रस्तुत करता है और उसे नतमस्तक होने को मजबूर करता है .आम आदमी की इसी ताकत को शकील''ज़मील'' ने यूँ व्यक्त किया है -

''जो बढ़के सीना-ए-तूफ़ान पे वार करता है ,
खुदा उसी के सफीने को पार करता है .''

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 25 मार्च 2017

चर्चा कार


करते हैं बैठ चर्चा,
        खाली ये जब भी होते,
कोई काम इनको करते
         मैने कभी न देखा.
...................................................
वो उसके साथ आती,
          उसके ही साथ जाती,
गर्दन उठा घुमाकर
           बस इतना सबने देखा.
...................................................
खाते झपट-झपट कर,
           औरों के ये निवाले,
अपनी कमाई का इन्हें
           टुकड़ा न खाते देखा.
....................................................
बेचारा उसे कहते,
         जिसकी ये जेब काटें,
कुछ करने के समय पर
           मौके से भागा देखा.
.....................................................
ठेका भले का इन पर,
        मालिक ये रियाया के,
फिर भी जहन्नुमों में
         इनको है बैठे देखा.
........................................................
शालिनी कौशिक
    (कौशल)
   

रविवार, 19 मार्च 2017

क्या नारीशक्ति यथार्थ है?

UP high school result declare todaysome unknown facts of jiah's life entrepreneur-women-success

नारी सशक्त हो रही है .इंटर में लड़कियां आगे ,हाईस्कूल में लड़कियों ने लड़कों को पछाड़ा ,आसमान छूती लड़कियां ,झंडे गाडती लड़कियां जैसी अनेक युक्तियाँ ,उपाधियाँ रोज़ हमें सुनने को मिलती हैं .किन्तु क्या इन पर वास्तव में खुश हुआ जा सकता है ?क्या इसे सशक्तिकरण कहा जा सकता है ?
नहीं .................................कभी नहीं क्योंकि साथ में ये भी देखने व् सुनने को मिलता है .
*आपति जनक स्थिति में पकडे गए तीरंदाज,
*बेवफाई से निराश होकर जिया ने की आत्महत्या ,
*गीतिका ने ,
*फिजा ने और न जाने किस किस ने ऐसे कदम उठाये जो हमारी सामाजिक व्यवस्था पर कलंक है .

गोपाल कांडा के कारण गीतिका ,चाँद के कारण फिजा के मामले सभी जानते हैं और ये वे मामले हैं जहाँ नारी किसी और के शोषण का शिकार नहीं हुई अपितु अपनी ही महत्वकांक्षाओं  का शिकार हुई .अपनी समर्पण की भावना के कारण ढेर हुई ये नारियां नारी के सशक्तिकरण की ध्वज की वाहक बनने जा रही थी किन्तु जिस भावना के वशीभूत हो ये इस मुकाम पर पहुंचना चाहती थी वही इनके पतन का या यूँ कहूं कि आत्महत्या का कारण बन गया ..ये समर्पण नारी को सशक्त नहीं होने देगा क्योंकि ये समर्पण जो सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ आधुनिक बनने की गरज में नारी करती है इसका खामियाजा भी वही भुगतती है क्योंकि प्रकृति ने उसे जो माँ बनने का वरदान दिया है वह उसके लिए इस स्थिति में अभिशाप बन जाता है और ऐसे में उसे मुहं छुपाने को या फिर आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ता है .पुरुष के प्रतिष्ठा या चरित्र पर इसका लेशमात्र भी असर नहीं पड़ता .नारायणदत्त तिवारी जी को लीजिये ,पता चल चुका है ,साबित हो चुका है कि वे एक नाजायज़ संतान के पिता हैं किन्तु तब भी न तो उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा में कोई अंतर आया और न ही उन्हें कहीं बहिष्कृत किया गया जबकि यदि उनकी जगह कोई नारी होती तो उसे कुलटा, कुलच्छनी जैसी संज्ञाओं से विभूषित करने से कोई बाज़ नहीं आता और हद तो ये है कि ऐसी स्थिति होने पर भी नारी अपनी ऐसी भावनाओं पर कोई अंकुश नहीं लगा पाती .
ऐसे ही बड़े बड़े दावे किये जाते हैं कि लड़कियां आत्मनिर्भर हो रही हैं ,सत्य है ,डाक्टर बन रही हैं इंजीनियर बन रही हैं साथ ही बहुत बड़ी संख्या में टीचर बन रही हैं किन्तु ये ऊपरी सच है अंदरूनी हालात-
*-इंजीनियर रीमा मेरिट में स्थान बना बनती है और बेवकूफ बनती है अपने साथी लड़के से ,शादी करती है किन्तु नहीं बनती और माँ बाप कुंवारी बता उसकी दूसरी शादी करते हैं ,क्यूं बढ़ जाते हैं  उसके कदम आधुनिकता की होड़ में स्वयं को सक्षम निर्णय लेने वाला दिखाने में और अगर बढ़ जाते हैं तो क्यूं नहीं निभा पाती उस प्यार को जो उसे सामाजिक मर्यादाओं से बगावत को मजबूर करता है और फिर क्यूं लौट आती है उन्हीं मर्यादाओं के अधीन जिन्हें कभी कोरी बकवास कह छोड़ चुकी थी ?क्या यही है सशक्तिकरण ?
*कस्बों में लड़कियां बारहवीं पास करते ही वहां के स्कूलों में पढ़ाने जाने लगी हैं .''जॉब ''कर रही हैं ,स्वावलंबी हो रही हैं ,कह सिर गर्व से ऊँचा किये फिरते हैं सभी फिर क्यों लुट रही हैं ,क्यों अपनी तनख्वाह नहीं बताती ,क्यों ज्यादा तनख्वाह पर साइन कर कम वेतन ख़ुशी ख़ुशी ले रही हैं ?क्या यही है सशक्तिकरण ?
*पंचायतों में ,नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित हो रहे हैं ,महिलाएं चुनी जा रही हैं ,शासन कर रही हैं सुन गर्व से भर जाती हैं महिलाएं ,फिर क्यूं पंचायतों की ,नगरपालिकाओं की बैठकों में अनुपस्थित रहती हैं ,क्यों उनकी उपस्थिति के साइन तक उनके पति ही करते हैं ?क्या यही है सशक्तिकरण ?
*बैनामे संपत्तियों के महिलाओं के नाम हो रहे हैं ,महिलाएं संपत्ति की मालिक हो रही हैं ,क्या नहीं जानते हम कि मात्र स्टाम्प ड्यूटी घटाने को ये स्वांग भी पुरुष ही रच रहे हैं ,कितनी सही तरह से संपत्ति की मालिक हो रही हैं महिलाएं स्वयं भी जानती हैं ,क्या वे अपनी मर्जी से उसका इस्तेमाल कर सकती हैं ,क्या वे स्वयं उसे बेच सकती हैं ?क्या यही है सशक्तिकरण ?
वास्तविकता यही है कि नारी कभी भी पुरुष की गुलामी से आज़ाद नहीं हो सकती क्योंकि ये गुलामी उसने स्वयं चुनी है .वह स्वयं उसके हाथों की कठपुतली बनी रहना चाहती है .पुरुष ने उसे हमेशा गहनों ,कपड़ों के लोभ में ऐसे जकड़े रखा हैं कि वह कहीं भी हो इनमे ही सिमटकर रह जाती है .पुरुष के इस बहकावे में नारी इस कदर फंसी हुई है कि बड़ी से बड़ी नाराजगी भी वह उसे कोई गहना ,कपडा देकर दूर कर देता है और वह बहकी रहती है एक उत्पाद बन कर .यही सोच है कि पढ़ी लिखी वकील होने के बावजूद फिजा चाँद के शादी व् बच्चों के बारे में जानते हुए भी उसकी पत्नी बनाने के बहकावे में आ जाती है और समाज में उस औरत का दर्ज पा जाती हैं जिसे ''रखैल''कहते हैं .यही सशक्तिकरण का ढोंग है जिसमे फिल्मो में ,मॉडलिंग में लड़कियां अपना तन उघाड़ रही हैं  ,वही स्वयं को सशक्त दिखाने की पहल में यही हवा हमारे समाज में बही जा रही है .फिल्मो में शोषण का शिकार हमारी ये हीरोइने तो इस माध्यम से नाम व् पैसा कमा रही हैं  किन्तु एक सामान्य लड़की इस राह पर चलकर स्वयं को तो अंधे कुएं में धकेल ही रही है और औरों के लिए खाई तैयार कर रही है .फिर क्यों आश्चर्य किया जाता है बलात्कार ,छेड़खानी की बढती घटनाओं पर ,ये तो उसी सशक्तिकरण की उपज है जो आज की नारी का हो रहा है और परिणाम सामने हैं
उसे केवल यही सुनता है जो पुरुष सुनाता है -
''है बनने संवरने का जब ही मज़ा ,
कोई देखने वाला आशिक भी हो .''
नहीं सुनती उसे वह करूण पुकार जो कहती है -
''दुश्मन न करे दोस्त ने जो काम किया है ,
उम्र भर का गम हमें इनाम दिया है .''
.इसी सोच के कारण अपने आकर्षण में पुरुष को बांधने के लिए वह निरंतर गिरती जा रही है और स्वयं को सशक्त दिखाने के लिए फांसी पर चढ़ती जा रही है .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]








क्या आदमी सच में आदमी है ?

''आदमी '' प्रकृति की सर्वोत्कृष्ट कृति है .आदमी को इंसान भी कहते हैं , मानव भी कहते हैं ,इसी कारण आदमी में इंसानियत ,...