शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

इंदिरा गांधी :भारत का वास्तविक शक्तिपुंज और ध्रुवतारा


Image result for indira gandhi free imagesImage result for indira gandhi free images

जब ये शीर्षक मेरे मन में आया तो मन का एक कोना जो सम्पूर्ण विश्व में पुरुष सत्ता के अस्तित्व को महसूस करता है कह उठा कि यह उक्ति  तो किसी पुरुष विभूति को ही प्राप्त हो सकती है  किन्तु तभी आँखों के समक्ष प्रस्तुत हुआ वह व्यक्तित्व जिसने समस्त  विश्व में पुरुष वर्चस्व को अपनी दूरदर्शिता व् सूक्ष्म सूझ बूझ से चुनौती दे सिर झुकाने को विवश किया है .वंश बेल को बढ़ाने ,कुल का नाम रोशन करने आदि न जाने कितने ही अरमानों को पूरा करने के लिए पुत्र की ही कामना की जाती है किन्तु इंदिरा जी ऐसी पुत्री साबित हुई जिनसे न केवल एक परिवार बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र गौरवान्वित अनुभव करता है  और  इसी कारण मेरा मन उन्हें ध्रुवतारा की उपाधि से नवाज़ने का हो गया और मैंने इस पोस्ट का ये शीर्षक बना दिया क्योंकि जैसे संसार के आकाश पर ध्रुवतारा सदा चमकता रहेगा वैसे ही इंदिरा प्रियदर्शिनी  ऐसा  ध्रुवतारा थी जिनकी यशोगाथा से हमारा भारतीय आकाश सदैव दैदीप्यमान  रहेगा।
१९ नवम्बर १९१७ को इलाहाबाद के आनंद भवन में जन्म लेने वाली इंदिरा जी के लिए श्रीमती सरोजनी नायडू जी ने एक तार भेजकर कहा था -''वह भारत की नई आत्मा है .''
गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने उनकी शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् शांति निकेतन से विदाई के समय नेहरु जी को पत्र में लिखा था -''हमने भारी मन से इंदिरा को  विदा  किया है .वह इस स्थान की शोभा थी  .मैंने उसे निकट से देखा है  और आपने जिस प्रकार उसका लालन पालन किया है उसकी प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जा सकता .''   सन १९६२ में चीन ने विश्वासघात करके भारत  पर आक्रमण किया था तब देश  के कर्णधारों की स्वर्णदान की पुकार पर वह प्रथम भारतीय महिला थी जिन्होंने अपने समस्त पैतृक  आभूषणों को देश की बलिवेदी पर चढ़ा दिया था इन आभूषणों में न जाने कितनी ही जीवन की मधुरिम स्मृतियाँ  जुडी हुई थी और इन्हें संजोये इंदिरा जी कभी कभी प्रसन्न हो उठती थी .पाकिस्तान युद्ध के समय भी वे सैनिकों के उत्साहवर्धन हेतु युद्ध के अंतिम मोर्चों तक निर्भीक होकर गयी .
आज देश अग्नि -५ के संरक्षण  में अपने को सुरक्षित महसूस कर रहा है इसकी नीव में भी इंदिरा जी की भूमिका को हम सच्चे भारतीय ही महसूस कर सकते हैं .भूतपूर्व राष्ट्रपति और भारत में मिसाइल कार्यक्रम  के जनक डॉ.ऐ.पी.जे अब्दुल कलाम ने बताया था  -''१९८३ में केबिनेट ने ४०० करोड़ की लगत वाला एकीकृत मिसाइल कार्यक्रम स्वीकृत किया .इसके बाद १९८४ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी डी.आर.डी एल .लैब  हैदराबाद में आई .हम उन्हें प्रैजन्टेशन दे रहे थे.सामने विश्व का मैप टंगा था .इंदिरा जी ने बीच में प्रेजेंटेशन रोक दिया और कहा -''कलाम !पूरब की तरफ का यह स्थान देखो .उन्होंने एक जगह पर हाथ रखा ,यहाँ तक पहुँचने वाली मिसाइल कब बना सकते हैं ?"जिस स्थान पर उन्होंने हाथ रखा था वह भारतीय सीमा से ५००० किलोमीटर दूर था .
इस तरह की इंदिरा जी की देश प्रेम से ओत-प्रोत घटनाओं से हमारा इतिहास भरा पड़ा है और हम आज देश की सरजमीं पर उनके प्रयत्नों से किये गए सुधारों को स्वयं अनुभव करते है,उनके खून की एक एक बूँद हमारे देश को नित नई ऊँचाइयों पर पहुंचा रही है और आगे भी पहुंचाती रहेगी.
इंदिरा जी ने देशहित में बहुत से ऐसे फैसले लिए जो स्वयं उनके लिए घातक रहे किन्तु देश हित में कोई भी बड़ा फैसला लेने से वे कभी भी नहीं हिचकिचाई। आज  एक संगठन  देशहित के नाम पर कभी गृहस्थ जीवन से दूर रहने की सलाह देता  तो कभी दस दस बच्चे पैदा करने की किन्तु इंदिरा जी ने गृहस्थ धर्म से भी  नाता  नहीं तोडा और राष्ट्रधर्म का भी बखूबी पालन किया जिसका पहला परिणाम तो उन्हें अपने ही सुरक्षाकर्मी के हाथों जान गंवाकर चुकाना पड़ा और दूसरा परिणाम उसी संगठन के हाथों और उन्हें न जानने वालों द्वारा अनर्गल प्रलाप द्वारा आज देश को उनके जैसे व्यक्तित्व की ही आवश्यकता है और इस बात को हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी बखूबी जानते हैं और इसीलिए वे अपनी कार्यशैली में इंदिरा जी का ही अनुसरण करने का अथक प्रयास कर रहे हैं।
हम सब  जानते हैं कि इस दुनिया में जो आया है वह एक दिन अवश्य जायेगा और हम कितने ही प्रयास करलें उसे वापस नहीं ला सकते किन्तु हम उसके कार्यों का उसकी शिक्षाओं का अनुसरण कर उसे अपने साथ जीवित रख सकते हैं और यही प्रयास हमें इंदिरा जी के कार्यों  याद कर व् उनका अनुसरण कर करना चाहिए। यही हमारी इंदिरा जी को उनकी पुण्यतिथि पर सच्ची श्रद्धांजलि होगी जो कि हमें देनी भी चाहिए क्योंकि ये एक शाश्वत सत्य है कि इंदिरा जैसे शक्ति का दोबारा जन्म इस भारतभूमि पर तब तक नामुमकिन है जब तक ऊपर से इंदिरा को निंदनीय बताने वाले और अंदर से उससे भयभीत रहने वाले सत्ता में आसीन हैं क्योंकि कोई भी श्रेष्ठ आत्मा सम्मान चाहती है स्वयं के लिए भय या दिखावा नहीं।
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

सोमवार, 26 अक्तूबर 2015

गैंगरेप:मृत्युदंड पर बहस ज़रूरी


Smashing rape - stock photoKOLKATA - MARCH 16 : A Christian Nun standing in prayer during a candle light vigil to protest gang rape of an elderly nun near Ranaghat on March 16, 2015 at Allen Park in Kolkata, India. - stock photo
मृत्युदंड एक ऐसा दंड जिसका समर्थन और विरोध हमेशा से होता रहा है पर जब जब इसके विरोध की आवाज़ तेज हुई है तब तब कोई न कोई ऐसा अपराध सामने आता रहा है जिसने इसकी अनिवार्यता पर बल दिया है हालाँकि इसका  समर्थन और विरोध न्यायपालिका में भी रहा है किन्तु अपराध की नृशंसता इस दंड की समाप्ति के विरोध में हमेशा से खड़ी रही है और इसे स्वयं माननीय न्यायमूर्ति ए.पी.सेन ने ''कुंजू कुंजू बनाम आंध्र प्रदेश राज्य क्रिमिनल अपील ५११ [१९७८] में स्वीकार किया है .
    ''कुंजू कुंजू बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के वाद में अभियुक्त एक विवाहित व्यक्ति था जिसके दो छोटे बच्चे भी थे .उसका किसी युवती से प्रेम हो गया और उससे विवाह करने की नीयत से उसने अपनी पत्नी और दोनों बच्चों की रात में सोते समय निर्मम हत्या कर दी .''
     इस वाद में यद्यपि न्यायाधीशों ने 2:1 मत से इन तीन हत्याओं के अभियुक्त की मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया जाना उचित समझा परन्तु न्यायमूर्ति ए .पी. सेन ने अपना विसम्मत मत व्यक्त करते हुए अवलोकन किया -
  '' अभियुक्त ने एक राक्षसी कृत्य किया है तथा अपनी पत्नी तथा उससे पैदा हुए दो निर्दोष नन्हे बच्चों की हत्या करने में भी वह नहीं हिचकिचाया , यदि इस प्रकार के मामले में भी मृत्युदंड न दिया जाये तो मुझे समझ में नहीं आता कि मृत्युदंड और किस प्रकार के मामलों में दिया जा सकता है .''
    उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने राजेन्द्र प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य ए .आई. आर १९७९ एस. सी. ९१६ के वाद में जोर देकर कहा कि जहाँ हत्या जानबूझकर , पूर्वनियोजित , नृशंस तथा बर्बरतापूर्ण ढंग से की गयी हो तथा इसके लिए कोई परिशमनकारी  परिस्थितियां न हों वहां सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से मृत्युदंड अनिवार्य रूप से दिया ही जाना चाहिए
      न्यायमूर्ति ए.पी.सेन ने एक अन्य वाद में भी मृत्युदंड के सम्बन्ध में कहा -'' दंड के प्रति मानवीय दृष्टिकोण की वास्तविकता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए . यदि कोई व्यक्ति किसी निर्दोष व्यक्ति की नृशंस और पूर्व नियोजित ढंग से हत्या करता है तो उसकी बर्बरता से न्यायालय की आत्मा दहल जाती है अतः उसे अपने कृत्य का परिणाम भुगतना ही चाहिए . ऐसे व्यक्तियों को जीवित रहने के अधिकार से वंचित किया जाना चाहिए .''
     मृत्युदंड की वैधानिकता को निर्णीत करने का अवसर उच्चतम न्यायालय को एक बार फिर ''वचन सिंह बनाम पंजाब राज्य के वाद में मिला ए.आई.आर.१९८० सुप्रीम कोर्ट ८९८ ''के वाद में मिला .इस वाद में ५ न्यायाधीशों की खंडपीठ ने ४:१ से विनिश्चित किया कि मृत्युदंड आजीवन कारावास के दंड के विकल्प के रूप में एक वैधानिक दंड है अतः यह अनुचित नहीं है और अनुच्छेद १४ , १९,तथा २१ का उल्लंघन नहीं करता है .......मृत्युदंड को वैकल्पिक दंड के रूप में उचित और आवश्यक ठहराते हुए उच्च न्यायालय ने अभिकथन किया कि मृत्युदंड को समाप्त किये जाने के विचार का समर्थन किये जाने के बावजूद विश्व के अनेक विद्वानों ने  [ जिसमे समाजशास्त्री ,विधिशास्त्री , न्यायविद तथा प्रशमनीय अधिकारी भी सम्मिलित हैं ] यह स्वीकार किया है कि सामाजिक सुरक्षा के लिए मृत्युदंड को यथावत बनाये रखना आवश्यक है तथापि बहुमत ने यह स्वीकार किया कि मृत्युदंड के प्रशासनीय परिस्थितियों का निर्वचन उदारता से किया जाना चाहिए ताकि इस दंड का उपयोग बिरले से बिरले मामलों में ही किया जाये ताकि मानव जीवन की गरिमा बनी रहे .
    मानव जीवन की गरिमा का विचार अपराध के कारण को विचारकर भले ही न्यायालय या सुधारवादी कर लें किन्तु एक अपराध ऐसा है जिसमे मानव जीवन की गरिमा या उदारता का विचार अपराधी के सम्बन्ध में आना एक असहनीय बात प्रतीत होती है .वह अपराध है '' बलात्कार '' ,जिसमे अपराधी द्वारा पीड़ित की मानव जीवन की गरिमा को तार-तार कर दिया जाता है और पीड़िता ही वह व्यक्ति होती है जो अपने साथ हुए इस अपराध का दोहरा दंड भोगती है जबकि उसकी गलती मात्र एक होती है और वह है  '' नारी शरीर '' , जो उसे प्रकृति प्रदत्त होता है जिसमे वह स्वयं कुछ नहीं कर सकती है और इस सबके बावजूद उसके साथ अपराध घटित होने पर ये कानून और ये समाज दोनों ही उसके साथ खड़े नहीं होते और स्वयं के साथ अपराध के कारणों में उसकी कमी भी ढूंढी जाती है जो अपराधी के लिए फायदेमंद साबित होती है और वह एक निर्दोष के मानव जीवन की गरिमा का हरण कर भी आसानी से बरी हो जाता है .
    १६ दिसंबर २०१२ को निर्भया गैंगरेप कांड के बाद हुए जनांदोलन के दबाव में भारतीय दंड संहिता में धारा ३७६ में बहुत से संशोधन किये गए जिसमे धारा ३७६ घ के रूप में सामूहिक बलात्संग सम्बन्धी धारा भी जोड़ी गयी ,जिसमे कहा गया कि -

''३७६-घ -सामूहिक बलात्संग -जहाँ किसी स्त्री से , एक या अधिक व्यक्तियों द्वारा एक समूह गठित करके या सामान्य आशय को अग्रसर करने में कार्य करते हुए बलात्संग किया जाता है , वहां उन व्यक्तियों में से प्रत्येक के बारे में यह समझा जायेगा कि उसने बलात्संग का अपराध किया है और वह ऐसी अवधि के कठोर कारावास से , जिसकी अवधि बीस वर्ष से कम नहीं होगी , किन्तु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी जिससे उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास अभिप्रेत होगा , दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा .
      परन्तु ऐसा जुर्माना पीड़िता के चिकित्सीय खर्चों को पूरा करने और पुनर्वास के लिए न्यायोचित और युक्तियुक्त होगा ;
           परन्तु यह और कि इस धारा के अधीन अधिरोपित कोई जुर्माना पीड़िता को संदत्त किया जायेगा . ''
                  और इसी संशोधन के द्वारा एक धारा ३७६ ड़ का अन्तःस्थापन भी किया गया जिसमे इस अपराध के पुनरावृत्ति कर्ता के अपराधियों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान किया गया .
     अब सवाल ये उठता है कि जो अपराधी उदारता जैसे मानवीय गुणों से दूर है जिसमे मानवीय संवेदनाएं हैं ही नहीं ,एक नारी  शरीर मात्र जिनकी कई की सोचने समझने की शक्ति एक साथ  विलुप्त कर उनमे मात्र हवस वासना जैसे भावों को ही उभारता है क्या उनके लिए कानून या समाज में दया करुणा जैसे भावों से भरे दंड के भाव होने चाहियें ?

    अभी २३ अक्टूबर २०१५ को दिल्ली से रावण दहन देखकर परिवार के साथ वापस आ रही १४ साल की किशोरी का जौंती मार्ग से अपहरण किया गया ,फिर पांच दरिंदों द्वारा उसके साथ गैंगरेप किया गया , उसकी हत्या की गयी और शव दफना दिया गया .पकडे गए आरोपियों के अनुसार ,''वह फुट-फूटकर गुहार लगा रही थी मुझे बख्श दो ,जाने दो लेकिन जितना वो चीखी चिल्लाई उतना ही उन दरिंदों की हैवानियत बढ़ती गयी ,दो घंटे तक वे उसका जिस्म नोचते रहे और जब लगा कि वह उन्हें पहचान लेगी तो ईंट मारकर उसे बेसुध कर दिया ,चुन्नी से गला घोंट दिया और मिटटी में शव दफ़न कर दिया और ये सब बताते वक्त आरोपियों के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई .क्या ऐसे में भी अपराधियों के द्वारा पुनरावृत्त इस अपराध की सम्भावना पर ही मृत्युदंड का विचार किया जाना चाहिए ?क्या एक किशोरी की मानव जीवन की गरिमा को तार-तार करने वालों की मानवीय जीवन की गरिमा का विचार करना चाहिए ?कहा जा सकता है कि बलात्कार के बाद हत्या में फांसी होती ही है किन्तु यदि ये ऐसे बलात्कार के बाद उसे छोड़ भी देते तो क्या उसके जीवन का उसके लिए कोई अर्थ रह गया था ? क्या आजीवन कारावास उन्हें सुधारने की क्षमता रखता है जो इतने अत्याचार करने के बाद भी सहज हैं ?
   गैंगरेप एक ऐसा अपराध है जिसके लिए निर्विवाद रूप से मृत्युदंड का प्रावधान होना ही चाहिए क्योंकि एक नारी शरीर किसी एक की उत्तेजना को भले ही एक समय में बढ़ा दे किन्तु एक समूह को एकदम वहशी बना दे ऐसा संभव नहीं है ऐसा सोची समझी रणनीति के तहत ही होता है और जहाँ दिमाग काम करता है वहां दंड भी दिमाग के स्तर का ही होना चाहिए दिल के स्तर का नहीं और ऐसे में इस मामले के पांचों आरोपियों के मृत्युदंड के साथ ही गैंगरेप के समस्त मामलों में मृत्युदंड का ही प्रावधान होना चाहिए .
शालिनी कौशिक
    [कानूनी ज्ञान ]

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

कॉलेजियम :भला दूध की रखवाली बिल्ली को थोड़े ही ...



अरुण जेटली
'' लोकतंत्र गैर निर्वाचित लोगों का तंत्र नहीं बन सकता '' जेटली जी के द्वारा कहा गया यह कथन गरिमा विहीन है क्योंकि वे स्वयं एक गैर निर्वाचित व्यक्ति हैं और जिस वक्त उन्हें भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान सरकार में वित्त-मंत्री का दर्जा प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया [ He was the party's candidate for Amritsar (replacing Navjot Singh Sidhu) for Indian general election, 2014 which he lost to Congress candidate Amarinder Singh ] [विकिपीडिया से साभार ] और अब भी वे सीधे निर्वाचित नहीं हैं बल्कि भाजपा की चुनावी रणनीति से राज्य सभा से निर्वाचित हैं जिसका रास्ता राजनीतिक दल अपने उस नेता को संसद में पहुँचाने के लिए आज़माते हैं जिसे जनता कभी भी अपने वोट दे जितना पसंद नहीं करती इसलिए इनकी कही बात तो पहले ही कोई वजन नहीं रखती और अगर हम अपने संविधान की दृष्टि से देखें तो आरम्भ से ही नकारने वाली बात है क्योंकि संविधान में सर्वोच्च न्यायालय को स्वतंत्र न्यायपालिका का दर्जा दिया गया है और संविधान के संरक्षक की जिम्मेदारी सौंपी गयी है जो कि इस परिस्थिति में नामुमकिन है जो स्थिति अरुण जेटली जी कह रहे हैं .
अनुच्छेद १२४ भारत के लिए एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना का उपबंध करता है और अनुच्छेद १२४ [३] के अनुसार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को राष्ट्रपति नियुक्त करता है किन्तु इस मामले में राष्ट्रपति को कोई वैवेकिक शक्ति नहीं प्राप्त है .अनु.१२४ [३] यह कहता है कि राष्ट्रपति न्यायाधीशों की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के पश्चात जिसे इस प्रयोजन के लिए वह आवश्यक समझे ;ही करेगा अन्य न्यायधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति सर्वदा मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से करेगा .वह उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से भी परामर्श कर सकता है .न्यायाधीशों की नियुक्ति करने की राष्ट्रपति की शक्ति एक औपचारिक शक्ति है क्योंकि वह इस मामले में मंत्रिमंडल की सलाह से कार्य करता है और न्यायधीशों की नियुक्ति के मामले में संविधान ने कार्यपालिका को आत्यंतिक शक्ति नहीं प्रदान की है कार्यपालिका को न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में ऐसे व्यक्तियों से परामर्श करना आवश्यक है जो इस विषय पर परामर्श देने के लिए पूर्ण रूप से योग्य हों और इस सम्बन्ध में संविधान का संकेत पूर्ण रूप से उच्चतम व् उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के परामर्श से ही है .
इसी आधार पर राष्ट्रपति मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति वरिष्ठता आधार पर करता रहा क्योंकि संविधान द्वारा विहित अर्हता रखने वाले किसी भी व्यक्ति को मुख्य न्यायमूर्ति नियुक्त करने की शक्ति राष्ट्रपति को प्राप्त है किन्तु अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श के लिए बाध्य है किन्तु १९५६ में विधि आयोग ने यह सुझाव दिया कि मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर नहीं वरन न्यायाधीशों के गुण और उपयुक्तता के आधार पर की जानी चाहिए जिसे सुझाव को तब नहीं माना गया और माना गया २४ अप्रैल १९७३ को जिसमे तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों श्री जे. एम.शैलेट ,श्री के.इस.हेगड़े तथा श्री एस.एन.ग्रोवर की वरिष्ठता की उपेक्षा कर श्री राय को मुख्य न्यायमूर्ति नियुक्त कर दिया और ये था न्यायपालिका की स्वतंत्रता में खुला हस्तक्षेप जिसे अगर न्यायपालिका न रोके तो संविधान के द्वारा दी गयी स्वतंत्रता को इन राजनीतिज्ञों के हाथों में गंवाते देर नहीं लगेगी और उसका परिणाम क्या होगा सब जानते हैं देश राजनीतिज्ञों के हाथों का खिलौना बन जाएगा और फिर किसी भी राजनीतिज्ञ को उसके भ्रष्टाचार की ,देश को खोखला करने की कोई सजा नहीं मिलेगी क्योंकि ये राजनीतिज्ञ वे होते हैं जो जनता को दिखाने को ''गुस्से में माँ- बेटा '' शहजादे '' बेटी -दामाद ने लूटा देश '' माँ-बेटे की सरकार ''जैसी उक्तियों का इस्तेमाल करते हैं और अपने व्यक्तिगत जीवन में उन्हीं को जन्मदिन की बधाइयाँ देते फिरते हैं सामने पड़ने पर उसी शहजादे को कन्नी काटकर नहीं जाने देते बल्कि स्वयं आगे बढ़कर गले लगा लेते हैं मतलब इन्हें उनसे कोई दिक्कत नहीं है दिक्कत केवल जनता को है और जनता के ये सिपहसालार जनता के सामने कुछ और अपनी निजी ज़िंदगी में कुछ और होते हैं और अगर ऐसे ही इन संसदीय लोकतंत्र के पहरेदारों को आम जनता की उम्मीदों के रक्षक उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की जिम्मेदारी दे दी गयी तो ये तो वही बात होगी कि ''दूध की रखवाली को बिल्ली को छोड़ दिया जाये ''और फिर जेटली जी खुद जानते हैं कि वे सही नहीं कह रहे हैं क्योंकि इस सरकार में वे और स्मृति ईरानी ऐसे गैर निर्वाचित बैठे हुए हैं जिन्हे जनता ने नाकारा था और इसी कार्यपालिका में ऐसे लोगों का होना उनकी बात को गिराने के लिए काफी है .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

मैगी प्रकरण :सरकार वही कोक-पेप्सी वाली


लैब टेस्ट में पास हुई मैगी, जल्द ‌‌किचन में होगी वापसी

मैगी के 90 नमूनों की लैब मं हुई जांच
मैगी नूडल्स निर्माता कंपनी नेस्ले इंडिया के लिए राहत भरी खबर है। नेस्ले इंडिया ने दावा किया है कि मुंबई हाईकोर्ट के आदेश पर तीन प्रयोगशालाओं में हुई जांच में मैगी के सभी नमूने सही पाए गए हैं।
प्रयोगशाला टेस्ट में पास होने के बाद नेस्ले इंडिया ने राहत की सांस ली है। वहीं नेस्ले इंडिया का कहना है कि जल्द ही मैगी की बाजार में वापसी होगी।
मैगी में लेड की मात्रा की अधिक संभावना के चलते मुबंई हाईकोर्ट के आदेश पर मैगी के 90 नमूनों की तीन प्रयोगशलाओं में जांच की गई। कोर्ट के आदेश पर तीन प्रयोगशालाओं में यह जांच की गई।
नेस्ले इंडिया की ओर से जारी एक बयान में कहा गया कि मैगी के सभी 90 नमूनों के जांच के नतीजे आ गए हैं। सभी नमूने जांच में खरे पाए गए हैं।
तीन प्रयोगशालाओं में नेस्ले इंडिया के छह प्रकार के उत्पादों के सभी 90 नमूनों को सही कारार दिया गया है। इन सभी नमूनों में लेड की मात्रा उपयुक्त यानि कि सीमा के भीतर पाई गई।[साभार अमर उजाला ]
ये तो होना ही था हमने पहले ही अपनी एक पोस्ट में इसका जिक्र किया था लिंक ये है -[मैगी -ये भारत है भाई]मैगी पर बैन लगाने वाली सरकार भी वही है जो कोका कोला और पेप्सी पर लगाने वाई थी और बाद में उन्हें टेस्ट में पास होने का इनाम देने वाली थी आज वही सरकार मैगी पर पहले बैन लगाती है बाद में उसे टेस्ट में पास कहकर फिर से रसोई का रास्ता दिखाती है क्या है इसके पीछे केवल और केवल राजनीति और ये उनकी राजनीति है जो देश को स्वच्छ करने का दावा करते हैं और स्वच्छता के नाम पर स्वयं झाड़ू लेकर चलकर दिखाते हैं और सिर्फ देश ही नहीं दुनिया में भारत का नाम नीचे करने में पीछे नहीं रहते .इनकी सारी कार्यप्रणाली ही बताती है कि ये मात्र झंडा आगे लेकर चलने में विश्वास रखते हैं क्योंकि वह सबको दिखाई देता है बाद में वह झंडे को लेकर चलने वाला उस झंडे तले कब सो जाता है यह किसी को नहीं दीखता क्योंकि कहाँ है आज वह स्वच्छता अभियान जिसके लिए माननीय प्रधानमंत्री जी ने स्वयं झाड़ू उठकर सफाई की आज केवल विश्व में यह डंका बज रहा है कि भारत एक गन्दा देश है जहाँ प्रधानमंत्री तक को सफाई के लिए झाड़ू उठानी पड़ती है .जब मैगी टेस्ट में फ़ैल हो गयी थी तब बिना कोई सुधर किये वह कैसे टेस्ट में पास हो गयी इसका जवाब इस सरकार के पास तो रटा रटाया मिलेगा पर सही जवाब जनता जानती है सरकार के हाथों में कौनसी जादू की छड़ी है इसका पता जनता के पास है इसीलिए तो कहा भी गया है -
''ये जो पब्लिक है ये सब जानती है पब्लिक है
अजी अंदर क्या है ,अजी बाहर क्या है ,
अंदर क्या है ,बाहर क्या है ,
ये सब कुछ पहचानती है पब्लिक है .''

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2015

कहे ये जिंदगी पैहम -न कोशिश ये कभी करना .



 .................................................................
दुखाऊँ दिल किसी का मैं -न कोशिश ये कभी करना ,
बहाऊँ आंसूं उसके मैं -न कोशिश ये कभी करना.
 ....................................................................
नहीं ला सकते हो जब तुम किसी के जीवन में सुख चैन ,
करूँ महरूम फ़रहत से-न कोशिश ये कभी करना .
............................................................
चाहत जब किसी की तुम नहीं पूरी हो कर सकते ,
करो सब जो कहूं तुमसे-न कोशिश ये कभी करना .
................................................................
किसी के ख्वाबों को परवान नहीं हो तुम चढ़ा सकते ,
हक़ीकत इसको दिखलाऊँ-न कोशिश ये कभी करना .
............................................................
ज़िस्म में मुर्दे की जब तुम सांसे ला नहीं सकते ,
बनाऊं लाश जिंदा को-न कोशिश ये कभी करना .
..........................................................
समझ लो ''शालिनी ''तुम ये कहे ये जिंदगी पैहम ,
तजुर्बें मेरे अपनाएं-न कोशिश ये कभी करना .
....................................................
शालिनी कौशिक
[कौशल]

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

बेटी के आंसू बहने से ,माँ रोक सकी है कभी नहीं .



Mother_and_daughter : mother and baby hands at homeMother_and_daughter : Mother and baby Stock PhotoMother_and_daughter : Sketch of little girl having fun with her beautiful mother. Vector illustration Stock Photo

बेटी मेरी तेरी दुश्मन ,तेरी माँ है कभी नहीं ,
तुझको खो दूँ ऐसी इच्छा ,मेरी न है कभी नहीं .
......................................................................
नौ महीने कोख में रखा ,सपने देखे रोज़ नए ,
तुझको लेकर मेरे मन में ,भेद नहीं है कभी नहीं .
..................................................................
माँ बनने पर पूर्ण शख्सियत ,होती है हर नारी की ,
बेटे या बेटी को लेकर ,पैदा प्रश्न है कभी नहीं .
.......................................................................
माँ के मन की कोमलता ही ,बेटी से उसको जोड़े ,
नन्ही-नन्ही अठखेली से ,मुहं मोड़ा है कभी नहीं .
.........................................................................
सबकी नफरत झेल के बेटी ,लड़ने को तैयार हूँ,
पर सब खो देने का साहस ,मुझमे न है कभी नहीं .
....................................................................
कुल का दीप जलाने को ,बेटा ही सबकी चाहत ,
बड़े-बुज़ुर्गों  की आँखों का ,तू तारा है कभी नहीं .
.......................................................................
बेटे का ब्याह रचाने को ,बहु चाहिए सबको ही ,
बेटी होने पर ब्याहने का ,इनमे साहस है कभी नहीं .
............................................................................
अपने जीवन ,घर की खातिर ,पाप कर रही आज यही ,
माफ़ न करना अपनी माँ को ,आना गर्भ में कभी नहीं .
..............................................................................
रो-रोकर माँ कहे ''शालिनी ''वसुंधरा भी सदा दुखी ,
बेटी के आंसू बहने से ,माँ रोक सकी है कभी नहीं .
.............................................................................
     शालिनी कौशिक 
            [कौशल ]

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

सुप्रीम कोर्ट : आधार अनिवार्य करे .



     उच्चतम न्यायालय को आधार की अनिवार्यता पर एक बार फिर विचार करना चाहिए क्योंकि आधार की अनिवार्यता बहुत सी धांधलियों को इस देश में रोक सकती है और सबसे बड़ी धांधली पर जिस पर इसकी अनिवार्यता से रोक लगेगी वह है इस लोकतंत्र के दुरूपयोग पर रोक क्योंकि यहाँ हर व्यक्ति को मत देने का अधिकार है और इस अधिकार का यहाँ सदुपयोग कम दुरूपयोग ज्यादा है .
लोकतंत्र जनता की सरकार कही जाती है और जनता का एक वोट देश की तकदीर बदल सकता है किन्तु जनता यहाँ जितनी ईमानदारी से अपना कर्त्तव्य निभाती है सब जानते हैं .पहले जब वोटर आई.डी. कार्ड नहीं होता था तब एक ही घर से राजनीति में भागीदारी के इच्छुक लोग ऐसे ऐसे लोगों के वोट बनवा लेते थे जिनका दुनिया में ही कोई अस्तित्व नहीं होता था फिर धीरे धीरे फोटो पहचान पत्र आये और इनके कारण बहुत सी वोट ख़त्म हो गयी किन्तु वोट के नाम पर की जाने वाली धांधली ख़त्म नहीं हुई .बहुत से ऐसे वोटर हैं जिनके पास एक ही शहर में अलग अलग पतों के वोटर कार्ड हैं और यही नहीं ऐसी बेटियों की वोट अभी भी वर्त्तमान में है जिनकी शादी हो गयी और वे अपने घर से विदा हो गयी और ऐसे में उनकी वोट मायके वाले भी रखते हैं और ससुराल वाले भी और वे दोनों जगह ही अपने फोटो पहचान पत्र के साथ अपना सिर गर्व से उठाकर वोट करती हैं किन्तु ये हमारे लोकतंत्र के साथ कितना बड़ा धोखा है जहाँ चालबाजियां चलकर उम्मीदवार व् उनके समर्थक अपनी वोट बढ़ा लेते हैं ऐसे में आधार कार्ड ही वह सफल योजना है जिसके दम पर इस तरह की धांधलियों को रोका जा सकता है क्योंकि ये सारे देश में एक ही होता है .आदमी चाहे यू.पी. का हो या पंजाब का और फिर ये केवल एक वोट की बात नहीं और भी बहुत सी सरकारी योजनाओं की बात है .सरकार की बहुत सी योजनाएं ऐसी हैं जिनका लाभ सभी लोगों तक नहीं पहुँच पाता  उसका कारण भी यही है कि कुछ चालबाज लोग इस तरह की धांधलियों से उन योजनाओं का लाभ हड़प जाते हैं .वे एक ही व्यक्ति को कई व्यक्ति साबित कर देते हैं और उसे बार बार वह लाभ दिलाकर अपने लिए सरकारी पैसा जमा कर लेते हैं .
    ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को आधार कार्ड की अनिवार्यता को ख़त्म करने का नहीं अपितु सरकार को उसे जल्दी पूरा करने का निर्देश देना चाहिए तभी सरकार जनता की सही हितैषी हो सकती है और सुप्रीम कोर्ट सही रूप में न्याय की संरक्षक क्योंकि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए बल्कि वह दिखना भी चाहिए और वह तभी सम्भव है जब कि व्यक्ति का एक ही अस्तित्व हो न कि स्याही मिटाकर दूसरा .
शालिनी कौशिक 
   [कौशल ]

बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

नारी रूप में जन्म न देना प्रभु


 कई बार पहले भी देख चुकी 'चक दे इंडिया' को फिर एक बार देख रही थी .बार बार कटु शब्दों से भारतीय नारी का अपमान किया गया किन्तु एक वाकया जिसने वाकई सोचने को मजबूर कर दिया और भारतीय नारी की वास्तविक स्थिति को सामने लाकर खड़ा कर दिया वह वाक्य कहा था फ़िल्म में क्रिकेट खिलाडी अभिमन्यु सिंह ने चंडीगढ़ की हॉकी खिलाडी प्रीति से ,
''हार जाओगी तो मेरी बीवी बनोगी ,जीत जाओगी तो भी मेरी बीवी बनोगी ऐसा तो नहीं है कि वर्ल्ड कप से से आओगी तो सारा हिंदुस्तान तुम्हारा नाम जप रहा होगा .''
कितना बड़ा सच कहा अभिमन्यु ने और इससे हटकर भारतीय नारी की स्थिति और है भी क्या ,फ़िल्म में काम करती है तो हीरो के बराबर मेहनत किन्तु मेहनताना कम ,खेल में खेलने में बराबर मेहनत किन्तु पुरुष खिलाडी के मुकाबले कम मैच फीस .खेलों में क्रिकेट में पुरुष टीम भी और महिला टीम भी किन्तु पुरुष टीम के पीछे पूरा भारत पागल और महिला टीम के प्रति स्वयं महिला भी नहीं .पुरुष टीम वर्ल्ड कप जीत लाये इसके लिए एक महिला [पूनम पांडे ] निर्वस्त्र तक होने को तैयार जबकि पुरुषों में महिला टीम के प्रदर्शन तक को लेकर कोई क्रेज़ नहीं .
हमारे एक अंकल की बेटी ने जब अंकल से कहा कि आपने हमारी पढाई के लिए कुछ नहीं किया जो किया मम्मी ने किया तो वे कहते हैं कि वह क्या कर सकती थी ,वह क्या एक भी पैसा कमाती थी ? ये है एक नारी के अपनी ज़िंदगी अपने परिवार के लिए ,बच्चों के लिए स्वाहा कर देने की कीमत कि उसके लिए उसके परिवार तक में उसके बीमार पड़ने पर कह दिया जाता है ''कि अपने कर्म भुगत रही है ''जबकि वही नारी जब अपने पति को बीमारी की गम्भीर अवस्था में देखती है तो अपनी ताकत से बाहर अपनी क्षमता जाग्रत करती है और सावित्री बन सत्यवान के प्राण तक यमराज से छीन लाती है .
आज हर तरफ महिलाएं छायी हुई हैं ,घर तो उनका कार्यक्षेत्र है ही और उनके बिना घर में गुजारा भी नहीं है ,गावों में खेतों में महिलाएं पुरुषों के साथ खेत पर मेहनत करती हैं और घर के भी सारे काम निबटाती हैं .शहरों में नौकरी भी करती हैं और सुबह को काम पर जाने से पहले और काम से आने के बाद भी घर के काम निबटाती हैं और कितने ही काम इनके ऑफिस से छुट्टी के दिन इकट्ठे रहते हैं अर्थात नौकरी से भले ही अवकाश हो किन्तु उनके लिए अवकाश नाम की चीज़ नहीं .छुट्टी वाले दिन जहाँ आदमी पैर पसार कर सोते हैं या सिनेमा हाल में फ़िल्म देख दोस्तों के साथ हंसी मजाक में व्यतीत करते हैं वहीँ महिलाएं हफ्ते भर के इकट्ठे गंदे कपडे धोती हैं ,मसाले तैयार करती हैं ,कपड़ों पर प्रैस आदि का काम करती हैं और इस सबके बावजूद उसकी अक्ल घुटनों में ,वह करती ही क्या है ,ऐसे विशेषणों से नवाज़ी जाती है ,उसी के जन्म पर आंसू बहाये जाते हैं और रोने वालों में पुरुषों से आगे बढ़कर नारियां ही होती हैं .
आज तक न तो पुरुष ने नारी की कद्र की और न नारी ने स्वयं नारी की ,दोनों के लिए ही वह बेकार है और ऐसी बेकार है जिसकी बहु रूप में तो आवश्यकता है बेटे का घर बसाने के लिए किन्तु बेटी रूप में नहीं ,माँ रूप में तो ज़रुरत है बच्चे के पालन पोषण के लिए किन्तु बच्चे के रूप में नहीं और इसलिए सही कहा अभिमन्यु सिंह ने कि नारी की एक ही नियति है ''पुरुष की गुलामी ''स्वयं करे या अपने परिजनों के कहने पर करे ,अरैंज करे या लिव इन में रहे हर हाल में उसे यही करना है और यदि नहीं करती है तो कुल्टा कह समाज में तिरस्कृत किया जाता है और ऐसे परिणाम से बचने के लिए भी वह पुरुष के ही वश में होती है और इसलिए शायद यही प्रार्थना करती है कि-हे प्रभु अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 3 अक्तूबर 2015

बैंकों व् डाकघरों को कबाड़घर बनाया इंटरनेट ने


बैंक और डाकघर भारतीय नागरिक के लिए आज एक आवश्यकता बन चुके हैं और भारतीय सरकार ने इनके सञ्चालन में पूरी ईमानदारी बरतते हुए अपनी जिम्मेदारी को निभाया है .आइये पहले नज़र डालें भारत में अब तक की बैंकिंग व् डाकघरों की व्यवस्था पर संक्षेप में -


भारत में बैंकिंग

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
भारत की बैंकिंग-संरचना
भारत में आधुनिक बैंकिंग सेवाओं का इतिहास दो सौ वर्ष पुराना है।
भारत के आधुनिक बैंकिंग की शुरुआत ब्रिटिश राज में में हुई। १९वीं शताब्दी के आरंभ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने ३ बैंकों की शुरुआत की - बैंक आफ बंगाल १८०९ में,बैंक ओफ़ बॉम्बे १८४० में और बैंक ओफ़ मद्रास १८४३ में। लेकिन बाद में इन तीनों बैंको का विलय एक नये बैंक 'इंपीरियल बैंक' में कर दिया गया जिसे सन १९५५ में 'भारतीय स्टेट बैंक' में विलय कर दिया गया। इलाहबाद बैंक भारत का पहला निजी बैंक था।भारतीय रिजर्व बैंक सन १९३५ में स्थापित किया गया था और बाद में पंजाब नेशनल बैंकबैंक ऑफ़ इंडियाकेनरा बैंक और इंडियन बैंक स्थापित हुए।
प्रारम्भ में बैंकों की शाखायें और उनका कारोबार वाणिज्यिक केन्द्रों तक ही सीमित होती थी। बैंक अपनी सेवायें केवल वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों को ही उपलब्ध कराते थे। स्वतन्त्रता से पूर्व देश के केन्द्रीय बैंक के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक ही सक्रिय था। जबकि सबसे प्रमुख बैंक इम्पीरियल बैंक आफ इण्डिया था। उस समय भारत में तीन तरह के बैंक कार्यरत थे - भारतीय अनुसूचित बैंक, गैर अनुसूचित बैंक और विदेशी अनुसूचित बैंक।
स्वतन्त्रता के उपरान्त भारतीय रिजर्व बैंक को केन्द्रीय बैंक का दर्जा बरकरार रखा गया। उसे बैंकों का बैंक भी घोषित किया गया। सभी प्रकार की मौद्रिक नीतियों को तय करने और उसे अन्य बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं द्वारा लागू कराने का दायित्व भी उसे सौंपा गया। इस कार्य में भारतीय रिजर्व बैंक की नियंत्रण तथा नियमन शक्तियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
ये तो रही है आज तक की बैंकिंग व्यस्था, पर आज इंटरनेट का युग है और अब हो रही है शुरुआत इंटरनेट बैंकिंग की जिसका विवरण संक्षेप में इस प्रकार है -
ऑनलाइन बैंकिंग

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
चित्र:Internet Banking no name.JPG
सुरक्षा टोकन उपकरण
नेट बैंकिग जिसे ऑनलाइन बैंकिंग या इंटरनेट बैंकिंग भी कहते हैं, के माध्यम से बैंक-ग्राहक अपने कंप्यूटरद्वारा अपने बैंक नेटवर्क और वेबसाइट का प्रचालन कर सकते है। इस प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ है कि कोई भी व्यक्ति घर या कार्यालय या कहीं से भी से बैंक सुविधा का लाभ उठा सकता है। ऑनलाइन बैंकिंग इंटरनेट पर बैंकिंग संबंधी मिलनेवाली एक सुविधा है, जिसके माध्यम से कंप्यूटर का इस्तेमाल कर उपभोक्ता बैंकों के नेटवर्क्स और उसकी वेबसाइट पर अपनी पहुंच बना सकता है और घर बैठे ही खरीददारी, पैसे का स्थानांतरण के अलावा अन्य तमाम कार्यों और जानकारी के लिए बैंकों से मिलने वाली सुविधा का लाभ उठा सकता है।[1] भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी किये गए शुरुआती आंकड़ों के अनुसार अप्रैल २००८ से जनवरी २००९ तक इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से ५५.८५८५ करोड़ रुपए का लेनदेन किया गया।[2]किन्तु इस लाभ पर प्रश्वनिह्न भी लग जाता है, जब आजकल फिशिंग द्वारा तकनीक के दुरुपयोग से इंटरनेट के जालसाज लोगों के खातों को हैक कर उन्हें हानि पहुंचा रहे हैं।[3] ऐसे में आवश्यक है कि नेट बैंकिंग के प्रयोग में अत्यंत सावधानियां बरती जाएं। नेट बैंकिंग का प्रयोग करते हुए उपयोक्ता को यूआरएल की जांच कर लेनी चाहिये। कई रिपोर्ट द्वारा ये पुष्टि होती है, कि प्रयोग की जाने वाली ५० प्रतिशत वेबसाइट असुरक्षित होती हैं। ऐसे में नेट सर्फिंग करने वाले व्यक्ति के लिये से यह अत्यंत आवश्यक है कि वह पूरी जाँच के उपरांत ही वेबसाइट खोले। किसी भी साइट के यूआरएल पते और डोमेन जांच करें और देखें कि यह उसी बैंक के यूआरएल और डोमेन की तरह हो, ऐसे में यह संभावना काफी हद तक प्रबल हो जाती है कि उपयोक्ता सुरक्षित वेबसाइट का प्रयोग कर रहे हैं। नेट बैंकिंग सेवा का प्रयोग करने वालों को इसे प्रत्येक तीन दिनों में जांचते रहना चाहिये।
ऑनलाइन बैंकिंग में क्रेडिट कार्ड का भी प्रयोग किया जा सकता है
इसके साथ ही उपयोक्ता को चाहिये कि वे इस सेवा का बाहर प्रयोग न करें। नेट बैंकिंग के लिए इंटरनेट कैफे और सांझे कंप्यूटर का प्रयोग इस सुविधा हेतु कम करें और यदि कैफे या सांझे कंप्यूटर से प्रयोग करते भी हैं, तो अपना पासवर्ड नियमित रूप से बदलते रहें। यह सुरक्षित तरीका रहेगा। उपयोक्ता अपने कंप्यूटर सिस्टम को सीधे बंद न करें।[3] प्रायः लोग ब्राउजर बंद कर कंप्यूटर सीधे बंद कर देते हैं जो असुरक्षित हो सकता है। हमेशा कंप्यूटर सिस्टम ठीक से लॉग ऑफ करें।[1] इसके अलावा अपने पासवर्ड का पूरा एवं उचित व सुरक्षित उपयोग करें। अपने पासवर्ड को किसी कागज पर न लिखें। इसे सरलता से हैक किया जा सकता है। अपनी मशीन में पावर ऑन पासवर्ड डाल दें ताकि उनके अलावा कोई और उनकी मशीन न खोल सके। सिस्टम पर स्क्रीनसेवर पासवर्ड डाल दें ताकि कोई और सिस्टम का प्रयोग न कर सके। इन कुछ बातों का ध्यान रखकर नेट बैंकिंग सुविधा का पूरा एवं सुरक्षित लाभ उठाया जा सकता है।
अब करते हैं बात डाकघरों की ,जो आम आदमी से उनके घर की ही तरह जुड़े हैं और इनसे जुड़ते हुए आदमी को यह संकोच नहीं होता कि वह कहीं गैर बिरादरी में जुड़ रहा है .अपने घर का सा वातावरण मिलता है डाकघर से और यही वजह है इस व्यवस्था की सफलता की .आइये जाने एक बार इस व्यवस्था के बारे में -

भारतीय डाक

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
भारतीय डाक सेवा का पोस्ट बॉक्स
भारतीय डाक सेवा (अंग्रेज़ीIndia Postभारत सरकार द्वारा संचालित डाकसेवा है जो ब्रांड नाम के तौर पर इंडिया पोस्ट या भारतीय डाक के नाम से काम करती है।

सैकड़ों साल से जारी सफर[संपादित करें]

भारतीय डाक प्रणाली का जो उन्नत और परिष्कृत स्वरूप आज हमारे सामने है, वह हजारों सालों के लंबे सफर की देन है। अंग्रेजों ने डेढ़ सौ साल पहले अलग-अलग हिस्सों में अपने तरीके से चल रही डाक व्यवस्था को एक सूत्र में पिरोने की जो पहल की, उसने भारतीय डाक को एक नया रूप और रंग दिया। पर अंग्रेजों की डाक प्रणाली उनके सामरिक और व्यापारिक हितों पर केंद्रित थी। भारत की आजादी के बाद हमारी डाक प्रणाली को आम आदमी की जरूरतों को केंद्र में रख कर विकसित करने का नया दौर शुरू हुआ। नियोजित विकास प्रक्रिया ने ही भारतीय डाक को दुनिया की सबसे बड़ी और बेहतरीन डाक प्रणाली बनाया है। राष्ट्र निर्माण में भी डाक विभाग ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई है और इसकी उपयोगिता लगातार बनी हुई है। आम आदमी डाकघरों और पोस्टमैन पर अगाध भरोसा करता है। तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद इतना जन विश्वास कोई और संस्था नहीं अर्जित कर सकी है। यह स्थिति कुछ सालों में नहीं बनी है। इसके पीछे बरसों का श्रम और सेवा छिपी है।

और अब इसे भी जोड़ा गया है इंटरनेट से ,जो स्थिति ये है -

ePayment

ePayment
e-Payment is a smart option for businesses and organizations to collect their bills or other payments through Post Office network. When businesses require collection of bills and other payments from customers across the country, Post Office offers them a simple and convenient solution in the form of e-Payment.
e-Payment is a many-to-one solution which allows collection of money (telephone bills, electricity bills, examination fee, taxes, university fee, school fee etc.) on behalf of any organization. The collection is consolidated electronically using web based software and payment is made centrally through cheque from a specifed Post Office of biller's choice.
The information and MIS regarding the payment can be had by the biller online. The MIS will contain the five fields of biller's choice like name, telephone number, application number etc. The service is currently available through more than 14,000 Post Offices across the country.
There is no agency in the market today with a large reach and established trust as the Post Office where the public can comfortably deposit all their bills in their neighbourhood.
और इससे क्या स्थिति बनी जरा वह भी देखी जाये -

ePOST: Bridging the Digital Divide

In the recent past, Internet and e-mail have revolutionized the world of communications. At the same time, accessibility to email continuous to be a major problem for many people, especially in the rural areas. In its endeavor to make the benefits of e-mail available to everyone and to bridge the digital divide, Department of Posts has introduced ePOST service.
Through ePOST, customers can send their messages to any address in India with a combination of electronic transmission and physical delivery through a network of more than 1,55,000 Post Offices. ePOST sends messages as a soft copy through internet and at the destination it will be delivered to the addressee in the form of hard copy. ePOST costs just Rs. 10 per page of A4 size.
ePOST can also be availed by the corporate customers, by having a business agreement with India Post. Corporate customers will get special ePOST rates and other value additions.
For Business Contact-
B D & M Directorate,Department of Posts, MOC & IT, New Delhi - 110001
Ph. 91-11-23096148,23096152, e-mail: epost[at]indiapost[dot]gov[dot]in

     और जनकल्याण हेतु की गयी ये व्यवस्था आज जन-जन की परेशानी का कारण बन चुकी है .घंटो घंटो बैंकों और डाकघरों में लोग लाइन बनकर खड़े रहते हैं और देरी का कारण पूछे जाने पर पता चलता है कि सर्वर धीरे काम कर रहा है चलिए काम तो कर रहा है ये सोच लोग कभी पसीना पोछ तो आपस में बातचीत कर हंसी मजाक कर समय काट लेते हैं किन्तु जब पता चलता है कि सर्वर काम ही नहीं कर रहा है तो उनकी समझ में ये नहीं आता कि अब क्या करें क्योंकि अपना सारा वक्त और कामों से निकालकर वे वहां पहुँचते हैं और उनके मन में ये ही आता है कि कर्मचारी काम से बचने के लिए ये झूठ बोल रहा है जबकि वास्तव में कर्मचारी की भी कोई गलती नहीं होती लेकिन ये निश्चित है कि एक दिन ये सर्वर कर्मचारियों को पिटवाएगा और बैंको व् डाकघरों में हड़ताल करवाएगा .बैंक के कर्मचारी तो फिर भी पीटने से बच जायेंगे क्योंकि उन्हें पुलिस सुरक्षा मिली हुई है बेचारे डाककर्मियों का क्या होगा भविष्य पर ही निर्भर है .अभी निश्चित रूप में कहा जा सकता है कि भारत में अभी इंटरनेट बैंकिंग व् पोस्ट सर्विस के लिए उपयुक्त परिस्थितियां नहीं हैं .सरकार को इंटरनेट सर्विस की अनुपलब्धता की स्थिति में हाथों से काम करने की आदेश जारी करने होंगे नहीं तो स्थितियां बिगड़ते देर नहीं लगेगी .
शालिनी कौशिक 
 [कौशल ]


राजीव गांधी :अब केवल यादों में - शत शत नमन

एक  नमन  राजीव  जी  को  आज उनकी जयंती के अवसर  पर.राजीव जी बचपन से हमारे प्रिय नेता रहे आज भी याद है कि इंदिरा जी के निधन के समय हम सभी क...