रविवार, 23 अगस्त 2015

सत्ता और न्यायालय पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गुनहगार



akhilesh yadav, bsp
बेंच पर सरकार का गोलमोल जवाब
रालोद ने उठाया मुद्दा, विधानसभा से प्रस्ताव पारित करने का आग्रह
अमर उजाला ब्यूरो
लखनऊ। विधानसभा में बृहस्पतिवार को राष्ट्रीय लोकदल के दलबीर सिंह ने पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना की मांग उठाई। उन्होंने इसके लिए सदन में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करने का आग्रह किया।
सरकार ने इस मुद्दों पर गोलमोल जवाब दिया। हालांकि बसपा ने कहा कि प्रदेश विभाजन होने से बेंच की मांग खुद पूरी हो जाएगी।
दलबीर सिंह ने कहा कि सस्ते और सुलभ न्याय के लिए पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना की स्थापना जरूरी है। पश्चिमी यूपी के कई जिलों के लोगों को न्याय पाने के लिए 800 किमी की दूरी तय करके इलाहाबाद जाना जाना पड़ता है। 22 जिलों में बेंच के लिए आंदोलन चल रहा है। वकील सप्ताह में एक दिन हड़ताल पर रहते हैं। संसदीय कार्यमंत्री आजम खां ने कहा कि बुनियादी तौर पर यह मांग केंद्र सरकार से जुड़ी है। सदन से पहले प्रस्ताव पारित करके भेजा जा चुका है। उन्होंने दलबीर सिंह को सलाह दी कि इस मुद्दों को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर करें। हाईकोर्ट के आदेश हो जाएंगे तो बेंच बन जाएगी। इस पर दलबीर सिंह ने कहा कि वह इस मुद्दे पर सरकार का स्पष्ट मत
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वेस्ट में बेंच के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर करें ः आजम
सूबे को 4 हिस्सों में बांटों तो हाईकोर्ट मिल जाएंगे :
बसपा [अमर उजाला से साभार ] 

ये हाल बनाया है आज के सत्ताधारियों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच का कि लगता है कोई हंसी मजाक की बात हो रही है जबकि - पश्चिमी यू.पी.उत्तर प्रदेश का सबसे समृद्ध क्षेत्र है .चीनी उद्योग ,सूती वस्त्र उद्योग ,वनस्पति घी उद्योग ,चमड़ा उद्योगआदि आदि में अपनी पूरी धाक रखते हुए कृषि क्षेत्र में यह उत्तर प्रदेश सरकार को सर्वाधिक राजस्व प्रदान करता है .इसके साथही अपराध के क्षेत्र में भी यह विश्व में अपना दबदबा रखता है .यहाँ का जिला मुजफ्फरनगर तो बीबीसी पर भी अपराध के क्षेत्रमें ऊँचा नाम किये है और जिला गाजियाबाद के नाम से एक फिल्म का भी निर्माण किया गया है .यही नहीं अपराधों कीराजधानी होते हुए भी यह क्षेत्र धन सम्पदा ,भूमि सम्पदा से इतना भरपूर है कि बड़े बड़े औद्योगिक घराने यहाँ अपने उद्योगस्थापित करने को उत्सुक रहते हैं और इसी क्रम में बरेली मंडल के शान्ह्जहापुर में अनिल अम्बानी ग्रुप के रिलायंस पावर ग्रुपकी रोज़ा विद्युत परियोजना में २८ दिसंबर २००९ से उत्पादन शुरू हो गया है .सरकारी नौकरी में लगे अधिकारी भले ही न्यायविभाग से हों या शिक्षा विभाग से या प्रशासनिक विभाग से ''ऊपर की कमाई'' के लिए इसी क्षेत्र में आने को लालायित रहते हैं.इतना सब होने के बावजूद यह क्षेत्र पिछड़े हुए क्षेत्रों में आता है क्योंकि जो स्थिति भारतवर्ष की अंग्रेजों ने की थी वही स्थितिपश्चिमी उत्तर प्रदेश की बाकी उत्तर प्रदेश ने व् हमारे भारतवर्ष ने की है .



          आज पश्चिमी यूपी में मुकदमों की स्थिति ये है कि अगर मुकदमा लड़ना बहुत ही ज़रूरी है तो चलो इलाहाबाद समझौते की गुंजाईश न हो ,मरने मिटने को ,भूखे मरने कोतैयार हैं तो चलिए इलाहाबाद ,जहाँ पहले तो बागपत से ६४० किलोमीटर ,मेरठ से ६०७ किलोमीटर ,बिजनोर से ६९२किलोमीटर ,मुजफ्फरनगर से ६६० किलोमीटर ,सहारनपुर से ७५० किलोमीटर ,गाजियाबाद से ६३० किलोमीटर ,गौतमबुद्धनगर से ६५० किलोमीटर ,बुलंदशहर से ५६० किलोमीटर की यात्रा कर के धक्के खाकर ,पैसे लुटाकर ,समय बर्बाद कर पहुँचोफिर वहां होटलों में ठहरों ,अपने स्वास्थ्य से लापरवाही बरत नापसंदगी का खाना खाओ ,गंदगी में समय बिताओ और फिरन्याय मिले न मिले उल्टे पाँव उसी तरह घर लौट आओ .ऐसे में १९७९ से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट खंडपीठ केआन्दोलन कारियों में से आगरा के एक अधिवक्ता अनिल प्रकाश रावत जी द्वारा विधि मंत्रालय से यह जानकारी मांगी जानेपर -''कि क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खंडपीठ स्थापना के लिए कोई प्रस्ताव विचाराधीन है ?''पर केन्द्रीय विधि मंत्रालय केअनुसचिव के.सी.थांग कहते हैं -''जसवंत सिंह आयोग ने १९८५ में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठस्थापित करने की सिफारिश की थी .इसी दौरान उत्तराखंड बनने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिले उत्तराखंड केअधिकार क्षेत्र में चले गए वहीँ नैनीताल में एक हाईकोर्ट की स्थापना हो गयी है .इस मामले में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश कीराय मागी गयी थी .इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की किसी शाखा कीस्थापना का कोई औचित्य नहीं पाया है .'' सवाल ये है कि क्या उत्तराखंड बनने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाईकोर्टसे दूरी घट गयी है ?क्या नैनीताल हाईकोर्ट इधर के मामलों में दखल दे उनमे न्याय प्रदान कर रही है ?और अगर हाईकोर्ट केमाननीय मुख्य न्यायाधीश को इधर खंडपीठ की स्थापना का कोई औचित्य नज़र नहीं आता है तो क्यों?क्या घर से जाने परयदि किसी को घर बंद करना पड़ता है तो क्या उसके लिए कोई सुरक्षा की व्यवस्था की गयी है ?जबकि यहाँ यू.पी.में तो ये हालहै कि जब भी किसी का घर बंद हो चाहे एक दिन को ही हो चोरी हो जाती है .और क्या अपने क्षेत्र से इलाहाबाद तक के सफ़र केलिए किसी विशेष सुविधा की व्यवस्था की गयी है ?.क्या इलाहाबाद में वादकारियों के ठहराने व् खाने के लिए कोई व्यवस्था कीगयी है ?जबकि वहां तो रिक्शा वाले ही होटल वालों से कमीशन खाते हैं और यात्रियों को स्वयं वहीँ ले जाते हैं .और क्या मुक़दमेलड़ने के लिए वादकारियों को वाद व्यय दिया जाता है या उनके लिए सुरक्षा का कोई इंतजाम किया जाता है ?जबकि हाल तो येहै कि दीवानी के मुक़दमे आदमी को दिवालिया कर देते हैं और फौजदारी में आदमी कभी कभी अपने परिजनों व् अपनी जान सेभी हाथ धो डालता है .पश्चिमी यू.पी .की जनता को इतनी दूरी के न्याय के मामले में या तो अन्याय के आगे सिर झुकानापड़ता है या फिर घर बार लुटाकर न्याय की राह पर आगे बढ़ना होता है . 
            न्याय का क्षेत्र यदि हाईकोर्ट व् सरकार अपनी सहीभूमिका निभाएं तो बहुत हद तक जन कल्याण भी कर सकती है और न्याय भी .आम आदमी जो कि कानून की प्रक्रिया केकारण ही बहुत सी बार अन्याय सहकर घर बैठ जाता है .यदि सरकार सही ढंग से कार्य करे तो लोग आगे बढ़ेंगे .यदि हाईकोर्टसरकार सही ढंग से कार्य करें .यह हमारा देश है हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था है फिर हमें ही क्यों परेशानी उठानी पड़ती है ?अधिवक्ताओं के इस आंदोलन को लेकर प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी पक्ष में थे और  प्रधानमंत्री प्रसिद्द  किसान नेता चौधरी चरण सिंह भी किन्तु किसी ने भी इस सम्बन्ध में अधिवक्ताओं का साथ नहीं दिया और यही कार्यप्रणाली आज की भाजपा सरकार अपना रही है इस पार्टी के गृह मंत्री राजनाथ सिंह पहले अधिवक्ताओं  को आश्वासन देते हैं कि यह मुद्दा सरकार के एजेंडे में है और सत्र के बाद इस पर सकारात्मक फैसला होगा और बाद में ये कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि मैंने हाईकोर्ट विभाजन समबन्धी कोई बयान नहीं दिया और यही काम हाईकोर्ट कर रही है इस  मुद्दे का सही व् सकारात्मक हल करने की बजाय वह अधिवक्ताओं को भड़का रही है किन्तु सरकार और हाईकोर्ट का अभी तक भी इस संबंध में इधर के प्रति कोई सकारात्मक  रुख दिखाई नहीं दिया है ऐसे में यह लगता ही नहीं है कि यहाँ प्रजातंत्र है हमारी सरकार है .जब अपने देश में अपनी सरकार से एक सही मांग मनवाने के लिए ३०-४० वर्षों तक संघर्ष करना पड़ेगा तब यह लगना तो मुश्किल ही है .
    और उपरोक्त तथ्यों के आधार पर हम न्याय के मंदिर की भूमिका  भी इस समस्या के समाधान में सकारात्मक नहीं कह सकते क्योंकि दोनों ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता के न्याय के हक़ को मार रहे हैं जबकि अगर ये दोनों अपनी सही जिम्मेदारी को निभाएं तो संविधान की मर्यादा को ,जनता को दिए न्याय के अधिकार को पूरा कर पाएंगे .
शालिनी कौशिक 
   [कौशल ]

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

पहले अपना घर तो सुधारे भाजपा .

आज के समय में चारों तरफ उत्तर प्रदेश में महिलाओं पर हो रहे हमलों को लेकर एक खौफनाक दृश्य उपस्थित किया जा रहा है और ऐसे हालत उपस्थित किये जा रहे हैं जैसे उत्तर प्रदेश एकमात्र ऐसा राज्य हो जहाँ ऐसा हो रहा है जबकि हालत इस समय पूरे देश में लगभग यही हैं बस बदनाम केवल उत्तर प्रदेश को किया जा रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जिसकी लोकसभा में सर्वाधिक सीट हैं और यहाँ पर शासन करने का भाजपा का पुराना व् सबसे हसीन  सपना रहा है और इसीलिए सारे देश में उत्तर प्रदेश सरकार को बदनाम करने की साजिश रची जा रही है उसे अपने ही शासित राज्य नहीं दिखाई दे रहे जहाँ स्थिति कमोबेश यही है और महिला वहां भी सुरक्षित नहीं है .ये बात महज एक बात नहीं है बल्कि निम्नलिखित समाचार भी इसकी पुष्टि करने हेतु पर्याप्त हैं -
उत्तर प्रदेश 
A minor gangraped in Lucknow.

तस्वीरें: लखनऊ में चलती कार में छात्रा से हुआ गैंगरेप, कोहराम

राजधानी लखनऊ में दिनदहाड़े हुए रेप की वारदात ने लोगों को हिलाकर रख दिया हैं। वहीं, घटना पर पुलिस के रूख से भी लोगों में नाराजगी है।
A teenaged girl kidnapped and gangraped in Lucknow.

UP: आठवीं की छात्रा से कार में गैंगरेप कर सड़क पर फेंका

छात्रा स्कूल से निकलने के बाद ऑटो का इंतजार कर रही थी कि तभी किसी ने उसके मुंह पर कपड़ा डाला और कार में डालकर लेकर चले गए।
मध्य प्रदेश 
two woman gangraped, one killed

पति के दोस्तों ने शराब पिलाकर लूटी महिला की आबरू

मध्यप्रदेश के मुरैना में एक दलित महिला से सामूहिक दुष्कर्म कर आरोपियों ने उसे जिंदा जला दिया जबकि दूसरी महिला की गैंगरेप कर हत्या कर दी गई
70 years old woman raped by her real son

रोती रही पत्‍नी, पति करता रहा बूढ़ी मां से बलात्कार

भोपाल में सनसनीखेज मामला सामने आया है जहां एक व्यक्ति ने अपनी बूढ़ी मां को बंधक बनाकर उससे बलात्कार किया।
राजस्थान

बाबा ने आश्रम में किशोरी से किया बलात्कार

monk raped with a teenager in ashram
राजस्‍थान के झुंझनू में एक आश्रम में एक किशोरी से बलात्कार का सनसनीखेज मामला सामने आया है।
बूढ़े ने मासूम को बनाया हवस का शिकार
तमिलनाडु 
69 साल के दादा ने मासूम पोती को बनाया हवस का शिकार
तमिलनाडु के कोयंबटूर में मानवीय रिश्तों को शर्मसार कर देने वाली दो घटनाएं सामने आई हैं। एक घटना ने तो बुजुर्गों और सगे रिश्तों से ही भरोसा उठा दिया है। एक मामले में 69 साल के दादा को अपनी 7 साल की मासूम पोती को हवस का शिकार बनाने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है।

दूसरे मामले में एक 20 साल के युवक को अपने रिश्तेदार की 10 वर्षीय बेटे को यौन शोषण करने का मामला सामने है। 69 साल के बुजुर्ग पर पिछले एक साल से मासूम पोती से छेड़छाड़ कर रहा था। ‌आरोपी बुजुर्ग शहर के पोडानूर इलाके में रहता है। जबक‌ि दूसरी घटना पोलाची इलाके की है।

पुलिस ने शिकायत के आधार पर दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया है और रिमांड में लेकर उनसे पूछताछ कर रही है। पुलिस ने बताया ‌कि आरोपी युवक रविवार को अपने रिश्तेदार के यहां खेलने के लिए आया था और वह घर से पीड़ित लड़के को ले गया, इसके बाद उसने उसका यौन शोषण किया।
अब ऐसे में केवल यही कहा जा सकता है कि पहले देश में सभी जगह महिलाओं के लिए रहने योग्य माहौल तैयार करना हमारी वर्तमान सरकार का दायित्व है यदि वह इसमें सफल हो जाये तभी किसी पर कीचड उछालती  सही लगेगी वर्ना तो उसके लिए वक़्त फिल्म में कहा गया अभिनेता राजकुमार का वही डायलॉग दोहराना पड़ सकता है -
''चुनार सेठ ! शीशे के घर में रहने वाले दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं मारते .''

शालिनी कौशिक 
  [कौशल ]
 

शनिवार, 15 अगस्त 2015

आजादी ,आन्दोलन और हम



[गूगल से साभार]
आज सुबह जब मैं नाश्ता तैयार कर रही थी तभी तभी खिड़की की ओर से दो आवाज़ सुनाई दी एक दूसरे से पूछ रहा था ,''स्कूल नहीं गया?'' ,तो जवाब सुनाई दिया ,''कि नहीं !आज छुट्टी है ''कितने अफ़सोस की बात है कि जिस दिन के लिए हमारे वीरों ने अपने प्राणों की क़ुरबानी दी हम उस दिन के लिए ऐसे भाव रखते हैं.''यूँ तो पहले से ही अफ़सोस था कि आज हम अपनी छत पर तिरंगा नहीं फहरा पाए और वह केवल इस कारण कि हमारे यहाँ बन्दर बहुत हैं और अभी २६ जनवरी को उन्होंने हमारे तिरंगे को कुछ नुकसान पहुंचा दिया था और हम कुछ नहीं कर पाए थे .हम नहीं चाहते थे कि हमारी थोड़ी सी लापरवाही हमारे तिरंगे के लिए हानिकारक साबित हो ,वो भी उस तिरंगे के लिए जिसकी आन के लिए न जाने कितने वीर शहीद हो गए .जिसके लिए महात्मा गाँधी ने कहा था -''लाखों लोगों ने ध्वज की आन के लिए कुर्बानियां दी हैं .भारत में रहने वाले हिन्दू ,मुस्लिम ,सिक्ख ,ईसाई सभी के लिए ज़रूरी है कि एक ध्वज के लिए जिए और मरें. '' हमारे घर में तो हमें स्वतंत्रता का महत्व बताया गया और इसकी प्राप्ति के लिए बलिदानों की लम्बी कहानी से भी परिचित कराया गया किन्तु लगता है कि आज के माता-पिता शायद इस ओर अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह नहीं कर रहे हैं .और अपने बच्चों को इस दिशा में मार्गदर्शन नहीं दे रहे हैं और इसी का परिणाम है कि आज के बच्चे इस दिन को छुट्टी मान रहे हैं.साथ ही इसकी कुछ जिम्मेदारी आज के शिक्षकों पर भी आती है जो बच्चों को स्मार्ट होकर स्कूल आना सिखा रहे हैं ,अंग्रेजी सिखा विश्व के समक्ष खड़े होने के काबिल बना रहे हैं किन्तु ये नहीं बता रहे हैं कि आज आप आज़ादी की साँस किन वीरों के प्रयासों के कारण ले रहे हैं ?क्या ये हमारा उत्तरदायित्व नहीं बनता कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को उन वीरों से परिचित कराएँ जिन्होंने हमारे जीवन की खुशहाली के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया .लता जी की आवाज़ में प्रदीप जी द्वारा लिखे इस गीत को ,जिसे सुनकर पंडित जवाहर लाल नेहरु की आँखों में आंसू आ गए थे तो ये कोई अनोखी बात नहीं थी ,जब हम जैसे लोग भी स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने बरसों बाद ये पंक्तियाँ -
''थी खून से लथपथ काया फिर भी बन्दूक उठाके ,
दस दस को एक ने मारा फिर गिर गए होश गंवाके ,
जब अंत समय आया तो कह गए कि हम मरते हैं ,
खुश रहना देश के प्यारों अब हम तो सफ़र करते हैं .''
सुनकर रो सकते हैं तो पंडित जवाहर लाल नेहरु ने तो उन वीरों के साथ कंधे से कन्धा मिलकर देश की आज़ादी के लिए अपना दिन रात एक कर दिया था तो उनकी आँखों में आंसू आना स्वाभाविक था ,क्या वे देश के प्यारे नहीं थे ,क्या वे भी हमारी तरह जिन्दा रहकर देश की आज़ादी में साँस नहीं ले सकते थे फिर क्यूं हम उन्हें भूलने लगे हैं ?क्या हमें आज उन सपनो को पूरा करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ना चाहिए जिन्हें हमारे वीरों ने देखा और उनकी पूर्ति के लिए अपनी क़ुरबानी दे दी?हमारा उत्तरदायित्व बनता है कि हम उन सपनो को अपने और अपने देशवासियों की आँखों में भर दें और उन सपनो को पूरा करने के लिए जूनून की हद तक सभी को प्रेरित करें.
आज़ादी की प्राप्ति के बाद के भारत के लिए जो स्वप्न हमारे वीरों ने देखे उन पर विराम लगाने वाले न केवल हम बल्कि हमारी सरकार भी है .पंडित जवाहर लाल नेहरु ने कहा था -''काफी साल पहले हमने नियति की साथ गुप्त भेंट की और अब समय आ गया हैकि हम अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करें .आधी रात को जब दुनिया सो जाएगी तब भारत में आज़ादी एक नई सुबह  लेकर आएगी .''
नई सुबह आई किन्तु इस नई सुबह में सबने भुला दिया गुलामी के उन दिनों को ,उन संघर्षों को जिन्हें झेलकर हम आज़ाद हुए थे .अंग्रेजों ने एक जलियाँ वाला बाग हत्याकांड किया था किन्तु वे विदेशी थे उनका  हमसे कोई अपनत्व नहीं था किन्तु उसे क्या कहें जो  दिल्ली की सरकार ने किया आन्दोलन रत बाबा रामदेव और उनके अनुयायिओं को रातो- रात अंग्रेजी शासन काअहसास करा दिया .
मैक्स मूलर ,जर्मन स्कॉलर ने कहा था-''अगर मुझसे पूछा जाये कि किस जगह मानव मस्तिष्क अपने चरम रूप में विकसित होता है  ,कहाँ समस्याओं का समाधान चुटकी बजाते निकल जाता है तो मैं कहूँगा ,''भारत वो जगह है .''
कि क्यूं भारत में हर समस्या का समाधान आन्दोलन से ढूँढा जाता है ?क्यूं लोकपाल के लिए अन्ना को अनशन करना पड़ता है ?क्यूं काले धन की वापसी के लिए बाबा रामदेव को पिटना पड़ता है ?
क्यूं उत्तर प्रदेश में बरसों से लगभग तीन दशक से  पश्चिमी यू.पी .के वकीलों को हाईकोर्ट की खंडपीठ की मांग  के लिए भूखा मरना पड़ता है ?क्या इसमें केवल वकीलों का हित है ?क्या सरकार का फ़र्ज़ नहीं है कि वह जनता के लिए न्याय प्राप्त करने की परिस्थितियाँ बनाये ?
देश के विभिन्न हिस्सों में फैला नक्सलवादी /माओवादी आन्दोलन जिसमे कभी विधायक ,कभीडी.एम्.,कभी विदेशी पर्यटक  अपहरण के तो कभी आम जनता ,पुलिस गोलीबारी के शिकार होते हैं.क्यूं नहीं सरकार सही कदम  सही समय पर उठाकर इन समस्याओं को निबटाने का प्रयास करती ?क्यूं हर समस्या को यहाँ वैसे ही आगे  के लिए  टाल दिया जाता है  जैसे पुलिस वाले पानी में बहती आई लाश को आगे बढ़ा देते हैं जिससे अपराध का ठीकरा उनके माथे पर न फूटे.क्यूं देश में हर समस्या का समाधान आन्दोलन के माध्यम से ढूंढना पड़ता है ?लोकतंत्र जनता की ,जनता के द्वारा और जनता के लिए सरकार है फिर क्यूं जनता के बीच से सरकार में पहुँच नेताओं की बुद्धि पर सत्ता का पानी चढ़ जाता है और पहले जनता के हित की बात कहने वाले सत्ता में पहुँच जनता को कुचलने पर आमादा हो जाते हैं ?
और जनता के आन्दोलन भी जिस कार्य के लिए शुरू किये जाते हैं वहां से भटक जाते हैं .क्यूं अन्ना का आन्दोलन लोकपाल से हटकर राजनीति की गहराई की बातें करने लगता है ?क्यूं बाबा रामदेव का आन्दोलन काले धन की वापसी की बाते करते करते कॉंग्रेस  हटाओ की बात करने लगता है ?जबकि सभी जानते हैं कि राजनीति में सभी दल ''एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं ''.कारण एक ही है हमारा अपने आदर्शों से भटकाव .एक विकासशील देश  को जिन आदर्शों पर काम करना चाहिए हम उनसे भटक गए हैं .लोकतंत्र ने हमें अवसर दिया है देश को अपने हाथों से चलने का और ये हमें देखना है कि हम देश की बागडोर गलत हाथों में न जाने दें .किसी ने कहा है -
''वक़्त देखते ही किरदार बदल देता है ,
इन्सान भी मय्यार बदल देता है ,
अपनी ताकत का तुम्हे इल्म नहीं शायद
एक वोट देश की तकदीर बदल देता है .''
ऐसा नहीं है कि स्वतंत्रता से लेकर आज तक एक ही दल की सरकार रही हो सरकारें आई गयी हैं किन्तु कार्यप्रणाली सभी की एक जैसी रही है .सभी ने पूँजी वादियों का पोषण और गरीबों का शोषण किया है सभी ने वोट के भंडार के आगे शीश नवाया  है .ऐसे में हमें देखना होगा कि ये देश हमारा है .हमें यहाँ आराजकता पैदा नही होने देनी है और न ही स्वार्थी प्रवर्तियों वाले दलों को उभरने देना है .हमें एक जुट होकर देश हित के लिए आगे बढ़ना है और जो  भी ताकत देश विरोधी दिखाई दे उसे मुहंतोड़ जवाब देना है .भ्रष्टाचार ,काला धन ,कन्या भ्रूण हत्या ,गरीबी ,महंगाई सब हमारे बीच की समस्याएं है और इनका दुष्प्रभाव भी हमीं पर पड़ता है ऐसे में इन चुनौतियों से लड़ने के लिए हमें ही एकजुट होना होगा .
रामायण में एक जगह महर्षि विश्वामित्र कहते हैं-''साधू और पानी का रुकना सही नहीं होता .''सही भी है साधू का कार्य विश्व कल्याण है जो एक जगह रूककर नहीं होता और पानी यदि ठहर जाये तो गन्दा हो जाता है .सरकार में यही ठहराव आ गया है .विपक्ष का कमजोर होना सरकार को अति आत्मविश्वास से भर रहा है .सरकार बदलना इस समस्या का हल नहीं है बल्कि विपक्ष का मजबूत होना सरकार के लिए एक फ़िल्टर के समान है यदि हमारा विपक्ष मजबूत हो तो सरकार को उखड़ने का डर रहेगा और ऐसे में जिन समस्याओं के लिए जनता को आन्दोलन रत होना पड़ता है वे सरकार की समझ में स्वयमेव आती रहेंगी और आन्दोलन जैसी परिस्थितियां उत्पन्न ही नहीं होंगी .इसलिए ये जनता का ही कर्त्तव्य बनता है कि वह ऐसे लोगों को चुनकर भेजे जो चाहे सत्ता में रहें या विपक्ष में, अपना काम मजबूती से करें क्योंकि आज हमारे देश को सच्चे कर्मवीरों की ज़रुरत है ऐसे कर्मवीर जो हमारे शहीदों की शहादत की कीमत  समझें और उनके सपनो को पूरा करने के लिए जुट जाएँ .
अंत में डॉ.राही निजामी के शब्दों में बस यही कहूँगी-
''वतन की अजमतों के जो हैं दुश्मन,
इरादे उनके तू बेजान कर दे  .
तिरंगा है वतन की शान या रब ,
उसे कुछ और भी जी शान कर दे.''
शालिनी कौशिक
[कौशल]

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

ऐसे ही सिर उठाएगा ये मुल्क शान से -स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ‏


Independence Day Picture
फरमा रहा है फख्र से ,ये मुल्क शान से ,
कुर्बान तुझ पे खून की ,हर बूँद शान से।
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फराखी छाये देश में ,फरेब न पले ,
कटवा दिए शहीदों ने यूँ शीश शान से .
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देने को साँस लेने के ,काबिल वो फिजायें ,
कुर्बानी की राहों पे चले ,मस्त शान से .
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आज़ादी रही माशूका जिन शूरवीरों की ,
साफ़े की जगह बाँध चले कफ़न शान से .
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कुर्बानी दे वतन को जो आज़ाद कर गए ,
शाकिर है शहादत की हर  नस्ल  शान से .
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इस मुल्क का गुरूर है वीरों की शहादत ,
फहरा रही पताका यूँ आज शान से .
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मकरूज़ ये हिन्दोस्तां शहीदों तुम्हारा ,
नवायेगा सदा ही सिर सरदर शान से .
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पैगाम आज दे रही कुर्बानियां इनकी ,
घुसने न देना फिर कभी सियार  शान से .
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करते हैं अदब दिल से अगर हम शहीदों का ,
छोड़ेंगे बखुशी सब मतभेद शान से .
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इस मुल्क की हिफाज़त दुश्मन से कर सकें ,
सलाम मादरे-वतन कहें आप  शान से .
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मुक़द्दस इस मुहीम पर कुर्बान ''शालिनी'' ,
ऐसे ही सिर उठाएगा ये मुल्क शान से .
शालिनी कौशिक
[कौशल]
[शब्दार्थ-सरदर-सब मिलकर एक साथ ]
My India My Pride

बुधवार, 5 अगस्त 2015

पुलिस को प्रतिबन्ध का अधिकार नहीं



हिन्दू धर्मावलम्बी के लिए हर वर्ष कांवड़ यात्रा एक ऐसा धार्मिक समारोह है जिसे लेकर हर उम्र का हिन्दू धर्मावलम्बी उल्लास व् भक्ति से परिपूर्ण रहता है और पुलिस प्रशासन के लिए यह समय बहुत अधिक मुस्तैदी से कार्य करने का होता है क्योंकि ज़रा सी चूक बड़े बवाल को जन्म देती है और यही हुआ है मुरादाबाद मंडल में जहां कांवड़ के बेड़ों से डीजे उतारने पर कटघर में बवाल हो गया -
कांवड़ के बेड़ों से डीजे उतारने पर कटघर में बवाल, लाठीचार्ज
डीजे पर प्रतिबंध से सुलगा मुरादाबाद मंडल, फोर्स तैनात
पुलिस चौकी पर पथराव, पुलिस ने लाठियां भांजकर खदेड़ा, देर रात तक हंगामा
अमर उजाला ब्यूरो

मुरादाबाद। कांवड़ बेड़ों में डीजे पर प्रतिबंध को लेकर विरोध की चिंगारी पूरे मंडल में फैल गई है। मंगलवार को रामपुर, संभल, अमरोहा और मुरादाबाद में कांवड़ियों व हिंदू संगठनों ने डीजे पर प्रतिबंध के खिलाफ पूरा दिन जगह-जगह जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किए और मुख्यमंत्री के पुतले फूंके।
शाम होते-होते ये चिंगारी बवाल में तब्दील हो गई। संभल में पब्लिक ने हाईवे जाम करके हंगामा किया तो मुरादाबाद में कटघर थाने की दस सराय चौकी पर भीड़ ने पथराव कर दिया। एक कांवड़ बेडे़ से पुलिस द्वारा जबरन डीजे उतारे जाने की प्रतिक्रिया में भीड़ बेकाबू हो गई। भीड़ ने चौकी में घुसकर पुलिस कर्मियों से मारपीट की और चौकी व हाईवे पर पथराव कर दिया। पुलिस ने लाठीचार्ज करके भीड़ को खदेड़ा। कटघर में ही प्रभात मार्केट और हनुमान मूर्ति पर भी डीजे पर प्रतिबंध के विरोध में भीड़ ने हाईवे बंद किया और पुलिस पर पत्थर फेंके। देर रात खबर लिखे जाने तक फोर्स मौके पर तैनात थी और हंगामा जारी था।
मुरादाबाद के कटघर थाना क्षेत्र में दस सराय पुलिस चौकी के सामने स्थित
शेष पेज 11 पर
•सीतापुरी के कांवड़ियों के जत्थे से पुलिस ने मंगलवार देर शाम जबरन डीजे उतरवा लिया। विरोध करने पर कांवड़ बेड़े में शामिल दो लोगों और डीजे संचालक को भी पुलिस मारपीट करते हुए उठा ले र्गई। कांवड़ियों की पुलिस पिटाई की सूचना पर भीड़ इकट्ठा हुई और दस सराय पुलिस चौकी के सामने जाम लगा दिया। हाईवे ब्लॉक हुआ तो पुलिस ने भीड़ पर लाठियां फटकारीं जिसके जवाब में भीड़ ने पुलिस चौकी और संभल पुल पर पथराव शुरू कर दिया। पुलिस ने लाठीचार्ज करके हालात काबू किए। यहां हालात काबू में हुए ही थे कि भीड़ ने कटघर थाने के पास प्रभात मार्केट पर हाईवे जाम कर दिया और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व कैबिनेट मंत्री आजम खां के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। पुलिस ने यहां भी लाठियां फटकारीं तो भीड़ ने जवाब में पत्थर फेंके।
कांवड़ में डीजे पर प्रतिबंध सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर लगाया गया है। पुलिस हर हाल में इस आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराएगी। सभी को बता दिया गया है कि कांवड़ बेड़ों में डीजे नहीं जाना है, यदि फिर भी कोई कानून का उल्लंघन करता है तो उसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
-वीएस मीणा, आईजी बरेली जोन।
अब आई जी बरेली जोन के अनुसार यह कार्यवाही सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में है किन्तु यूपी का पुलिस एक्ट १८६१तो इस सम्बन्ध में कुछ और ही कहता है जिसकी धारा ३० [४] में कहा गया है -
धारा ३० [४] -मार्गों में संगीत पर कहती है कि पुलिस का जिला अधीक्षक या सहायक जिला अधीक्षक -
{ त्योहारों और समारोहों के अवसर पर मार्गों में कितना संगीत हो उसको भी विनियमित कर सकेगा }
इस धारा को देखते हुए कहा जा सकता है कि पुलिस संगीत की सीमा विनियमित कर सकती है उस पर प्रतिबन्ध नहीं लगा सकती और ऐसे में जो कुछ भी मुरादाबाद मंडल में पुलिस ने किया है वह कानून के अनुसार सही नहीं कहा जा सकता और ऐसे में विरोध के सुर तेज होना स्वाभाविक है साथ ही नेतागर्दी के लिए हवा का बहना भी जो कि अब वहां हो रहा है -
डीजे पर सियासत भी गरमाई
मुरादाबाद (ब्यूरो)। कांवड़ मेले में डीजे की पाबंदी से सियासी तूफान आ गया है। भाजपा और सभी हिंदू संगठन सरकार के इस फैसले के खिलाफ सड़कों पर हैं। मंगलवार को भी कई जगह प्रदर्शन किया गया। सरकार के पुतले फूंके गए। वहीं डीजे वाले भी पुलिस कार्रवाई के विरोध में सड़कों पर आ गए हैं। भाजपा, बजरंग दल, सर्वदलीय हिंदू संगठन और शिवसेना ने प्रदर्शन किए। बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने कई जगह प्रदेश सरकार का पुतला फूंका। सर्वदलीय हिंदू महासभा ने बैठक कर कहा कि कांवड़ मेले में डीजे पर प्रतिबंध किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सभी हिंदू संगठन प्रदेश सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे। वहीं भाजपा नेताओं ने भी चेतावनी दी है कि डीजे का प्रतिबंध अगर सरकार ने वापस नहीं लिया तो उग्र आंदोलन होगा।
अब जब स्थितियों को देखते हुए सही कदम न उठाया जाये तो ये सब संभावित पहले से ही था क्योंकि मैं स्वयं एक कांवड़िये के पिछले वर्ष के आपबीती के आधार पर ऐसी स्थिति का अंदाजा लगा सकती हूँ जिसमे उसने कहा था कि
''जब हम पिछले वर्ष कांवड़ लेकर गए तब भी पुलिस ने डीजे रोका था किन्तु केवल आवाज़ कम करने को कहा था जो कि हमने कर ली थी .''
फिर इस वर्ष पुलिस ने इस सम्बन्ध में ऐसी कार्यवाही कर स्वयं इस आग में घी डाला है इसलिए ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि -
''इब्तदाये इश्क़ है ,रोता है क्या ,
आगे आगे देखिये होता है क्या .''
शालिनी कौशिक
[कौशल  ]

रविवार, 2 अगस्त 2015

याकूब या कोली :फांसी नहीं न्याय की हमजोली


वरुण गांधी भी कूदे बहस मेंफैसले की आलोचना करते हुए दिया इस्तीफा
1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट के दोषी याकूब मेमन को फांसी दिए जाने के बाद भारत में फांसी की सजा खत्म करने की आवाज तेज हो रही है। तमाम सामाजिक संगठनों के बाद अब भाजपा सांसद वरुण गांधी भी इस बहस में कूद पड़े हैं और इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट के डिप्टी रजिस्ट्रार ने भी इस्तीफा दिया है सर्वोच्च न्यायालय के डिप्टी रजिस्ट्रार और डेथ पेनाल्टी रिसर्च प्रोजेक्ट के डायरेक्टर प्रो.अनूप सुरेन्द्र नाथ ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की आलोचना करते हुए इस्तीफा दे दिया है, जिसमें न्यायालय ने 1993 मुंबई ब्लास्ट के दोषी याकूब मेमन की आखिरी दया याचिका खारिज कर दी थी।
वरुण गांधी ने फांसी की सजा का पुरजोर विरोध किया है। एक लेख में वरुण ने मौत की सजा पर कई सवाल उठाए हैं। उनके लेख में किसी एक शख्स की फांसी का जिक्र नहीं है, लेकिन उन्होंने फांसी की सजा को क्रूर बताया है।
वरुण ने कहा है कि मौत की सजा पाने वालों में से 75 फीसदी सामाजिक और आर्थिक स्तर पर दरकिनार श्रेणी के लोग हैं। ऐसे मामलों में 94 फीसदी लोग दलित समुदाय या अल्पसंख्यक हैं। मौत की सजा गरीबी की वजह से कमजोर कानूनी लड़ाई का नतीजा है।
हालाँकि वरुण की बात में आधी ही सच्चाई है किन्तु आधी तो है और निठारी कांड में कोली को मिली हुई फांसी की सजा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है .
अब अगर हम याकूब मेनन को हुई फांसी पर विरोध को मद्देनज़र रखें तो ये विरोध उनके कृत्य को देखते हुए हम सही नहीं कहेंगें किन्तु याकूब इस सजा के नहीं वरन तिल-तिल कर अपने अपराध की सजा भुगतने के पात्र थे क्योंकि इस तरह वे एक बार में ही अपने अपराध के दंड से मुक्त हो गए उन्होंने जो किया था उसका वास्तविक दंड वह होता जो वे अपने अपनों से दूर रखकर भुगतते क्योंकि तभी उन्हें उस पीड़ा का एहसास होता जो उन्होंने औरों को दी .
फाँसी से हम एक अपराधी का अंत कर सकते हैं सम्पूर्ण अपराध का नहीं .हमें स्वयं में हिम्मत लानी होगी कि ऐसी घटनाओं को नज़रअंदाज न करते हुए न केवल अपने बचाव के लिए बल्कि दूसरे किसी के भी बचाव के लिए कंधे से कन्धा मिलकर खड़े हों .ये सोचना हमारा काम नहीं है कि जिसके साथ घटना हो रही है शायद उसका भी कोई दोष हो .हमें केवल यह देखना है कि जो घट रहा है यदि वह अपराध है तो हमें उसे रोकना है और यदि इस सबके बावजूद भी कोई घटना दुर्भाग्य से घट जाती है तो पीड़ित को समाज से बहिष्कृत न करते हुए उसके समाज में पुनर्वास में योगदान देना है और अपराधी को एकजुट हो कानून के समक्ष प्रस्तुत करना है ताकि वह अपने किये हुए अपराध का दंड भुगत सके .सिर्फ कोरी बयान बाजी और आन्दोलन इस समस्या का समाधान नहीं हैं बल्कि हमारी अपराध के सच्चे विरोध में ही इस समस्या का हल छुपा है .चश्मदीद गवाह जिनके कारण इलाहबाद हाईकोर्ट को मुज़फ्फरनगर की जिला अदालत में सरेंडर करने पहुंचे मुल्ज़िम को कोर्ट रूम से घसीटने के आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी करना पड़ा है ,ये ही चश्मदीद गवाह जो कि सब जगह होते हैं किन्तु लगभग हर जगह अपने कर्तव्य से पीछे हट जाते हैं किसी भी मामले को सही निर्णय  तक पहुंचा सकते हैं और ऐसी घटनाओं में हमें अपनी ऐसी भूमिका के निर्वहन को आगे बढ़ना होगा क्योंकि ये एक सत्य ही है कि ज़रूरी नहीं कि हमेशा कोई दूसरा ही ऐसी घटना का शिकार हो कल इसके शिकार हम या हमारा भी कोई हो सकता है इसलिए सच्चे मन से न्याय की राह पर आगे बढ़ना होगा .इसलिए अगर हममें कुछ कहने का साहस है कुछ करने की हिम्मत है तो न्याय का साथ देना होगा और अपराध को अपनी हिम्मत से कमज़ोर करना होगा न कि फांसी को अपने कानून द्वारा दिए जाने वाले दंड में शामिल कर अपराधियों को डराने के एक कमजोर अस्त्र के प्रयोग द्वारा अपराध को ख़त्म करने की कोशिश द्वारा .
याद रखिये फाँसी निबटा देती है अपराधी को अपराध को नहीं .वह अपराधी को पश्चाताप का अवसर नहीं देती हालाँकि हर अपराधी पश्चाताप की ओर अग्रसर भी नहीं होता किन्तु एक सम्भावना तो रहती ही है और दूसरी बात जो वीभत्स तरीका वे अपराध के लिए अपनाते हैं फाँसी उसका एक अंश भी दंड उन्हें नहीं देती .आजीवन कारावास उन्हें पश्चाताप की ओर भी अग्रसर कर सकता है और यही वह दंड है जो तिल तिल कर अपने अपराध का दंड भी उन्हें भुगतने को विवश करता है .

[published in janvani [cyber world ]on 3 aug 2015 ]

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

राजीव गांधी :अब केवल यादों में - शत शत नमन

एक  नमन  राजीव  जी  को  आज उनकी जयंती के अवसर  पर.राजीव जी बचपन से हमारे प्रिय नेता रहे आज भी याद है कि इंदिरा जी के निधन के समय हम सभी क...