बुधवार, 29 जुलाई 2015

''जितनी देखी दुनिया सबकी दुल्हन देखी ताले में''


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कविवर गोपाल दास ''नीरज''ने कहा है -
''जितनी देखी दुनिया सबकी दुल्हन देखी ताले में
कोई कैद पड़ा मस्जिद में ,कोई बंद शिवाले में ,
किसको अपना हाथ थमा दूं किसको अपना मन दे दूँ ,
कोई लूटे अंधियारे में ,कोई ठगे उजाले में .''
धर्म के   ये ही दो रूप हमें भी दृष्टिगोचर होते हैं .कोई धर्म के पीछे अँधा है तो किसी के लिए धर्म मात्र दिखावा बनकर रह गया है .धर्म के नाम पर सम्मेलनों की ,विवादों की ,शोर-शराबे की संख्या तो दिन-प्रतिदिन तेजी से बढती जा रही है लेकिन जो धर्म का मर्म है उसे एक ओर रख दिया गया है .आज जहाँ देखिये कथा वाचक कहीं भगवतगीता ,कहीं रामायण बांचते नज़र आयेंगे ,महिलाओं के सत्संगी संगठन नज़र आएंगे .विभिन्न समितियां कथा समिति आदि नज़र आएँगी लेकिन यदि आप इन धार्मिक समारोहों में कथित सौभाग्य से  सम्मिलित होते हैं तो ये आपको पुरुषों का  बड़े अधिकारियों, नेताओं से जुड़ने का बहाना ,महिलाओं का एक दूसरे की चुगली करने का बहाना  ही नज़र आएगा .
दो धर्म विशेष ऐसे जिनमे एक में संगीत पर पाबन्दी है तो गौर फरमाएं तो सर्वाधिक कव्वाली,ग़ज़ल गायक आपको उसी धर्म विशेष में मिलेंगे और एक अन्य धर्म के प्रवचन स्थल पर उन उपदेशों को दरकिनार कर उनके ही धर्मावलम्बियों का बड़ी संख्या आगमन भी दिखेगा .
धर्मान्धता देखकर ही कबीर दास ने कहा था -
''पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार ,
ताते ये चाकी भली ,पीस खाए संसार .''

''कांकर पाथर जोरि के मस्जिद लई बनाये ,
ता चढ़ी मुल्ला बाँगी  दे ,क्या बहरा हुआ खुदाए .''
इन  धर्मों के कामों में यदि कुछ कहा जाये तो बबाल पैदा हो जाते हैं  और न कहने पर जो शोर-शराबे की मार पड़ती है वह असहनीय है .लाउडस्पीकर ,जेनरेटर,डी.जे.जैसे अत्याधुनिक यंत्रों के प्रयोग ने आज जनता को वास्तव में ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन के रूप में सिरदर्द दे दिया है .रोज कोई न कोई आयोजन है और प्रतिदिन उपदेशों के नदियाँ बह रही हैं .फिर भी देश समाज के हाल बेहाल हुए जा रहे हैं .
कहीं भजन बजता है -
''भला किसी का कर न सको तो बुरा किसी का मत करना ,
पुष्प नहीं बन सकते तो तुम कांटे बनकर मत रहना .''
लोग गाते हैं गुनगुनाते हैं ,तालियाँ बजाते हैं और करते क्या हैं वही जो करना है -लूट -खसोट ,इधर का मॉल उधर -उधर का मॉल इधर .चारों ओर ढकोसले बाजी चल रही है ..भगवा वेश में २५-३० लोगों की बस रोज किसी न किसी शहर में पहुँचती है ,दिन निर्धारित है किस किस दिन आएंगे .भगवा वस्त्र पहनकर आते हैं लोगों से, दुकानदारों से धार्मिक भावना के नाम पर ५०-५० पैसे लेते हैं और अपने अड्डे पर पहुंचकर शराब ,जुए,भांग में उड़ाते हैं .धर्म आज ऐसे ही दिखावों का केंद्र बनकर रह गया है .
जगह जगह आश्रम खुले हैं .अन्दर के धंधे सभी जानते हैं यही कि ये आश्रम राजनीतिज्ञों के दम पर फल फूल रहे हैं और आम जनता बेवकूफ बन उन साधू महात्माओं के चरण पूज रही है .जिनके काले कारनामे आये दिन सभी के सामने आ रहे हैं .कहने को इन साधू संतों को सांसारिक माया-मोह से कुछ लेना -देना नहीं और  सांसारिक  सुख सुविधा का हर सामान इनके आश्रमों में भरा पड़ा है .दिन प्रतिदिन आश्रमों की चारदीवारी बढती जा रही है और कितने ही अपराधिक कार्य यहाँ से संचालित किये जाते हैं और प्रशासन जनता में इनके प्रति निष्ठा के कारण उसके भड़कने की आशंका से इनपर हाथ डालते हुए घबराते हैं और इसी का दुष्प्रभाव है कि आज जनता की धर्मान्धता का लाभ उठाकर ये आश्रम बहुत बड़े क्षेत्र को निगलते जा रहे हैं .
इसी कारण लगता है कि आज धर्म भी जनता से अपना पीछा छुड़ाने के मूड में है क्योंकि जो काम आज धर्मस्थलों से संचालित हो रहे हैं और धर्म के नाम पर संचालित किये जा  रहे है उन्हें हमारे किसी भी धर्म ने महत्व नहीं दिया .इसलिए लगता है कि धर्म भी आज यही कह रहा है -
''वो आये मेरी कब्र पे दिया बुझाके चल दिए ,
दिए में जितना तेल था सर पे लगाके चल दिए .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 18 जुलाई 2015

आखिर प्रधानमंत्री ने स्वीकारी नेहरू-गांधी परिवार की श्रेष्ठता


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आज एकाएक एक शेर याद आ गया .कुछ यूँ थी उस शेर की पंक्तियाँ -
''कैंची से चिरागों की लौ काटने वालों ,
सूरज की तपिश को रोक नहीं सकते .
तुम फूल को चुटकी से मसल सकते हो लेकिन
फूल की खुशबू को समेट नहीं सकते .''
सियासत आदमी से जो न कहलवादे मतलब सब कुछ कहलवा सकती है सही शब्दों में कहूँ तो उगलवा सकती है और ऐसा ही हो गया जब प्रधानमंत्री मोदी ने जम्मू में जाने माने कॉंग्रेसी दिग्गज गिरधारी लाल डोगरा के जन्म शताब्दी समारोह में गिरधारी जी के २६ बार बजट पेश करने पर अपने विचार प्रस्तुत करते वक्त अपने मुख कमल से जो उद्गार व्यक्त किये वे उनके न चाहते हुए भी उस सच्चाई को सबके सामने ला रहे थे जिससे भाजपाई और स्वयं प्रधानमंत्री भी आज तक बचते आ रहे थे , वे विचार कुछ यूँ थे -
''यह तभी संभव होता है जब आपकी व्यापक स्वीकार्यता हो .''
और ये वे शब्द हैं जिससे आने वाले वक्त में कॉंग्रेसियों को स्वयं के हाईकमान को लेकर एक बार फिर गर्व करने का अवसर मिल गया क्योंकि सभी जानते हैं कि नेहरू गांधी परिवार ही देश पर शासन सत्ता को सबसे लम्बे समय तक सँभालने वाला परिवार है और आज उस पर उनके धुर विरोधी भाजपाई प्रधानमंत्री मोदी की मुहर भी लग गयी भले ही वे सीधे न स्वीकारें पर अप्रत्यक्ष रूप से सच्चाई वे जानते हैं यह आज साबित हो ही गया .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

भुलाकर मज़हबी मुलम्मे ,मुहब्बत से गले मिल लें ,-तभी हो ईद मुबारक



मुबारकबाद सबको दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
महक इस मौके में भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
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मुब्तला आज हर बंदा ,महफ़िल -ए -रंग ज़माने में ,
मिलनसारी यहाँ भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
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मुक़द्दस दूज का महताब ,मुकम्मल हो गए रमजान ,
शमा हर रोशन अब कर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
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रहे मज़लूम न कोई ,न हो मज़रूह हमारे से ,
मरज़ हर दूर अब कर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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ईद खुशियाँ मनाने को ,ख़ुदा का सबको है तौहफा ,
मिठास मुरौव्वत की भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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भुलाकर मज़हबी मुलम्मे ,मुहब्बत से गले मिल लें ,
मुस्तहक यारों का कर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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फ़तह हो बस शराफत की ,तरक्की पाए बस नेकी ,
फरदा यूँ हरेक कर दूँ ,जुदा अंदाज़  हैं मेरे .
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फरहत बख्शे फरिश्तों को ,खुदा खुद ही यहाँ आकर ,
फलक इन नामों से भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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फ़िरासत से खुदा भर दे ,बधाई ''शालिनी ''जो दे ,
फिर उसमे फुलवारी भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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शब्दार्थ -मजलूम -अत्याचार से पीड़ित ,मजरूह-घायल ,मुरौव्वत-मानवता ,मुलम्मे-दिखावे ,मुस्तहक-अधिकारी ,फरदा -आने वाला  दिन ,फरहत-ख़ुशी ,फरिश्तों -सात्विक वृति वाला व्यक्ति। फ़िरासत -समझदारी।
एक बार फिर आप सभी को ईद मुबारक 
शालिनी कौशिक 
[कौशल ]


शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

केवल अशिक्षितों को दोष क्यों इसके जिम्मेदार पढ़े-लिखे रूढ़िवादी भी -विश्व जनसँख्या दिवस


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World Population Day
DateJuly 11
Next time11 July 2015
Frequencyannual
[World Population Day is an annual event, observed on July 11 every year, which seeks to raise awareness of global population issues. The event was established by the Governing Council of the United Nations Development Programme in 1989. It was inspired by the public interest in Five Billion Day on July 11, 1987-approximately the date on which the world's population reached five billion people.
The world population (as of January 1, 2014; 9:24 UTC) is estimated to be 7,137,661,030.[1]
Jansankhya Sthirata Kosh(JSK) is doing every effort to draw the attention of the Media and the masses towards the issues of Population Stabilization, JSK will organize a "Walkathon towards Population Stabilization" at India Gate on 11th July 2015. In this Walkathon thousand of youths from Universities, Colleges and various public and private colleges are expected to participate.]
आज विश्व जनसँख्या दिवस है .पता तो ये बहुत पहले से था तबसे जबसे इस दिन विश्व की जनसँख्या ६ अरब हो गयी थी  पर ये हम जैसे लोगों को याद  भी क्यों रहेगा जिनका परिवार पहले से ही बहुत छोटा है जब ये उन्ही लोगों को याद  नहीं रहता जिन्होंने आज देश विश्व सभी की स्थिति बहुत बिगाड़ दी है.
जब भी बचपन में कोई निबंध याद करते थे जनसँख्या से सम्बंधित तो उसमे इसके कारण में एक बड़ा कारण ''अशिक्षा''लिखा जाता था और हमें जब भी कोई अनपढ़ दिखाई देता था हम उसे देख कर देश की ख़राब स्थिति के लिए जिम्मेदार मान लेते थे  पर आज जब हमें कहने को काफी समझ आ चुकी है तब हम अपने आस पास के बहुत से ऐसे परिवार देख रहे हैं जो कहने को सुशिक्षित है,सभ्य हैं और उनके बहुत बड़े बड़े परिवार हैं.भारतीय समाज बेटे के होने तक बच्चे करता ही रहता है और अब ये लालसा इतनी आगे बढ़ चुकी है कि एक बेटा हो जाये तो कहा जाता है कि ''दो तो होने ही चाहियें''.

आज जो भारत या कहें सारे  विश्व में स्थिति है उसके जिम्मेदार हमारे पूर्वजों को ही कहा जायेगा.अपनी मम्मी और दादी से मैंने जाना कि पहले औरतें इस तरह के कॉम्पिटिशन किया करती थी और तो और यदि कोई महिला एक या दो ही बच्चे करती थी तो और औरतें उसे उकसाकर और बच्चे करा लिया करती थी.हमारी जानकर ही एक आंटी जो एक स्कूल में शिक्षिका हैं उनके दो ही बच्चे थे एक बेटा और एक बेटी पर उन्हें और औरतों ने ये कह कर ''कि क्या दो ही बच्चे करके रह गयी''उकसा दिया और अब उनके तीन बच्चे हैं और बड़े भाई बहन से उस बच्चे का अंतर लगभग ८ साल का है.चलिए यहाँ तो फिर भी खैर है हमारे एक अंकल जिनके सबसे पहले बेटा हुआ और जो अपनी बातों से भी काफी आधुनिक नज़र आते हैं उसके बाद ४ लड़कियां बेटे बढ़ने की ख्वाहिश में कर ली.और एक पडोसी जो कि इंटर कॉलेज  में प्रवक्ता हैं उनके दो बेटियों के बाद एक बेटा हो गया तब भी उनकी इच्छा बेटे के लिए ख़त्म नहीं हुई और उन्होंने उसके बाद तीन बेटियां और पैदा कर ली इसी तरह हद तो एक और अंकल ने की है जिनके एक के बाद एक बेटे होते रहे और वे करते रहे सात बेटे इस तरह उन्होंने देश की जनसँख्या में बढ़ा दिए हाँ रुके वे तभी जब आठवें  नंबर पर बेटी हो गयी.ये तो कुछ लोग हैं जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए मुश्किलें  पैदा कर दी हैं और मैं नहीं मान सकती इसलिए यह बात कि अशिक्षित लोग इसके लिए ज्यादा उत्तर दायी हैं जब मेरे सामने ऐसे उदाहरण हैं और हो सकता है कि आपके सामने भी हों.आज इसी कारण यह भयावह स्थिति पैदा हो गयी है कि अब यदि किसी के दो बच्चें भी हों तो जनसँख्या का बोझ बढ़ता दिखाई देता है.
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

भाजपा के एक और गलत-ज्ञानी


image/jpg: Senior BJP leader Kalyan Singh, during an election campaign rally in Mathura on Sunday night.
Governor of Rajasthan and chancellor Kalyan Singh on Tuesday once again created a controversy by suggesting that the word ‘adhinayak’ in the national anthem should be removed as it praises the British rulers of pre-Independence era.
गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर भारत के बँगला साहित्य के शिरोमणि कवि थे.
उनकी कविता में प्रकृति के सौंदर्य और कोमलतम मानवीय भावनाओं का उत्कृष्ट चित्रण है.
"जन गण मन" उनकी रचित एक विशिष्ट कविता है जिसके प्रथम छंद को हमारे राष्ट्रीय गीत होने का गौरव प्राप्त है.
गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर, काव्यालय की ओर से, आप सबको यह कविता अपने मूल बंगला रूप में प्रस्तुत है. 
बंगला मूल
जन गण मन
शब्दार्थ


जन गण मन अधिनायक जय हे 
भारत भाग्य विधाता 
पंजाब सिन्ध गुजरात मराठा
द्राविड़ उत्कल बंग 
विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा 
उच्छल जलधि तरंग 
तव शुभ नामे जागे 
तव शुभ आशिष मागे 
गाहे तव जय गाथा 
जन गण मंगल दायक जय हे 
भारत भाग्य विधाता 
जय हे जय हे जय हे 
जय जय जय जय हे
अहरह तव आह्वान प्रचारित
शुनि तव उदार वाणी
हिन्दु बौद्ध शिख जैन
पारसिक मुसलमान खृष्टानी
पूरब पश्चिम आशे
तव सिंहासन पाशे
प्रेमहार हय गाँथा
जन गण ऐक्य विधायक जय हे
भारत भाग्य विधाता 
जय हे जय हे जय हे 
जय जय जय जय हे
अहरह: निरन्तर; तव: तुम्हारा
शुनि: सुनकर


आशे: आते हैं
पाशे: पास में
हय गाँथा: गुँथता है
ऐक्य: एकता
पतन-अभ्युदय-बन्धुर-पंथा
युगयुग धावित यात्री,
हे चिर-सारथी, 
तव रथचक्रे मुखरित पथ दिन-रात्रि 
दारुण विप्लव-माझे 
तव शंखध्वनि बाजे, 
संकट-दुख-त्राता, 
जन-गण-पथ-परिचायक जय हे 
भारत-भाग्य-विधाता, 
जय हे, जय हे, जय हे, 
जय जय जय जय हे
अभ्युदय: उत्थान; बन्धुर: मित्र का
धावित: दौड़ते हैं


माझे: बीच में

त्राता: जो मुक्ति दिलाए
परिचायक: जो परिचय कराता है
घोर-तिमिर-घन-निविड़-निशीथे 
पीड़ित मुर्च्छित-देशे 
जाग्रत छिल तव अविचल मंगल 
नत-नयने अनिमेष 
दुःस्वप्ने आतंके 
रक्षा करिले अंके 
स्नेहमयी तुमि माता, 
जन-गण-दुखत्रायक जय हे 
भारत-भाग्य-विधाता, 
जय हे, जय हे, जय हे, 
जय जय जय जय हे
निविड़: घोंसला

छिल: था
अनिमेष: अपलक

करिले: किया; अंके: गोद में
रात्रि प्रभातिल उदिल रविछवि 
पूर्व-उदय-गिरि-भाले, 
गाहे विहन्गम, पुण्य समीरण 
नव-जीवन-रस ढाले, 
तव करुणारुण-रागे 
निद्रित भारत जागे 
तव चरणे नत माथा, 
जय जय जय हे, जय राजेश्वर, 
भारत-भाग्य-विधाता, 
जय हे, जय हे, जय हे, 
जय जय जय जय हे 
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर
प्रभातिल: प्रभात में बदला; उदिल: उदय हुआ
* * *
कल्याण सिंह जो इस वक्त राजस्थान के राज्यपाल हैं ने एक बार फिर साबित किया है कि भाजपाई देश के बारे में बहुत ही कम और अधिकांशतया गलत ज्ञान ही रखते हैं .उन्होंने अधिनायक शब्द को अंग्रेजों से जोड़कर इसे हटाने की मांग की है जबकि वे स्वयं जानते हैं कि हमारा देश गणतंत्र है और यहाँ जनता का शासन है ऐसे में इसके रचनाकाल के समय भले ही अंग्रेजों का शासन रहा हो भले ही इसकी रचना १९११ में की गयी हो किन्तु जिस वक्त इसे राष्ट्रीय गान के रूप में स्थापित किया गया देश गणतंत्र घोषित किया जा रहा था और देश पर हम भारत के लोगों का ही राज्य स्थापित हो रहा था क्योंकि यह सब हमारे देश के संविधान के अंतर्गत किया जा रहा था जिसकी प्रस्तावना में मुख्य शब्द ही '' हम भारत के लोग '' हैं इसलिए कल्याण सिंह जी को याद रखना चाहिए कि हम ही इस देश के अधिनायक हैं और इसे देश के राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करने वाले इस देश के लिए अपने प्राणों की परवाह न कर देश पर अपना सर्वस्व लुटाने वाले न कि सत्ता की खातिर अपमान के घूँट पीकर वापस उसी पार्टी में लौटने वाले जिस के अपने संगी-साथियों की विचारधारा पर वे स्वयं ही ऊँगली उठा चुके थे और स्वयं इस पार्टी के खिलाफ मैदान में उतर चुके थे .
अंत में ,उन्हें एक बात और याद कर लेनी चाहिए कि जिन रविन्द्र नाथ टैगोर जी के द्वारा लिखित ''जन-गण-मन'' में अधिनायक शब्द को वे अंग्रेजों के प्रति भक्ति से जोड़ रहे हैं उन्ही रविन्द्र नाथ जी ने जलियाँ वाला कांड के विरोध में अंग्रेजों द्वारा दी गयी '' नाइट-हुड '' की उपाधि को लौटा दिया था .
शालिनी कौशिक
[कौशल]

सोमवार, 6 जुलाई 2015

हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द को चोट पहुंची है .


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''किसने ये जहर घोला है हवाओं में ,
किसने खोदी हैं कब्रें प्यार की .''
ये सवाल आज वेस्ट यू.पी. के स्थानीय निवासियों की जुबान पर भी है और दिल में भी .ईद हो या दीवाली यहाँ की जनता मिल-जुल कर मनाती आई है .ईद की सिवईयाँ हो या दीवाली की मिठाई अपना स्वाद ही खो देती हैं जब उसमे हिन्दू-मुस्लिम के प्रेम की मिठास न मिली हो और इस बार ईद पहली बार उसी प्रेम का अभाव में मनाई जाएगी ऐसा महसूस हो रहा है . कारण केवल एक है यहाँ के बाज़ारों में इन दिनों हिन्दुओं की दुकानों पर मुसलमान भाई-बहनों की भीड़ का अभाव .बाजार में हिन्दुओं की दुकानें अधिक हैं इसलिए यहाँ लगभग सुनसान की स्थिति यह साफ तौर पर बता रही है कि अभी हाल में हुए दंगों ने सदियों के आपसी प्रेम सद्भाव को चोट तो अवश्य पहुंचाई है और ये चोट कभी भरेगी या नासूर बनकर रिसेगी अभी इस सम्बन्ध में कुछ भी कहना मुश्किल है क्योंकि अभी राजनीतिक पहल इसे तोड़ने का ही काम करती दिखाई दे रही है और यह दुखद है क्योंकि जिनके हाथों में देश -प्रदेश की बागडोर है उनका दायित्व ये बनता है कि वे इस प्रेम को मीठे -ठन्डे जल से सींचे न कि उष्ण पानी से .ये समय राजनीतिक रोटियां सेकने का नहीं है बल्कि जनता को उनका प्राचीन आपसी प्रेम से भरा इतिहास दिखाने का है .ऐसे में इन पंक्तियों को ही शिरोधार्य करना सर्वाधिक समयोचित कदम होगा -
''खुदा किसी का राम किसी का ,
बाँट न इनको पाले में ,
तू मस्जिद में पूजा कर ,
मैं सिज़दा करूँ शिवाले में ,
जिस धारा में प्यार मुहब्बत
वह धारा ही गंगा है ,
और अन्यथा क्या अंतर
वह यहाँ गिरी या नाले में .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

क्या आदमी सच में आदमी है ?

''आदमी '' प्रकृति की सर्वोत्कृष्ट कृति है .आदमी को इंसान भी कहते हैं , मानव भी कहते हैं ,इसी कारण आदमी में इंसानियत ,...