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August, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मेरे लहू में है ,

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मेरा चेहरा अनगिनत टुकड़ों में बँटकर रह गया."

"इंसाफ जालिमों की हिमायत में जायेगा,
ये हाल है तो कौन अदालत में जायेगा."
   राहत इन्दोरी के ये शब्द और २६ नवम्बर 2011 को सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ के द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट  पर किया   गया दोषारोपण "कि हाईकोर्ट में सफाई के सख्त कदम उठाने की ज़रुरत है क्योंकि यहाँ कुछ सड़ रहा है."साबित करते हैं कि न्याय भटकने की राह पर चल पड़ा है.इस बात को अब सुप्रीम कोर्ट भी मान रही है कि न्याय के भटकाव ने आम आदमी के विश्वास को हिलाया है वह विश्वास जो सदियों से कायम था कि जीत सच्चाई की होती है पर आज ऐसा नहीं है ,आज जीत दबंगई की है ,दलाली की है .अपराधी     बाईज्ज़त     बरी हो रहे हैं और न्याय का यह सिद्धांत "कि भले ही सौ अपराधी छूट   जाएँ किन्तु एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए"मिटटी में लोट रहा है .स्थिति आज ये हो गयी है कि आज कातिल खुले आकाश के नीचे घूम रहे हैं और क़त्ल हुए आदमी की आत्मा  तक को कष्ट दे रहे हैं-खालिद जाहिद के शब्दों में-
"वो हादसा तो हुआ ही नहीं कहीं,
अख़बार की जो शहर में कीमत बढ़ा गया,
सच ये है मेरे क़त्ल में वो भी शरीक था,
जो शख्स मेरी कब्र पे चादर चढ़ा गया…

कृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनायें

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''श्री कृष्ण-जन्माष्टमी ''एक ऐसा पर्व जो सारे भारतवर्ष में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है .अभी कुछ वर्षों से ये दो  दिन मनाया जाने लगा है .पंडितों ने इसे ''स्मार्त '' और ''वैष्णव ''में बाँट दिया है.अर्थात स्मार्त से तात्पर्य गृहस्थ जानो द्वारा और वैष्णवों से तात्पर्य कंठी माला धारण करने वाले साधू संतों द्वारा .

''जो गृहस्थ जीवन  बिताते  हैं वे स्मार्त होते हैं अर्थात जो व्यक्ति जनेऊ धारण करते हैं गायत्री की उपासना करते हैं और वेद पुराण  ,धर्म शास्त्र ,समृत्ति को मानने वाले पञ्च वेदोंपासक हैं सभी स्मार्त हैं. वैष्णव वे लोग होते हैं जिन लोगों ने वैष्णव गुरु से तप्त मुद्रा द्वारा अपनी भुजा  पर शंख चक्र अंकित करवाएं हैं या किसी धर्माचार्य से  विधिपूर्वक दीक्षा लेकर कंठी और तुलसी की माला धारण की हुई है .वे ही वैष्णव कहला सकते हैं अर्थात वैष्णव को सीधे शब्दों में कहें तो गृहस्थ से दूर रहने वाले लोग.

सामान्य जन इसे मथुरा  और गोकुल में बाँट देते हैं अर्थात एक दिन मथुरा में कृष्ण के पैदा होने की ख़ुशी में मनाई  जाती  है और एक दिन गोकुल…

ऐसे ही सिर उठाएगा ये मुल्क शान से .

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फरमा रहा है फख्र से ,ये मुल्क शान से ,
कुर्बान तुझ पे खून की ,हर बूँद शान से।
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फराखी छाये देश में ,फरेब न पले ,
कटवा दिए शहीदों ने यूँ शीश शान से .
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 देने को साँस लेने के ,काबिल वो फिजायें ,
कुर्बानी की राहों पे चले ,मस्त शान से .
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आज़ादी रही माशूका जिन शूरवीरों की ,
साफ़े की जगह बाँध चले कफ़न शान से .
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कुर्बानी दे वतन को जो आज़ाद कर गए ,
शाकिर है शहादत की हर  नस्ल  शान से .
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इस मुल्क का गुरूर है वीरों की शहादत ,
फहरा रही पताका यूँ आज शान से .
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मकरूज़ ये हिन्दोस्तां शहीदों तुम्हारा ,
नवायेगा सदा ही सिर सरदर शान से .
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पैगाम आज दे रही कुर्बानियां इनकी ,
घुसने न देना फिर कभी…

लिव इन की तो सोच ही चोट है .-[भारतमित्र मंच द्वारा आयोजित जुलाई की मासिक प्रतियोगिता में विजेता का सम्मान प्राप्त ]

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[भारतमित्र मंच द्वारा आयोजित जुलाई की मासिक प्रतियोगिता में  विजेता का सम्मान प्राप्त ]

SHALINI KAUSHIKHas won the Monthly Competition for the blog :लिव इन की तो सोच ही चोट है .
प्रसिद्द समाजशास्त्री आर.एन.सक्सेना कहते हैं कि-
''ज्यों ज्यों एक समाज परंपरा से आधुनिकता की ओर बढ़ता है उसमे शहरीकरण ,औद्योगीकरण ,धर्म निरपेक्ष मूल्य ,जनकल्याण की भावना और जटिलता बढ़ती जाती है ,त्यों त्यों उसमे कानूनों और सामाजिक विधानों का महत्व भी बढ़ता जाता है .''
     सक्सेना जी के विचार और मूल्यांकन सही है  किन्तु यदि हम गहराई में जाते हैं तो हम यही पाते हैं कि मानव प्रकृति जो चल रहा है ,चला आ रहा है उसे एक जाल मानकर छटपटा उठती है और भागती है उस तरफ जो उसके आस पास न होकर दूर की चीज़ है क्योंकि दूर के ढोल सुहावने तो सभी को लगते हैं .हम स्वयं यह बात अनुभव करते हैं कि आज विदेशी भारतीय संस्कृति अपनाने के पीछे पागल हैं तो भारतीय विदेशी संस्कृति अपनाने की पीछे पागल हैं ,देखा जाये तो ये क्या है ,मात्र एक छटपटाहट परिवर्तन के लिए जो कि प्रकृति का नियम है जिसके लिए कहा ही गया है कि -
 ''change is th…

बेटी को इस धरा पे ,क्यूँ जन्म है दिया ?

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हे प्रभु तुमने
ये क्या किया
बेटी को इस धरा पे ,क्यूँ जन्म है दिया ?
तू कुछ नहीं कर सकती
कमज़ोर हूँ तेरे ही कारण
कोई बेटी ही
शायद
ये न सुने
अपने पिता से !
फिर जन्म दिया क्यूँ
बेटी को
हे प्रभु तुमने ?
बेटी को बना तुमने
दुःख दे दिए हज़ारों
बेटी ही है इस धरा पर
मारो कभी दुत्कारो
सामर्थ्य दिखाने की
यही राह क्यूँ चुनी
हे प्रभु तुमने ?
जब बैठे थे बनाने
हाथों से अपने बेटी
अपनों से भी लड़ने की
ताकत से मलते मिटटी
क्यूँ धैर्य ,सहनशीलता ,दुःख
ही भरे थे उसमें
हे प्रभु तुमने ?
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शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

क्या दूरदर्शन में दर्शक वर्ग फालतू की श्रेणी में हैं ?‏और क्या यही हैं अच्छे दिन ?

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