बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

क्या हैदराबाद आतंकी हमला भारत की पक्षपात भरी नीति का परिणाम है ?नहीं ये ईर्ष्या की कार्यवाही .


Probe into Hyderabad terror attacks picks up momentum (© AFP)

21 फरवरी 2013 हैदराबाद में आतंकी हमले ने न केवल दहलाया बल्कि पोल खोलकर रख दी हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था की जिसमे ये कहा जाता है कि ''यह संघात्मक व् एकात्मक का सम्मिश्रण है ''अर्थात सामान्यतया इसका रूप संघात्मक बना रहता है किन्तु संकटकाल में राष्ट्रीय एकता व् सुरक्षा के दृष्टिकोण से ऐसे उपबंधों का समावेश किया गया है जो संघात्मक ढांचे को एकात्मक ढांचे में परिणित कर देते हैं .''
         केंद्र व् राज्य दोनों ही इन हमलों की ख़ुफ़िया सूचना के प्रति बरती गयी लापरवाही की जिम्मेदारी एक दूसरे पर डाल रहे हैं .एक ओर जहाँ केंद्रीय ख़ुफ़िया एजेंसी यह कह रही है कि हैदराबाद समेत चार शहरों को आतंकी हमले की आशंका को लेकर खास एलर्ट भेजा गया था वहीँ आंध्र के सी.एम्.किरण रेड्डी का कहना है कि एलर्ट में आतंकी हमले के बारे में कोई सूचना नहीं थी वह सामान्य एलर्ट था रेड्डी ने कहा कि इस तरह के एलर्ट केंद्र से मिलते रहते हैं ..अब दोनों तरफ के वक्तव्य कितने सही तथ्य पर आधारित हैं ये तो वे ही जाने किन्तु जब दोनों जगह एक ही दल की सरकार हो तब ऐसे मामलों में लापरवाही की उम्मीद बेमानी है किन्तु यहाँ लापरवाही भी हुई है और संविधान के एकात्मक गुण की अनदेखी भी क्योंकि न तो यहाँ सरकरों में कोई सामंजस्य है न राज्य की सुरक्षा के पार्टी जागरूकता का कोई भाव .मतलब सब भगवान भरोसे .
             आतंकवाद की ये मार भारत पर कोई पहली बार नहीं पड़ी है .भारत इस मार को लगभग दो -ढाई दशक से झेल रहा है .''जिहाद''के नाम पर जो आतंकी खेल यहाँ पडोसी मुल्क पाकिस्तान के सहयोग से खेला जाता है  उसका कारण हमेशा से खुला है -''कश्मीर का भारत में मिलन '' जो कभी न कश्मीर को रास आया न कभी पाकिस्तान को .पाकिस्तान से बचने की जद्दोजहद में कश्मीर ने सम्मिलन पत्र पर हस्ताक्षर तो कर दिए किन्तु यहाँ के युवा में आजादी की चिगारी सुलगती रही वहीँ पाकिस्तान में प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर इस क्षेत्र को खुद में मिलाने  की .भारत में विशेष दर्जा प्राप्त कश्मीर राज्य आज भारत के लिए आतंक का गढ़ बन चुका है साथ ही सीमापार से प्राप्त सहयोग ने भी उसके हौसले बुलंद कर रखे हैं .अजमल कसाब व् अफजल गुरु कश्मीर-पाकिस्तान के दो ऐसे युवा जिन्होंने भारत में मुंबई आतंकी हमला-संसद पर आतंकी हमले जैसी वारदात को अंजाम दिया और बदले में सजा पाई वाही जिसके वे हक़दार थे और उनकी फाँसी के कारण ही एक आशंका ये सिर उठा रही है कि यह बदले की कार्यवाही है जो भारत की पक्षपात भरी नीति का परिणाम है .इस बात पर विचार किया जा सकता था किन्तु जिस संगठन ने इस आतंकी हमले की जिम्मेदारी ली है उसने इस आशंका को निर्मूल साबित कर दिया है .
     २५ फरवरी २०१३ को समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार के अनुसार ''आन्ध्र प्रदेश भाजपा प्रमुख जी.किरण रेड्डी ने यह कहकर सरगर्मी पैदा की कि उन्हें पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैय्यबा का पत्र मिला है जिसमे उसने इन विस्फोटों की जिम्मेदारी ली है .''
        अब लश्कर-ए-तैय्यबा की आतंवादी गतिविधियों का क्या इतिहास है और क्या कारण वे सभी जानते हैं -
लश्कर-ए-तैयबा
http://hi.wikipedia.org/s/13ir
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लश्कर-ए-तैयबा (उर्दू: لشكرِ طيبه लश्कर-ए-तोएबा, अर्थात शुद्धों की सेना) दक्षिण एशिया के सबसे बडे़ इस्लामी आतंकवादी संगठनों में से एक है। हाफिज़ मुहम्मद सईद ने इसकी स्थापना अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में की थी।[1] वर्तमान में यह पाकिस्तान के लाहौर से अपनी गतिविधियाँ चलाता है, एवं पाक अधिकृत कश्मीर में अनेकों आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर चलाता है।[2] इस संगठन ने भारत के विरुद्ध कई बड़े हमले किये हैं, और अपने आरंभिक दिनों में इसका उद्येश्य अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत शासन हटाना था । अब इसका प्रधान ध्येय कश्मीर से भारत का शासन हटाना है। [3]
       इसके अनुसार कश्मीर से भारत का शासन हटाना इस आतंकी संगठन का ध्येय है और इसी को लेकर यह अपनी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देता है .पाकिस्तान व् कश्मीर दोनों की ही अवाम में भारत व् हिन्दू विरोध गहराई तक जड़ जमाये है और पाकिस्तानी सेना की कट्टरपंथियों से सांठ-गांठ दोनों तरफ की अवाम में हिन्दू विरोधी मानसिकता को ही प्रोत्साहित करती है .ये धारणा इनमे प्रबल है कि भारत हिन्दू राष्ट्र है और यहाँ हिन्दुओं को ही संरक्षण व् प्रमुखता प्राप्त है .रही सही कसर अकबरुद्दीन ओवेसी जैसे कट्टरपंथी नेता पूरी कर देते हैं .वे अपने भड़काऊ भाषणों से देश में अराजकता फ़ैलाने का काम करते हैं और जिस जनता को जिहाद के नाम पर मीलों दूर स्थित प्रशिक्षण शिविरों में भेजा जाता हो ,उसके साथ घोर अमानवीय बर्ताव किया जाता हो ताकि उनमे अपने अस्तित्व के प्रति घृणा का भाव पैदा हो ,इस्लाम के लिए मर मिटने पर जन्नत व् हूरों का पाठ पढाया जाता हो ,पश्चिमी देशों व् भारत में मुसलमानों पर कथित उत्पीडन की फर्जी सी.डी. दिखाई जाती हों  और वह भी केवल इसलिए कि इनमे भारत व् हिन्दुओं के प्रति नफरत पनपे ,वहां केवल यही धारणा बलवती होती है कि ये आतंकी कार्यवाही इनके खून में घोल दी गयी है .बदला तो तब होता जब किसी के साथ किसी गलत व्यवहार की पूर्व में कार्यवाही की गयी हो यहाँ तो नीव में ही बारूद भर दिया गया है यहाँ ऐसी आशंका का कोई मतलब ही नहीं है क्योंकि भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी भी पूर्व में कह चुके हैं कि भारत आतंक का व्यापार नहीं करता ..
   ऐसे में इस कार्यवाही को भारत की किसी भी नीति के विरोध की पलट कार्यवाही नहीं कहा जा सकता .इसे केवल भारत के अस्तित्व जो सदियों से अनेकों झंझावातों को झेलते हुए भी अक्षुण  है उसके लिए ईर्ष्या की कार्यवाही ही कहा जा सकता है जो अब भी डॉ.विजेन्द्र पाल शर्मा  जी के शब्दों में यही कह दूर से मुस्कुरा रही है -   ''भले सूर्य आकर धरती पर अंगारे बरसा दे रे ,
         तूफानों के पाले हैं हम आओ चलो बता दें रे .''
                  शालिनी कौशिक
                         [कौशल ]

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

अरे भई मेरा पीछा छोडो .






     कविवर गोपाल दास ''नीरज''ने कहा है -
  ''जितनी देखी दुनिया सबकी दुल्हन देखी ताले में
   कोई कैद पड़ा मस्जिद में ,कोई बंद शिवाले में ,
    किसको अपना हाथ थमा दूं किसको अपना मन दे दूँ ,
   कोई लूटे अंधियारे में ,कोई ठगे उजाले में .''
धर्म के   ये ही दो रूप हमें भी दृष्टिगोचर होते हैं .कोई धर्म के पीछे अँधा है तो किसी के लिए धर्म मात्र दिखावा बनकर रह गया है .धर्म के नाम पर सम्मेलनों की ,विवादों की ,शोर-शराबे की संख्या तो दिन-प्रतिदिन तेजी से बढती जा रही है लेकिन जो धर्म का मर्म है उसे एक ओर रख दिया गया है .आज जहाँ देखिये कथा वाचक कहीं भगवतगीता ,कहीं रामायण बांचते नज़र आयेंगे ,महिलाओं के सत्संगी संगठन नज़र आएंगे .विभिन्न समितियां कथा समिति आदि नज़र आएँगी लेकिन यदि आप इन धार्मिक समारोहों में कथित सौभाग्य से  सम्मिलित होते हैं तो ये आपको पुरुषों का  बड़े अधिकारियों, नेताओं से जुड़ने का बहाना ,महिलाओं का एक दूसरे की चुगली करने का बहाना  ही नज़र आएगा .
     दो धर्म विशेष ऐसे जिनमे एक में संगीत पर पाबन्दी है तो गौर फरमाएं तो सर्वाधिक कव्वाली,ग़ज़ल गायक आपको उसी धर्म विशेष में मिलेंगे और एक अन्य धर्म के प्रवचन स्थल पर उन उपदेशों को दरकिनार कर उनके ही धर्मावलम्बियों का बड़ी संख्या आगमन भी दिखेगा .
     धर्मान्धता देखकर ही कबीर दास ने कहा था -
''पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार ,
ताते ये चाकी भली ,पीस खाए संसार .''

''कांकर पाथर जोरि के मस्जिद लई बनाये ,
ता चढ़ी मुल्ला बाँगी  दे ,क्या बहरा हुआ खुदाए .''
इन  धर्मों के कामों में यदि कुछ कहा जाये तो बबाल पैदा हो जाते हैं  और न कहने पर जो शोर-शराबे की मार पड़ती है वह असहनीय है .लाउडस्पीकर ,जेनरेटर,डी.जे.जैसे अत्याधुनिक यंत्रों के प्रयोग ने आज जनता को वास्तव में ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन के रूप में सिरदर्द दे दिया है .रोज कोई न कोई आयोजन है और प्रतिदिन उपदेशों के नदियाँ बह रही हैं .फिर भी देश समाज के हाल बेहाल हुए जा रहे हैं .
   कहीं भजन बजता है -
''भला किसी का कर न सको तो बुरा किसी का मत करना ,
पुष्प नहीं बन सकते तो तुम कांटे बनकर मत रहना .''

लोग गाते हैं गुनगुनाते हैं ,तालियाँ बजाते हैं और करते क्या हैं वही जो करना है -लूट -खसोट ,इधर का मॉल उधर -उधर का मॉल इधर .चारों ओर ढकोसले बाजी चल रही है ..भगवा वेश में २५-३० लोगों की बस रोज किसी न किसी शहर में पहुँचती है ,दिन निर्धारित है किस किस दिन आएंगे .भगवा वस्त्र पहनकर आते हैं लोगों से, दुकानदारों से धार्मिक भावना के नाम पर ५०-५० पैसे लेते हैं और अपने अड्डे पर पहुंचकर शराब ,जुए,भांग में उड़ाते हैं .धर्म आज ऐसे ही दिखावों का केंद्र बनकर रह गया है .
     जगह जगह आश्रम खुले हैं .अन्दर के धंधे सभी जानते हैं यही कि ये आश्रम राजनीतिज्ञों के दम पर फल फूल रहे हैं और आम जनता बेवकूफ बन उन साधू महात्माओं के चरण पूज रही है .जिनके काले कारनामे आये दिन सभी के सामने आ रहे हैं .कहने को इन साधू संतों को सांसारिक माया-मोह से कुछ लेना -देना नहीं और  सांसारिक  सुख सुविधा का हर सामान इनके आश्रमों में भरा पड़ा है .दिन प्रतिदिन आश्रमों की चारदीवारी बढती जा रही है और कितने ही अपराधिक कार्य यहाँ से संचालित किये जाते हैं और प्रशासन जनता में इनके प्रति निष्ठा के कारण उसके भड़कने की आशंका से इनपर हाथ डालते हुए घबराते हैं और इसी का दुष्प्रभाव है कि आज जनता की धर्मान्धता का लाभ उठाकर ये आश्रम बहुत बड़े क्षेत्र को निगलते जा रहे हैं .
   इसी कारण लगता है कि आज धर्म भी जनता से अपना पीछा छुड़ाने के मूड में है क्योंकि जो काम आज धर्मस्थलों से संचालित हो रहे हैं और धर्म के नाम पर संचालित किये जा  रहे है उन्हें हमारे किसी भी धर्म ने महत्व नहीं दिया .इसलिए लगता है कि धर्म भी आज यही कह रहा है -
''वो आये मेरी कब्र पे दिया बुझाके चल दिए ,
दिए में जितना तेल था सर पे लगाके चल दिए .''
           शालिनी कौशिक
                  [कौशल ]


शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

अकलमंद ऐसे दुनिया में तबाही करते हैं .

 Expressive criminal -Funny Male Business Criminal Laughing -

तबस्सुम चेहरे पर लाकर हलाक़ करते हैं ,
अकलमंद ऐसे दुनिया में तबाही करते हैं .


बरकंदाज़ी करते ये फरीकबंदी की ,
इबादत गैरों की अपनों से फरक करते हैं .


फ़रेफ्ता अपना ही होना फलसफा इनके जीवन का ,
फर्जी फरजानगी की शख्सियत ये रखते हैं .


मुनहसिर जिस सियासत के मुश्तरक उसमे सब हो लें ,
यूँ ही मौके-बेमौके फसाद करते हैं .


समझते खुद को फरज़ाना मुकाबिल हैं न ये उनके,
जो अँधेरे में भी भेदों पे नज़र रखते हैं .


तखैयुल पहले करते हैं शिकार करते बाद में ,
गुप्तचर मुजरिम को कुछ यूँ तलाश करते हैं .

हुआ जो सावन में अँधा दिखे है सब हरा उसको ,
ऐसे रोगी जहाँ में क्यूं यूँ खुले फिरते हैं .


 रश्क अपनों से रखते ये वफ़ादारी करें उनकी ,
मिटाने को जो मानवता उडान भरते हैं .

हकीकत कहने से पीछे कभी न हटती ''शालिनी''
मौजूं  हालात आकर उसमे ये दम भरते हैं .


शब्दार्थ-तखैयुल -कल्पना ,फसाद-लड़ाई-झगडा ,फरज़ाना -बुद्धिमान ,मुनहसिर-आश्रित ,बरकंदाज़ी -चौकीदारी ,रश्क-जलन ,फरक-भेदभाव .

शालिनी कौशिक
       [कौशल ]

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

सही आज़ादी की इनमे थोड़ी अक्ल भर दे .


 Kashmiri : SRINAGAR, INDIA - JULY 11, 2009: A taxi boatman paddles through the sellers of the floating market, a major tourist attraction on Dal Lake on July 11, 2009 in Srinagar, IndiaKashmiri : SRINAGAR, INDIA - JULY 11, 2009: A Kashmiri man rows by the remainder of the morning floating market on Dal Lake, a major tourist attraction, in Kashmir on July 11, 2009 in Srinagar, India

या खुदा नादानी इनकी दूर कर दे ,
शहादत-ए-बारीकी से दो -चार कर दे .

शहीद कहते हैं किसको नहीं इनको खबर है ,
वही जो मुल्क की खातिर ये जां कुर्बान कर दे .

शहादत देना क्या जाने ऐसा फरेबी ,
परवरिश करने वाले का ही देखो क़त्ल कर दे .

खुदा की राह में बलिदान पाता वह कदर है ,
फ़ना खुद को जो खातिर दूसरों की कर दे .


न केवल नाम से अफज़ल बनो कश्मीर वालों ,
दिखाओ हिन्द के बनकर ,जो इसमें असर दे .

खुदा का शुक्र मनाओ मिले तुम हिन्द में आकर ,
होगे नाशाद तुम्हीं गर ये तुम्हे बाहर ही कर दे .

दुआ मांगूं खुदा से लाये इनको रास्ते पर ,
सही आज़ादी की इनमे थोड़ी अक्ल भर दे .


हुकूमत कर रहा मज़हब इनके दिलों पर ,
कलेजे में वतन का इश्क भर दे .

जियें ये देश की खातिर मरें ये मुल्क पर अपने ,
धडकनें रूहों में इनकी इसी कुदरत की भर दे .

सफल समझेगी ''शालिनी''सभी प्रयास ये अपने ,
वतन से प्रेम की शमां अगर रोशन वो कर दे .


शब्दार्थ -बारीकी-सूक्ष्मता ,अफज़ल-श्रेष्ठ ,नाशाद-बदनसीब ,

      शालिनी कौशिक
                [कौशल ]



मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

दामिनी गैंगरेप कांड :एक राजनीतिक साजिश ?

दामिनी गैंगरेप कांड :एक राजनीतिक साजिश ?
  

भारतीय राजनीति साजिशें रचती रही है और साजिशों का शिकार होती रही है किन्तु एक और तथ्य इसके साथ उल्लेखनीय है कि यहाँ जो दिग्गज बैठे हैं उन्हें साजिशें रचने में रुचि है उन्हें खोलने में नहीं .इन साजिशों का कुप्रभाव उनके विरोधी दिग्गज पर पड़ता है किन्तु बर्बाद हमेशा जनता होती है .सत्ता के लिए रची जाने वाले ये साजिशें जनता के लिए बर्बादी ही लाती हैं इन राजनीतिज्ञों के लिए नहीं क्योंकि ये तो जोड़ तोड़ जानते हैं और अपने को सभी तरह की परिस्थितियों में ढाल लेते हैं .
     यूँ तो सत्ता का तख्ता पलटने को साजिशें निरंतर चलती रहती हैं किन्तु ये साजिशें तब और अधिक बढ़ जाती हैं जब किसी भी जगह चुनाव की घडी निकट आ जाती है .पहले हमारे नेतागण अपने कार्यों द्वारा जनसेवा कर जनता का समर्थन हासिल करते थे पर अब स्थिति पलट चुकी है और जनता के दिमाग को प्रभावित करने के लिए सेवा दबंगई में परिवर्तित हो चुकी है .गुनाहों की दलदल में गहराई तक धंस चुकी हमारी राजनीति की इस सच्चाई को हम सभी जानते हैं किन्तु हमें इस बारे में एक बार फिर सोचने को विवश किया है सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और वर्तमान में भारतीय प्रैस परिषद् के अध्यक्ष ''माननीय मार्कंडेय  काटजू जी ''के इस बयान ने ''कि मैं यह मानने को तैयार नहीं कि वर्ष २००२ के गुजरात दंगों में मोदी का हाथ नहीं था .''कानूनी प्रक्रिया को भली प्रकार जानने वाले ,उसका सम्मान करने वाले और देश की वर्तमान परिस्थितियों से जागरूकता के साथ जुड़े रहने वाले माननीय काटजू जी का ये बयान इसलिए महत्वपूर्ण है कि ये कथन एक ऐसे नेता की ओर इंगित है जिसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एस.आई.टी.द्वारा तीन बार इस मामले में क्लीन चिट दी गयी है और जिसके बारे में ये तथ्य भी आज सबके सामने है  कि वे गुजरात में विकास के अग्रदूत हैं .
    ये बयान और किसी तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करे या न करे किन्तु हमें सत्ता लोलुप नेताओं की साजिशों की गहराई में जाने को अवश्य विवश करता है और ध्यान  दिलाता है अभी हाल  में ही देश क्या सम्पूर्ण विश्व को हिला देने वाले ''दामिनी गैंगरेप कांड ''की जिसके बारे में बहुत से तथ्य ऐसे हैं जो संदेह के घेरे में इस कांड को ले आते हैं।यूँ तो देखने में यह कांड ६ दरिदों के द्वारा अपनी हवस को बुझाने के लिए किया गया एक सामान्य गैंगरेप कांड ही दिखाई देता है इस कांड की निम्न बातें जो कि संदेह के घेरे में हैं वे निम्न लिखित हैं -
-सबसे पहले तो पुलिस द्वारा व्यापारी की बात पर ध्यान न दिया जाना और बस को दिल्ली जैसी जगह जहाँ आतंकवादियों की गहमागहमी के कारण पुलिस सतर्कता कुछ ज्यादा ही रखी जाती है ,बस को आराम से २ घंटे तक घूमने देना .
 -दूसरे बस का घुमते रहना तो पुलिस की नज़र में न आना किन्तु घटना की सूचना पर उसका ४ मिनट में वहां पहुँच जाना .
-तीसरे बड़े से बड़े अपराधी जिनके बारे में कोई खास खोजबीन आवश्यक नहीं होती वे तो पुलिस की गिरफ्त में आने में सालों लग जाते हैं और ये अपराधी जिनके बारे में जानकारी जुटाना ही पहले मुश्किल था उन्हें मात्र ७२ घंटे में गिरफ्तार कर लेना .
 -दामिनी व् उसके दोस्त को अपराधियों द्वारा जिन्दा सड़क पर फैंक देना आमतौर पर ऐसे मामलों में अपराधी न पीड़ित को जिंदा छोड़ते हैं न चश्मदीद को .
-और पुलिस द्वारा लगातार मुख्यमंत्री के आदेशों की अवहेलना .
       ऊपर ऊपर से साधारण  गैगरेप कांड लगने वाले इस कांड के ये तथ्य ही इस कांड को रहस्य के घेरे में ले आते हैं कि आखिर उन दरिंदों ने यहाँ इतनी सहृदयता क्यों दिखाई कि दामिनी व् उसके दोस्त को जिंदा छोड़ दिया क्योंकि यदि वे उन्हें जिन्दा न छोड़ते तो एक लड़के व् एक लड़की का साथ इस तरह से मिलने में पूरा शक लड़के पर ही जाता और दामिनी भी उसी सामान्य मानसिकता से भुला दी जाती जो एक लड़के व् लड़की के साथ को शक की नज़र से ही देखते हैं .फिर अपराधियों को इतनी शीघ्रता से जेल के सींखचों के पीछे लिया जाना ये संदेह उत्पन्न  करता है कि कहीं न कहीं ये अपराधी पुलिस की पकड़ में ही थे .जनता के क्रोध से उन्हें बचाने  और मामला कहीं जनता के दबाव में वे अपराधी खोल ही न दें इसलिए उन्हें इतनी शीघ्रता से गिरफ्तार करना दिखाया गया और दामिनी व् उसके दोस्त को यूँ ही जिंदा छोड़ा गया ताकि जनता में उन्हें लेकर सहानुभूति बढे और साजिश रचने वाले को वह मनचाहा परिणाम मिल जाये जिसके लिए एक उभरती प्रतिभा मासूम ऐसी वहशियाना हरकत की भेंट चढ़ा दी गयी .१६ दिसंबर के बाद से भी ऐसी घटनाएँ बंद थोड़े ही हुई हैं बल्कि जितनी बाढ़ अब आई हुई है इतनी शायद पहले कभी नहीं देखी होगी .खुद दिल्ली में ही एक लड़की से घर में घुसकर रेप में नाकाम रहने पर उसके मुहं में पाइप डाल दिया गया जिसके बाद से वह लड़की जीवन मृत्यु के बीच  झूल रही है और न कहीं वह राजनेता हैं जो दामिनी के मामले में फाँसी की मांग कर रहे थे और न कहीं वह जनता है जो पुलिसिया कार्यवाही से भी नहीं डर रही थी . जिंदगी फिर उसी तरह से चल पड़ी है जैसे दामिनी कांड से पहले चल रही थी .ऐसे अपराध पहले भी हुए हैं और आगे भी होंगे किन्तु इनके पीछे के हाथ कभी न दिखाई देंगे .संभव है कि गोधरा कांड की तरह इसमें भी अपराधी सजा पायें और संभव है कि वे जेल में ही निबटा दिए जाएँ क्योंकि जिस राजनीतिक साजिश का वे हिस्सा बने हैं उसने उनके भाग्य में कारावास या मृत्यु ही लिखी है कानून द्वारा या अपने हाथों द्वारा .ये भी संभव है कि ये कांड विरोधी पक्ष द्वारा सत्ता का तख्ता पलटने को ही कराया गया हो और ये भी संभव है कि सत्ता पक्ष द्वारा अपनी दबंगई दिखने को इसे अंजाम दिया गया हो फ़िलहाल ये सभी जानते हैं कि ये कभी नहीं खुलेगा .दोनों तरफ से कोरी बयानबाजी और आपसी लेनदेन ही चलता रहेगा और जनता की आँखों पर पहले के अनेकों घटनाक्रमों की तरह इस बार भी रहस्य का पर्दा पड़ा रहेगा क्योंकि ऐसी घटनाओं के सूत्रधार इस बार भी गोधरा की तरह रहस्य के घेरे में रहने वाले हैं .इससे अधिक क्या कहूं -
      ''चाँद में आग हो तो गगन क्या करे ,
       फूल ही उग्र हो तो चमन क्या करे ,
       रोकर ये कहता है मेरा तिरंगा

      कुर्सियां ही भ्रष्ट हों तो वतन क्या करे .''
 

   शालिनी कौशिक
  [कौशल ]

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

बद्दुवायें ये हैं उस माँ की खोयी है जिसने दामिनी ,

शोभना ब्लॉग रत्न सम्मान प्रविष्टि संख्या -6

 Mother : Beautiful black and white imahe of tlhe virgin Mary and the baby JesusMother : Virgin mary statue at Chantaburi province, Thailand.  Stock Photo
मेरी  मासूम बेटी ने बिगाड़ा क्या था कमबख्तों ,
उसे क्यूँ इस तरह रौंदा ,ज़रा मुहं खोलो कमबख्तों .

बने फिरते हो तुम इन्सां क्या था ये काम तुम्हारा ,
नोच डाली कली  मेरी, मरो तुम डूब कमबख्तों .

मिटाने को हवस अपनी मेरी बेटी मिली तुमको ,
भिड़ते शेरनी से गर, तड़पते खूब कमबख्तों .

दिखाया मेरी बच्ची ने तुम्हें है दामिनी बनकर ,
 झेलकर ज़ुल्म तुम्हारे, जगाया देश कमबख्तों .

किया तुमने जो संग उसके मिले फरजाम अब तुमको ,
देश का बच्चा बच्चा अब, देगा दुत्कार कमबख्तों .

कभी एक बेटी थी मेरी करोड़ों बेटियां हैं अब ,
बचाऊंगी सभी को मैं ,सजा दिलवाकर कमबख्तों .

मिला ये जन्म आदम का न इसकी कीमत तुम समझे ,
जो करना था तुम्हें ऐसा ,होते कुत्तों तुम कमबख्तों .

गुजारो जेल में जीवन कीड़े देह में भर जाएँ ,
तुम्हारा हश्र देखकर, न फिर हो ऐसा कमबख्तों .

बद्दुवायें ये हैं उस माँ की खोयी  है जिसने दामिनी ,
दुआ देती है ''शालिनी'',पड़ें तुम पर ये कमबख्तों .

                    शालिनी कौशिक
                        [कौशल ]





रविवार, 17 फ़रवरी 2013

कैग [विनोद राय ] व् मुख्य निर्वाचन आयुक्त [टी.एन.शेषन ]की समझ व् संवैधानिक स्थिति का कोई मुकाबला नहीं .


 
 एक बहस सी छिड़ी हुई है इस मुद्दे पर कि कैग विनोद राय ने जो किया सही था या नहीं ?अधिकांश यही मानते हैं कि विनोद राय ने जो किया सही किया .आखिर  टी.एन.शेषन से पहले भी कौन जनता था चुनाव आयुक्तों को ?और यह केवल इसलिए क्योंकि एक लम्बे समय से कॉंग्रेस  नेतृत्व से जनता उकता चुकी है
और इस कारण जो बात भी कॉंग्रेस सरकार के खिलाफ जाती है उसका समर्थन करने में यह जनता जुट जाती है और दरकिनार कर देती है उस संविधान को भी जो हमारा सर्वोच्च कानून है और हमारे द्वारा समर्थित व् आत्मार्पित है . 
हमारे संविधान के अनुच्छेद १४९ के अनुसार -नियंत्रक महालेखा परीक्षक उन कर्तव्यों का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो संसद निर्मित विधि के द्वारा या उसके अधीन विहित किये जाएँ .जब तक संसद ऐसी कोई विधि पारित नहीं कर देती है तब तक वह ऐसे कर्तव्यों का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो संविधान लागू होने के पूर्व भारत के महालेखा परीक्षक को प्राप्त थे .
    इस प्रकार उसके दो प्रमुख कर्तव्य हैं -प्रथम ,एकाउंटेंट के रूप में वह भारत की संचित निधि में से निकली जाने वाली सभी रकमों पर नियंत्रण रखता है ;और दूसरे,ऑडिटर के रूप में वह संघ और राज्यों के सभी खर्चों की लेख परीक्षा करता है .वह संघ और राज्य के लेखों को ऐसे प्रारूप में रखेगा जो राष्ट्रपति भारत के नियंत्रक-महालेखा-परीक्षक की राय के पश्चात् विहित करे .
     संघ लेखा सम्बन्धी महा लेखापरीक्षक का प्रतिवेदन राष्ट्रपति के समक्ष  रखा जायेगा जो उसे संसद के समक्ष पेश करवाएगा .
  अब आते हैं मुख्य निर्वाचन आयुक्त की संवैधानिक स्थिति पर -मुख्य निर्वाचन आयुक्त निर्वाचन आयोग के कार्यों का सञ्चालन करता है और जो कि निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करता है तब जब कोई अन्य निर्वाचन आयुक्त इस प्रकार नियुक्त किया जाता है [अनु.324-3]
   निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र निकाय है और संविधान इस बात को सुनिश्चित करता है कि जैसे उच्चतम न्यायालय [न्यायपालिका ]कार्यपालिका के हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र व् निष्पक्ष रूप से कार्य करता है वैसे ही निर्वाचन आयोग भी कर सके .
   अनुच्छेद ३२४ के अंतर्गत निर्वाचनों का निरीक्षण ,निर्देशन और नियंत्रण करना निर्वाचन आयोग का कार्य है.

      इस प्रकार अनु.३२४-१ के द्वारा प्रदत्त अधिकार इतने व्यापक हैं कि निर्वाचन आयोग के प्रधान के रूप में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अधिकारों को स्वयमेव ही परिभाषित कर देते हैं -
   -कन्हैय्या बनाम त्रिवेदी [१९८६] तथा जोसे बनाम सिवान [१९८७]के वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा -कि अधीक्षण ,निदेशन व् नियंत्रण के अधिकार में यह निहित है कि निर्वाचन आयोग उन सभी आकस्मिकताओं में भी ,जिनका विधि में उपबंध नहीं किया गया है ,कार्य करने की शक्ति रखता है . 

 -महेन्द्र बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त [१९७८] के वाद में स्पष्ट किया गया है कि -उसे निर्वाचन के सञ्चालन के लिए आवश्यक आदेश ,जिनमे पुनः मतदान कराने या न कराने का आदेश भी सम्मिलित है ,पारित करने का अधिकार है ,राजनीतिक दलों के प्रतीक के आवंटन से सम्बंधित विवादों पर निर्णय  देने तथा राजनीतिक दलों को मान्यता देने या उसे समाप्त करने का अधिकार भी निर्वाचन आयुक्त को है [सादिक अली बनाम निर्वाचन आयुक्त १९७२]
   इस प्रकार २१ जून १९९१ को राजीव गाँधी की हत्या के बाद चुनाव का अगला दौर तीन सप्ताह के लिए स्थगित करना ,पंजाब विधान सभा चुनाव मतदान से ठीक एक दिन पहले स्थगित करना ,आंध्र व् पश्चिम बंगाल में मुख्य चुनाव अधिकारी की नियुक्ति के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को पत्र लिखकर आरोप लगाना ''कि पश्चिम बंगाल में संवैधानिक तंत्र पूरी तरह से टूट गया है '',केरल के ओट्टापलम व् मद्रास के पालानी के चुनाव स्थगन आदि जो भी कार्य शेषन द्वारा किये गए वे निर्वाचन  आयोग के कार्यों के रूप में शेषन को अधिकार रूप में प्राप्त थे उनका एक कार्य भी संवैधानिक मर्यादा से बाहर जाकर नहीं किया गया था हाँ ये ज़रूर है कि उन्होंने जिस तरह से अपने अधिकारों का प्रयोग किया उस तरह से उनसे पहले के चुनाव आयुक्तों ने नहीं किया था इसलिए वे  सत्ता के लिए सिरदर्द बने और उनपर नियंत्रण के लिए ही दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की गयी .
     और कैग जिन्हें भारत की संचित निधि से निकाली जाने वाली सभी रकमों पर नियंत्रण का अधिकार है वे अपनी शक्ति को महत्व न देते हुए कहते हैं -'' कि सिविल सोसायटी  की अधिकाधिक रुचि को मद्देनज़र रखते हुए क्या हमारा काम केवल सरकारी खर्च का हिसाब किताब जांचने और रिपोर्ट संसद पटल पर रखने तक ही सीमित है ?''
   पहले के निर्वाचन आयुक्तों की अपेक्षा जैसे शेषन ने अपने अधिकारों में से ही अपने कार्य करने की शक्ति ढूंढी विनोद राय क्यों नहीं देखते ?क्या नहीं जानते कि सारी विश्व व्यवस्था पैसे पर टिकी है और वे जिस पद पर हैं उसके हाथ में ही सारे पैसे का नियंत्रण है .भले ही वे खुद को मात्र एकाउंटैंट ही समझें किन्तु इस पद पर होकर क्षुब्ध होने जैसी कोई बात नहीं है .सरकार के उचित अनुचित खर्चों का नियंत्रण उनके हाथ में है इस प्रकार सरकारी गतिविधियों पर अंकुश लगाना उनके बाएं हाथ का खेल है.इस प्रकार वे सरकारी धन का सदुपयोग  कर सकते हैं और उसकी बिल्कुल सही  निष्पक्ष रिपोर्ट सदन के पटल पर रखकर संवैधानिक निष्ठां की जिम्मेदारी भी पूरी कर सकते हैं .अन्य राष्ट्रों में महालेखा परीक्षकों को प्राप्त उच्च स्थान को लेकर उनका क्षोभ इसलिए मान्य नहीं किया जा सकता क्योंकि वे एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद धारण करते हैं .आज जो विपक्षी दल उनके अमेरिका के हार्वर्ड केनेडी स्कूल में दिए गए भाषण को उनकी वर्तमान व्यवस्था के प्रति नाराजगी के रूप में व्यक्त कर उनका समर्थन कर रहे हैं उन्हें उनकी संवैधानिक स्थिति में जो बदलाव वे चाहते हैं वैसे संशोधन के प्रस्ताव का कथन भी उनसे करना चाहिए और उसकी जोरदार आवाज़ भी उनके द्वारा उठाई जानी चाहिए ताकि उनका सच्चा समर्थन विनोद राय के प्रति अर्थात एक महालेखा परीक्षक की संवैधानिक स्थिति की मजबूती के प्रति सही रूप में प्रकट हो सके और यह भी दिखाई दे जाये  कि  वे वास्तव में इस स्थिति में  बदलाव चाहते हैं न कि सत्ता की नकेल कसने को ऐसा कर रहे हैं .
    क्योंकि यदि ऐसा कोई संशोधन लाया जाता है तो संविधान  के  अध्याय ५ से सम्बंधित होने के कारण सदन के कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित व् मतदान करने वाले दो तिहाई सदस्यों के मत के साथ आधे राज्यों के विधान मंडल द्वारा पारित होकर अनुसमर्थन भी आवश्यक है जिस पर राष्ट्रपति की अनुमति के पश्चात् यह अनु.३६८ के अंतर्गत एक संशोधन के रूप मान्य होगा . 
    फिर एक तरफ विनोद राय कहते हैं कि लोकलेखा की परंपरागत भूमिका वित्तीय लेनदेन की जाँच-पड़ताल करना है पर क्या आम आदमी के इससे कोई सरोकार नहीं कि सरकार धन को कैसे खर्च करती है ?और दूसरी तरफ वे कहते हैं कि हम अपने लेखा परीक्षण आकलनों में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों को व्यापकता प्रदान करने के लिए संलग्नक के तौर पर छोटी पुस्तिकाएं और रिपोर्ट तैयार करते हैं .इनसे विषय विशेष पर लोगों को तमाम महत्वपूर्ण सन्दर्भ जानकारी भी मिल जाती है और उनकी जागरूकता भी बढती है .नतीजतन वे सरकार से बेहतर योजनायें और उनके क्रियान्वयन की मांग करते हैं .
   ये महत्वपूर्ण कार्य जो वे अपनी संवैधानिक मर्यादा के अधीन रहकर कर रहे हैं और आज के भारत का सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ जिसके  अनुच्छेद २-ज के अंतर्गत जनता -
 -कार्यों ,दस्तावेजों,अभिलेखों का निरीक्षण कर सकती है .
-दस्तावेजों या अभिलेखों की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ ले सकती है .

 -सामग्री के प्रमाणित नमूने ले सकती है .
-यदि सूचना कम्पूटर व् अन्य तरीके से रखी गयी  है तो डिस्केट ,फ्लॉपी ,टेप ,वीडियो कैसिट या अन्य इलेक्ट्रोनिक माध्यम या प्रिंट आउट के रूप में सूचना प्राप्त कर सकती है .

      साथ ही जनलोकपाल पर जनता की उमड़ी भीड़ ,क्या इसके बाद भी जनता के जीवन स्तर में सुधार की आड़ ले उनका इस तरह का संवैधानिक मर्यादा का हनन उन्हें शोभा देता है ?राजनीतिक विरोध या राजनैतिक पक्षपात के आधार पर हम इनके कार्यों को गलत सही का आकलन नहीं कर सकते .यूँ तो शेषन पर भी चंद्रशेखर सरकार,राजीव गाँधी सरकार के करीबी होने के व् उन्हें फायदा पहुँचाने के आरोप लगते रहे तब भी उन्होंने जो भी किया अपने पद की गरिमा व् मर्यादा के अनुकूल किया ऐसे ही विनोद राय पर भी यही आरोप लग रहे हैं कि ''ये भाजपा के करीब हैं और आने वाले समय में उनकी सरकार की संभाव्यता देखकर ही ऐसे अनुचित कार्य कर रहे हैं .''किन्तु ये तो उन्हें ही देखना होगा कि जो कार्य वे कर रहे हैं वह न तो जनता के हित में है न देश हित में कि विदेश में जाकर भारतीय राजनीति पर कीचड उछाली जाये .२३ मई 1991 को शेषन ने एक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में अनुशासनात्मक शक्तियां संविधान के अंतर्गत लेने के लिए पंजाब चुनावों का कच्चा चिटठा खोलने का दबाव बनाया किन्तु वह जो उन्होंने किया देश के अन्दर किया न कि विनोद राय की तरह ,जिन्होंने अपने देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होते हुए भी विदेशी राष्ट्र में अपनी क्षुब्धता की अभिव्यक्ति की इसलिए यही कहना पड़ रहा है कि  कैग [विनोद राय ] व् मुख्य निर्वाचन आयुक्त [टी.एन.शेषन ]की समझ व् संवैधानिक स्थिति का कोई मुकाबला नहीं .        
        शालिनी कौशिक
             [कौशल ]


शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

नारी खड़ी बाज़ार में -बेच रही है देह !

 अभी अभी  जब मैं चाय बनाने चली तो पहले उसके लिए मुझे चाय के डिब्बे में भरने को चाय का पैकिट खोलना पड़ा वह तो मैंने खोल लिया और जैसे ही मैं डिब्बे में चाय भरने लगी कि क्या देखती हूँ पैकिट के पीछे चाय पीने को प्रेरित करती एक मॉडल का फोटो जिसे  देखकर मन ने कहा क्या ज़रुरत थी इसके लिए ऐसे विज्ञापन की 
यही नहीं आज से कुछ दिन पहले समाचार पत्र की मैगजीन में भी एक ऐसा ही विज्ञापन था जिसके लिए उस अंगप्रदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं थी जो उसके लिए किया गया था .
                                            
 ये तो मात्र ज़रा सी झलक है आज की महिला सशक्तिकरण और उसके आधुनिकता में ढलने की जिसे आज के कथित आधुनिक लोगों का समर्थन भी मिल रहा है और ये कहकर की सुविधा की दृष्टि से ये सब हो रहा है मात्र चप्पल बेचने को ,चाय बेचने को ही नहीं बाज़ार की बहुत सी अन्य चीज़ों को बेचने के लिए नारी देह का इस्तेमाल किया जा रहा है जैसे कि अगर नारी ने कपडे कम नहीं पहने  तो चाय तो बिकेगी ही नहीं या भारत में चाय बिकनी ही बंद हो जाएगी वैसे ही चप्पल जो कि पैरों में पहनी जाती है यदि वह कैटरिना कैफ ने न पहनी और पहनते वक़्त उनके सुन्दर अंगों का प्रदर्शन नहीं हुआ तो चप्पल की कंपनी बंद हो जाएगी और यही नहीं कि इसके लिए मात्र ये कम्पनियाँ ही जिम्मेदार हैं जिम्मेदार है आज की आधुनिकता के लिए पागल नारी भी जो अपने शरीर के वस्त्रों को उतारने में ही अपनी प्रगति मान बैठी है और यही कारण है कि सिल्क स्मिता जैसी मॉडल आत्महत्या की और बढती है क्योंकि वे देह आधारित जीवन जीती हैं और सभी जानते हैं कि इस शरीर की एक निश्चित अवधि ही होती है उस तरह का सुन्दर व् आकर्षक दिखने की जो बाज़ार में बिकता है और जिसके लिए इन मॉडल्स को पैसा मिलता है धीरे धीर जब उनकी देह का आकर्षण कम होता है तब उनकी देह के लिए पैसा लुटाने वाले और मॉडल्स को देखने लगते हैं और आरंभ होता है अवसाद का दौर जो उन्हें धकेलता है आत्महत्या की ओर इसके साथ ही वे लोग जो इस तरह की ड्रेसेस  को नारी के आधुनिक होने का पैमाना मानते हैं और ये कहते हैं कि आज तेज़ी का ज़माना है और दौड़  धूप के इस ज़माने में इस तरह की ड्रेसेस से ही भागीदार हुआ जा सकता है तो उनकी जानकारी के लिए बता दूं कि एक समय साडी  पर भी शाल ओढ़ा जाता था सुविधा के लिए वह शाल उतर गया साडी की जगह सलवार सूट भी सुविधा के नाम पर पहन जाने लगा अब उसमे भी दिक्कत आखिर ये सुविधा नारी के ही कपड़ों का हरण क्यों करती जा रही है पुरुषों के क्यों नहीं वे तो आज भी पेंट कमीज पहनते हैं सूट पहनते हैं न उन्हें सर्दी लगती है न गर्मी ,न उन्हें बस में चढ़ने में कोई परेशानी  न घर में रहने में ये सब नारी को ही क्यों होती हैं क्यों नारी अपने शरीर पर आधारित जीवन जीती है  क्यों वह एक वस्तु बनकर रहती है कि किसी विशेष समारोह में अगर उसे शामिल होना है तो उसके लम्बे बाल खुल जायेंगे तभी वह खूबसूरत लगेगी ,किसी विवाह समारोह में शामिल होगी तो चाहे हड्डी कंपाने वाली ठण्ड हो तब भी उसके शरीर पर कोई गरम कपडा नहीं होगा आखिर कब समझेगी नारी ?अपनी सही पहचान के लिए इस तरह शरीर का प्रदर्शन वह कब त्यागेगी ?क्यों नहीं समझती वह कि मानव शरीर भगवान ने हमें इस दुनिया में कुछ सकारात्मक कार्य करने  के लिए दिया है अगर इस तरह वस्त्रविहीन होने के लिए ही देना होता तो जानवर शरीर ही दे देता उनसे ज्यादा वस्त्रविहीन तो नहीं रह सकती न नारी . इसलिए नारी को अगर वास्तव में सशक्त होना है तो दिमाग के बल पर होना होगा शरीर के बल पर नहीं और शरीर के बल पर और दिमाग के बल पर आधारित नारी की प्रगति के स्थायित्व के अंतर  को वे बखूबी देख सकती है राखी सावंत आज कहाँ है और इंदिरा नुई आज कहाँ हैं .पूनम पांडे आज कहाँ हैं और सुनीता विलियम्स आज कहाँ हैं .इसलिए विचार करें नारी अपने व्यक्तित्व पर  न कि  शरीर की  बिक्री पर .
                            शालिनी कौशिक 
                                 [कौशल ]
   

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

मीडियाई वेलेंटाइन तेजाबी गुलाब

मीडियाई वेलेंटाइन तेजाबी गुलाब
                              Goddess Saraswati
  १४ फरवरी अधिकांशतया वसंत ऋतू के  आरम्भ का समय है .वसंत वह ऋतू जब प्रकृति  नव स्वरुप ग्रहण करती है ,पेड़ पौधों पर नव कोपल विकसित होती हैं ,विद्या की देवी माँ सरस्वती का जन्मदिन भी धरती वासी वसंत पंचमी को ही मनाते हैं .इस दिन विद्यार्थियों के लिए विद्या प्राप्ति के क्षेत्र में पदार्पण शुभ माना जाता  है.ये सब वसंत के आगमन से या फरवरी के महीने से सम्बन्ध ऐसे श्रृंगार हैं जिनसे हमारा हिंदुस्तान उसी प्रकार सुशोभित है जिस प्रकार विभिन्न धर्मों ,संस्कारों ,वीरों ,विद्वानों से अलंकृत है .यहाँ की शोभा के विषय में कवि लिखते हैं -
    ''गूंजे कहीं शंख कहीं पे अजान है ,
  बाइबिल है ,ग्रन्थ साहब है,गीता का ज्ञान है ,
दुनिया में कहीं और ये मंजर नहीं नसीब ,
  दिखलाओ ज़माने को ये हिंदुस्तान है .''
 ऐसे हिंदुस्तान में जहाँ आने वाली  पीढ़ी के लिए आदर्शों की स्थापना और प्रेरणा यहाँ के मीडिया का पुनीत उद्देश्य हुआ करता था .स्वतंत्रता संग्राम के समय मीडिया के माध्यम से ही हमारे क्रांतिकारियों ने देश की जनता में क्रांति का बिगुल फूंका था .आज जिस दिशा में कार्य कर रहा  हैं वह कहीं से भी हमारी युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक व् प्रेरक नहीं कहा जा सकता .आज १४ फरवरी वेलेंटाइन डे के नाम से विख्यात है .एक तरफ जहाँ इस दिन को लेकर युवाओं के दिलों की धडकनें तेज़ हो रही हैं वहीँ दूसरी ओर लाठियां और गोलियां भी चल रही हैं और इस काम में बढ़ावा दे  रहा है हमारा मीडिया -आज का मीडिया .
     जहाँ एक ओर मीडिया की सुर्खियाँ हुआ करती थी -
''जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमे रसधार नहीं ,
 वह ह्रदय नहीं है पत्थर है जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं .''

''पूछा उसने क्या नाम बता ?
  आज़ाद !पिता को क्या कहते ?
  स्वाधीन पिता का नाम ,और बोलो किस घर में हो रहते ?
  कहते हैं जेलखाना जिसको वीरों का घर है
   हम उसमे रहने वालें हैं ,उद्देश्य मुक्ति का संघर्ष है .''

आज प्रमुखता दे रहा है -
''यूँ मेरे ख़त का जवाब आया ,
     लिफाफे में एक गुलाब आया .''
एक तरफ सत्य का उजाला ,एक तरफ समाज की वास्तविकता ,राजनीति की कालिख सबके सामने लेन का विश्वास दिलाने वाला मीडिया आज युवाओं को बेच रहा है विदेशी संस्कृति जिसे भारतीय अपसंस्कृति भी कह सकते हैं ,गलत प्रवर्तियाँ भी कह सकते हैं .प्यार जिसके लिए भारतीय संस्कृति में जो भाव विद्यमान है उसे देवल आशीष अपने शब्दों में यूँ व्यक्त करते हैं -
''  प्यार है पवित्र पुंज ,प्यार पुण्य धाम है ,
पुण्य धाम जिसमे कि राधिका है श्याम है ,
श्याम की मुरलिया की ,हर गूँज प्यार है ,
प्यार कर्म प्यार धर्म ,प्यार प्रभु नाम है .''
भारतीय मीडिया द्वारा बिकाऊ श्रेणी में लाया जा रहा है .रोम के संत वेलेंटाइन के नाम पर मनाया जाने वाला यह सप्ताह भारत में समाचार पत्रों द्वारा जोर शोर से प्रचारित किया जा रहा है .७ फरवरी से ही रोज हमारे समाचार पत्र बताते हैं -
''आज से बहेगी गुलाबी बयार ''
''आज रोज़ डे .आज प्रोमिस डे,चोकलेट डे ,प्रपोज डे ,ऐसे करें प्रपोज आदि आदि .''
 यही नहीं ज्योतिषी आकलन कर भी बताया जाता है कि किस किस के लिए रोज़ डे अच्छा रहेगा किसके लिए प्रपोज डे, कपडे का रंग कैसा हो और इनके अच्छे रहने के लिए ज्योतिषी उपाय भी बताये जाते हैं जिनके जरिये लड़की के बाप-भाई, समाज के संस्कारों के ठेकेदारों रुपी विपत्तियों  से बचा जा सकता है .कुल मिलाकर  यही कहा जा सकता है कि बाज़ार में बिकने के लिए और विश्व में सर्वाधिक पठनीय ,रेटिंग आदि उपलब्धियां अर्जित करने के लिए मीडिया के ये अंग भारतीय समाज में आवारागर्दी को बढ़ावा दे रहे हैं .ये आज की फ़िल्में हैं जो प्यार के नाम पर वासना का भूत युवाओं के सिर पर चढ़ा रही हैं .ये समाचार पत्र हैं  जो अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए कहीं फेयरवेल समारोह के तो कहीं फ्रेशर पार्टी में लड़के लड़कियों के युगल नृत्यों के चित्र छाप रहे हैंमीडिया के इन अंगों में हीरोइनों के अश्लील चित्रों का ही असर है कि लड़कियां जो पहले भारतीय  परिधानों में गौरवान्वित महसूस करती थी आज कपडे छोटे करने में खुद को हीरोइन बनाने में [और वह भी फ़िल्मी न कि ऐतिहासिक ] जुटी हैं .ये फ़िल्मी असर ही है कि दिन रात  कभी भी लड़के लड़कियों के जोड़े शहरों में अभद्र आचरण करते घूमते हैं  और ये समाचार पत्रों की ही कारस्तानी है जो वासना ,आकर्षण में डूबे इन जोड़ों को प्रेमी युगल कहकर सम्मानित करता है .ये ऐसे सम्मान का ही असर है कि दामिनी जैसी गैंगरेप की घटनाएँ घट  रही हैं और बढती जा रही हैं .क्योंकि जब सभ्य समाज कहे जाने वाले  ये युवा खुद पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं तो जंगली ,गंवार कहे  जाने वाले वे युवा तो पहले ही से नियंत्रण जैसी भावनाओं को जानते ही नहीं ,उनका कहना तो मात्र ये होता है ''-जब तू एक के साथ फिर सकती है तो हमारे साथ क्यों नहीं ,हम ही क्या बुरे ?''ये हमारा मीडिया ही है जो चार बच्चों की माँ को भी ''प्रेमिका '' कहकर संबोधित करता है .क्या नहीं जानता कि ये भारतीय समाज है जहाँ की संस्कृति में लड़कियों को शर्म लाज से सजाया जाता है और लड़कों को बड़ों का  आज्ञा पालन व् आदर करना सिखाया जाता है .यह वह संस्कृति है जहाँ सीता राम को पसंद करते हुए भी माँ गौरी से प्रार्थना करती हैं -
''..........करहूँ चाप गुरुता अति थोरी .''
अर्थात हे माँ धनुष को थोडा हल्का कर दीजिये .''वे अपनी चाहत माँ गौरी की आराधना से पूरी करना चाहती हैं न कि पिता का प्रण  तोड़ राम के साथ घर से भागकर .ऐसे ही राम सीता के प्रति आसक्त होते हुए भी गुरु विश्वामित्र की आज्ञा के पश्चात् ही धनुष को उठाने को आगे बढ़ते हैं-
   ''.....उठहु राम भंजहु भव चापा ,
   मेटहु तात जनक के तापा .''
 और पिता दशरथ की आज्ञा की प्राप्ति के पश्चात् ही सीता को वधू के रूप में स्वीकार करते हैं .ये भारतीय संस्कृति ही है जो राम कृष्ण दोनों के भगवान  होने पर भी राम की सर्व-स्वीकार्यता स्थापित करती है उनका मर्यादा पुरुषोत्तम होना और सीता का मर्यादा का पालन करना ही वह गुण है जो सभी पुत्र रूप में राम की और पुत्री रूप में सीता की कामना करते हैं .
   आज भारतीय मीडिया अपने सांस्कृतिक स्वरुप को खो रहा हैं और विदेशों के खुले वातावरण को जहाँ संस्कारों के लिए कोई स्थान ही नहीं है यहाँ मान्यता दिलाने का प्रयास कर रहे हैं किन्तु यहाँ ऐसे प्रयास कुचेष्टाएं ही कही जाएँगी क्योंकि भारत में इन्हें कभी भी मान्यता नहीं मिल सकती जो ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ अपनाने के फेर में अपनी संस्कृति की उपेक्षा करते हैं उनको डिम्पल मिश्र जैसे अंजाम भुगतने पड़ते हैं .आज मीडिया युवाओं को उकसाकर उन्हें रोज़ डे ,प्रोमिस डे,प्रोपोज डे ,हग डे ,चोकलेट डे जैसे भ्रमों में डालकर  जो कार्य करने को उन्हें आगे बढ़ा रहा है उसे यहाँ की देसी भाषा में ''आवारागर्दी ''कहते हैं और उसका परिणाम शिव सैनिकों की उग्रता के रूप में दुकानों को भुगतना पड़ता है. आज जिस चेहरे में ख़ूबसूरती के चाँद नज़र आते हैं कल को उसे अपने से अलग होने पर तेजाब से झुलसा दिया जाता है और ये लड़की के लिए जीवन भर का अभिशाप बनकर रह जाता है .आज मीडिया के इसी गलत प्रचार का ही परिणाम है की लड़कियां गोली का ,तेजाब का शिकार हो रही है ,लड़के अपराध या फिर आत्महत्या की राह पर आगे बढ़ रहे हैं .आज गुलामी का समय नहीं है किन्तु मीडिया का दायित्व आज भी बहुत अधिक है क्योंकि इसका प्रभाव भी बहुत अधिक है .मीडिया लोकतंत्र का एक मजबूत  स्तम्भ है और उसे जानना ही होगा कि हम भले ही कितने अग्रगामी हो जाएँ किन्तु हमारी संस्कृति में भाई भले ही किसी से प्यार कर ले किन्तु अपनी बहन को उस राह पर आगे बढ़ते नहीं देख सकता और ये भी हमारी संस्कृति ही है जो आई ए एस में सर्वोच्च रेंक हासिल करने वाली शेन अग्रवाल से भी विवाह के सम्बन्ध में माता -पिता की ही सोच को मान्यता दिलाती है .इस संस्कृति के ही कारण हमारे परिवार ,हमारा समाज विश्व में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं विदेशियों को आकर्षित करते हैं और जोड़ते हैं हमें किसी और संस्कृति की नक़ल करने की कोई आवश्यकता ही नही है और इसलिए मेरा भारतीय मीडिया से हाथ जोड़कर निवेदन है कि मीडिया हमें भारतीय ही बने रहने दे विदेशी सोच में ढलने की कोशिश  न करे .क्योंकि हम कितने सक्षम हैं ये हम तो जानते ही हैं मीडिया भी जान ले-
''जब जीरो दिया मेरे भारत ने ,दुनिया को तब गिनती आई ,
तारों की भाषा भारत ने दुनिया को पहले सिखलाई ,
देता न दशमलव भारत तो यूँ चाँद पे जाना मुश्किल था ,
धरती और चाँद की दूरी का अंदाजा लगाना मुश्किल था ,
सभ्यता जहाँ पहले आई पहले जनमी है जहाँ पे कला ,
अपना भारत वो भारत है जिसके पीछे संसार चला ,
संसार चला और आगे बढ़ा यूँ आगे बढ़ा बढ़ता ही गया ,

भगवान् करे ये और बढे ,बढ़ता ही रहे और फूले फले .''
इसलिए मीडिया आज के इस दिन माँ सरस्वती को पूजे न कि रोम की संस्कृति वेलेंटाइन को
''वक्त के रंग में यूँ न ढल जिंदगी ,
     अब तो अपना इरादा बदल जिंदगी ,
असलियत तेरी खो न जाये कहीं ,
   यूँ न कर दूसरों की नक़ल जिंदगी .


   आप सभी को वसंत पंचमी की बहुत बहुत शुभकामनायें .
       शालिनी कौशिक
              [कौशल ]
     

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

अफज़ल गुरु आतंकवादी था कश्मीरी या कोई और नहीं .....

अफज़ल गुरु आतंकवादी था कश्मीरी या कोई और नहीं .....

मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ,
मैं गद्दारों को धरती में जिंदा गड्वाने निकला हूँ ,
वो घाटी से खेल रहे हैं गैरों के बलबूते पर ,
जिनकी नाक टिकी रहती है पाकिस्तानी जूतों पर .''
वीर रस के प्रसिद्द कवि माननीय हरिओम पंवार जी की ये पंक्तियाँ  आज अफज़ल गुरु की फाँसी पर जो सियासत विपक्षी दलों द्वारा व् अफज़ल गुरु के समर्थकों द्वारा की जा रही है ,पर एकाएक मेरी डायरी की पन्नों से निकल आई और मेरे आगे बहुत से चेहरों की असलियत को सामने रख गयी .कश्मीर और कश्मीरी अलगाववादी भारत के लिए हमेशा से सिरदर्द रहे हैं .पाकिस्तान से बचने के लिए कश्मीर भारत से जुड़ तो गया किन्तु उसके एक विशेष वर्ग की तमन्ना पाकिस्तान ही रहा और उससे ही जुड़ने को वो जब तब भारत को ऐसे जख्म देने में व्यस्त रहा जिन जख्मों के घाव कभी भी सूखने की स्थिति ही नहीं आ पाती .इस जुडाव के फलस्वरूप कश्मीरी हिन्दुओं को अपने घर छोड़ छोड़कर भागना पड़ा और आज तक भी वे विस्थापित की जिंदगी जी रहे हैं और उसपर वे अलगाववादी आज़ादी के लिए संघर्ष रत हैं वो आज़ादी जो किसी गुलामी से नहीं अपितु अपने शरणदाता को तबाह कर हासिल करने की कोशिशें जारी हैं .ऐसी ही स्थिति के सम्बन्ध में कवि गोपाल दास ''नीरज'' जी कहते हैं -
 ''गीत जब मर जायेंगे फिर क्या यहाँ रह जायेगा ,
   एक सिसकता आसुंओं का कारवां रह जायेगा ,
    आग लेकर हाथ में पगले जलाता है किसे ,
   जब न ये बस्ती रहेगी तू कहाँ रह जायेगा .''

धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर भारतवासियों के लिए स्वर्गवास का कारण बनकर रह गया वहां का अलगाववाद इस कदर हावी हुआ कि भारतीय जनता निर्दोष होते हुए भी बलि का बकरा बनती रही .अपनी स्थिति के सही स्वरुप को न समझते हुए वहां के युवा का भटकाव इस कदर उसकी सनक बन गया कि वहां से अफज़ल गुरु नाम का एक युवा भारत के लोकतंत्र के प्रमुख स्तम्भ ''संसद ''पर ही हमले के  षड्यंत्र के लिए आगे बढ़ गया .१३ दिसंबर २०११ को साजिश के तहत जो हमला भारतीय संसद पर हुआ उसका मुख्या साजिश कर्ता ''अफज़ल गुरु '' था .इस हमले में संसद के ९ सुरक्षा कर्मियों को शहीद होना पड़ा .हमला करने वाले सभी आतंकी मारे गए किन्तु साजिश करने वाला अफज़ल गुरु अभी तक कहीं और सुरक्षित बैठा था किन्तु भारतीय दिमाग के सामने कब तक बचता ,पकड़ा गया और मौत की सजा के अधीन हुआ इसी क्रम में ९ फरवरी २०१३ को उसे तिहाड़ जेल में फाँसी पर लटका दिया गया और ये फाँसी पर जो लटका ये वह अपराधी था जिसने ऐसी गंभीर साजिश की थी कि यदि वह साजिश सफल हो जाती तो भारतीय लोकतंत्र की नैय्या ही डूब सकती थी इसीलिए  उसे जो सजा मिली वह भारतीय कानून के अनुसार अपराधी को मिली न कि किसी कश्मीरी या मराठी ,या उत्तर भारतीय या किसी दक्षिण भारतीय  को नहीं .
  किन्तु एक गलती यहाँ भारतीय सरकार से हो गयी और वह भी यूँ  कि यहाँ कानूनी प्रक्रिया के अनुसार ही कार्य करने की संस्कृति है यहाँ का सूत्र वाक्य है -''कि भले ही सौ गुनाहगार छूट जाएँ किन्तु एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए ''जबकि जो कार्य अफज़ल गुरु ने किया था वह इस सद्भाव का अधिकारी ही नहीं था उसका परिणाम तो वैसा ही होना चाहिए था जैसा आमतौर पर पुलिस द्वारा मुठभेड़ के मामलों में किया जाता है अफज़ल ने जो किया उसे उसका दंड भी मिलगया धरती के कानून के अनुसार  किन्तु उसने जिस जिसका घर उजाड़ा  उसका दंड तो .उसे ऊपरवाले  के कानून के अनुसार ही मिलेगा किन्तु सियासत को अपनी सियासी चालों का दंड कब मिलेगा और कौन देगा ये कुछ नहीं कहा जा सकता .सियासत की आँखें आज बिलकुल अंधी हो चुकी हैं उसे केवल अपना स्वार्थ दीखता है और कुछ नहीं किसी भी तरह हो सत्ता अपने हाथ में होनी चाहिए भले ही देश समुन्द्र में समां जाये या दुश्मन देश के अधीन हो जाये उसे इस बात से कोई मतलब नहीं .अफज़ल की पत्नी व् बच्चे का दर्द उन्हें दिख रहा है किन्तु जिन वीरों की जिंदगी अफज़ल ने छीन ली क्या वे धरती पर अकेले ही पैदा हुए थे ?क्या उनका कोई नहीं था? जिससे अफज़ल  ने उन्हें छीन लिया .इस तरफ क्यूं नहीं सोच पाते ये राजनीतिज्ञ और मानवाधिकारवादी ?ये वे ही लोग हैं ये वे ही लोग हैं जिनके बारे में एक शायर कह गए हैं -
''बस्ती जला के आये थे जो बेसहारा लोग ,
 नारे लगा रहे हैं वो अमनों अमान के .'

 और रही बात गोपनीय रूप से फाँसी देने की तो इसका जवाब सरकार पर दोषारोपण करने वालों ने स्वयं ही दे दिया है .जब तक नहीं दी गयी थी तब तक उसे डरपोक और जब दे दी गयी तब उसे क्रूर जैसे संज्ञाएँ देकर उन्होंने स्वयं ही सरकार के कार्य को सही साबित कर दिया है .देश में व्यवस्था बनाये  रखने के लिए और आम जनों की सुरक्षा के लिए सरकार को ऐसे कदम भी कभी कभी उठाने पड़ते हैं जिन्हें अगर हम खुली आँखों से देखें तो उनकी सराहनीय सोच को समझ सकते हैं .देश की सरकार हमारी चुनी हुई सरकार है और हमने ही स्वयं उसे ये अधिकार दिया है कि वह सही समय पर सही निर्णय ले और देश को विपत्तियों  से निबटने  के योग्य बनाये .अगर हम स्वयं ही अपनी सरकार पर भरोसा नहीं करेंगे तो हम किस पर भरोसा करेंगे .आज जो हाथ सरकार के साथ होना चाहिए वह हाथ हम कहीं और बढाकर अपने देश से ही गद्दारी  कर रहे हैं ऐसे में हमें यही समझ लेना चाहिए -
''महाफिज़ा के इशारे पे डूब जाते हैं ,
कई सफीने किनारे पे डूब जाते हैं ,
जिन्हें खुदा पे भरोसा नहीं हुआ करता
वो नाखुदा के इशारे पे डूब जाते हैं .''
     शालिनी कौशिक
           [कौशल ]

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

अफ़सोस ''शालिनी''को ये खत्म न ये हो पाते हैं .

अफ़सोस ''शालिनी''को ये खत्म न ये हो पाते हैं .


खत्म कर जिंदगी देखो मन ही मन मुस्कुराते हैं ,
मिली देह इंसान की इनको भेड़िये नज़र आते हैं .

तबाह कर बेगुनाहों को करें आबाद ये खुद को ,
फितरतन इंसानियत के ये रक़ीब बनते जाते हैं .

फराखी इनको न भाए ताज़िर  हैं ये दहशत के ,
मादूम ऐतबार को कर फ़ज़ीहत ये कर जाते हैं .

न मज़हब इनका है कोई ईमान दूर है इनसे ,
तबाही में मुरौवत की सुकून दिल में पाते हैं .

इरादे खौफनाक रखकर आमादा हैं ये शोरिश को ,
रन्जीदा कर जिंदगी को मसर्रत उसमे पाते हैं .

अज़ाब पैदा ये करते मचाते अफरातफरी ये ,
अफ़सोस ''शालिनी''को ये खत्म न ये हो पाते हैं .

शब्दार्थ :-फराखी -खुशहाली ,ताजिर-बिजनेसमैन ,
              मादूम-ख़त्म ,फ़ज़ीहत -दुर्दशा ,मुरौवत -मानवता ,
           शोरिश -खलबली ,रंजीदा -ग़मगीन ,मसर्रत-ख़ुशी ,
           अज़ाब -पीड़ा-परेशानी .

                             शालिनी कौशिक 
                                    [कौशल ]


शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करें कैग

 संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करें कैग    
Congress attacks CAG for criticising Govt in US Flag Foundation Of India
आज उथल-पुथल का दौर है ,जो जहाँ है वह वहीँ से इस कार्य में संलग्न है सरकार ने महंगाई से ,भ्रष्टाचार से देश व् देशवासियों के जीवन में उथल-पुथल मचा दी है ,तो विपक्ष ने कभी कटाक्षों के तीर चलाकर ,कभी राहों में कांटे बिछाकर सरकार की नींद हराम कर दी है कभी जनता लोकपाल मुद्दे पर तो कभी दामिनी मुद्दे पर हमारे लोकतंत्र को आईना दिखा रही है तो कभी मीडिया बाल की खाल निकालकर तो कभी गड़े मुर्दे उखाड़कर हमारे नेताओं की असलियत सामने ला रही है.इसी क्रम में अब आगे आये हैं कैग ''अर्थात नियंत्रक -महालेखा -परीक्षक श्री विनोद राय ,इनके कार्य पर कुछ भी कहने से पहले जानते हैं संविधान में कैग की स्थिति .
    कैग अर्थात नियंत्रक-महालेखा-परीक्षक की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद १४८ के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है .अनुच्छेद 149 में नियंत्रक-महालेखा-परीक्षक के कर्तव्य व् शक्तियां बताएं गए हैं
-अनुच्छेद १४९-नियंत्रक महालेखा परीक्षक उन कर्तव्यों का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो संसद निर्मित विधि के द्वारा या उसके अधीन विहित किये जाएँ .जब तक संसद ऐसी कोई विधि पारित नहीं कर देती है तब तक वह ऐसे कर्तव्यों का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो संविधान लागू होने के पूर्व भारत के महालेखा परीक्षक को प्राप्त थे .
    इस प्रकार उसके दो प्रमुख कर्तव्य हैं -प्रथम ,एकाउंटेंट के रूप में वह भारत की संचित निधि में से निकली जाने वाली सभी रकमों पर नियंत्रण रखता है ;और दूसरे,ऑडिटर के रूप में वह संघ और राज्यों के सभी खर्चों की लेख परीक्षा करता है .वह संघ और राज्य के लेखों को ऐसे प्रारूप में रखेगा जो राष्ट्रपति भारत के नियंत्रक-महालेखा-परीक्षक की राय के पश्चात् विहित करे .
     इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद १४९ के अनुसार कैग का कार्य एक तरह से भारत की संचित निधि के नियंत्रण व् सरकार के एकाउंटेंट का ही है ,ऐसे पद पर रहते हुए श्री विनोद राय कहते हैं -कि कैग महज लेखाकार के रूप में संसद में रिपोर्ट पेश करने तक अपनी भूमिका सीमित नहीं रख सकता ,उसने इस भरोसे से अपने लिए एक नया रास्ता अख्तियार किया हैकि अंततः वह जनता के प्रति जवाबदेह है .उसे जनता को जागरूक करने व् खासकर प्राथमिक शिक्षा ,पेयजल ,ग्रामीण स्वास्थ्य ,प्रदूषण ,पर्यावरण जैसे सामाजिक मुद्दों पर उसकी प्रतिक्रिया जानने का हक़ है .
   जनता के प्रति कैग विनोद राय जी की ये संवेदनशीलता सराहनीय व् आश्चर्यजनक है क्योंकि आमतौर पर ऐसे पदों पर बैठे अधिकारीगण जनता के साथ जिस तरह का व्यवहार करते हैं उसका वर्णन शब्दों में तो हो नहीं सकता .किन्तु यहाँ श्री विनोद राय जी से ये अपेक्षा नहीं की जाती कि वे जनता के प्रति इस तरह से अपनी जवाबदेही बनायें .यहाँ वे सरकारी सेवक है और अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदारी ही उनकी कर्तव्यनिष्ठा को जाहिर करती है और करेगी भी .संवैधानिक पदों पर आसीन विभूतियों की कुछ मर्यादाएं होती है और इस पर कार्य कर रहे अधिकारी को हमारे संविधान ने वे अधिकार और कर्तव्य नहीं दिए जिनका प्रयोग व् पालन वे कर रहे हैं .वे सरकार के द्वारा किये जाने वाले खर्चे जो भारत की संचित निधि पर भारित हैं ,पर नियंत्रण रख सकते हैं और इस तरह जनता के पैसे का सदुपयोग कर सकते हैं इसके साथ ही वे उन खर्चों से सम्बंधित रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत कर सरकार की मनमानी पर रोक लगा सकते हैं क्योंकि वहां जनता के लिए उपयोगी व् अनुपयोगी व्यय पर बहस के लिए सम्पूर्ण विपक्ष मौजूद है .वहां सरकार की जवाबदेही हमारे संविधान ने ही निश्चित की है और विपक्ष के कार्य को कैग द्वारा अपने हाथ में लेना विपक्ष के कार्य में अनाधिकार हस्तक्षेप ही कहा जायेगा .
    साथ ही ,इस सम्बन्ध में उनका ये कदम इसलिए भी अधिक निंदनीय हो गया है क्योंकि उन्होंने इस अभिव्यक्ति के लिए विदेशी भूमि अमेरिका और विदेशी मंच हार्वर्ड कैनेडी स्कूल को चुना.इस कारण वे ''घर के भेदी''की भूमिका में आ जाते हैं जिन्होंने किया तो सब कुछ अपने देश व् देशवासियों के हित के लिए था किन्तु जिनके कारण उनके देश व् देशवासियों को हार का मुहं देखना पड़ा .हमारे अंदरूनी हालातों का विदेश में जाकर एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का ये कदम मर्यादा का उल्लंघन है और उनकी संविधान के प्रति निष्ठा  की जो शपथ उन्होंने नियुक्ति के समय ली उसके प्रति संदेह की स्थिति उत्पन्न करता है .यदि उन्हें वास्तव में जनता के प्रति जवाबदेह होना है तो अरविन्द केजरीवाल की तरह अपने को ऐसी मर्यादाओं की रस्सी से [उनके इस कदम के कारण ये उनका इन मर्यादाओं के प्रति यही भाव प्रतीत होता है ]जिनमे उनकी आत्मा बंधा हुआ महसूस करती  है उससे उन्हें खुद को मुक्त कर लेना चाहिए और अरविन्द केजरीवाल के पद चिन्हों पर चलते हुए सरकार के उद्योगपतियों से ही नहीं ,माफियाओं से ,विपक्षी नेताओं से जिन जिन का भी खुलासा कर सकें ,दिलखोल कर करना चाहिए.
                शालिनी कौशिक
                      [कौशल ]

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

ये क्या कर रहे हैं दामिनी के पिता जी ?

ये क्या कर रहे हैं  दामिनी के पिता जी ?


दामिनी गैंगरेप कांड अब न्यायालय में  विचाराधीन है और न्यायालय अपनी प्रक्रिया के तहत इसके विचारण व् निर्णय में त्वरित कार्यवाही के लिए प्रयत्न शील हैं .१६ दिसंबर २०१२ की रात को बर्बरता की हदें लांघने वाला ये मामला जैसे ही जनता के संज्ञान में आया वैसे ही सोयी जनता एक ओर तो दामिनी के दर्द से कराह उठी और दूसरी ओर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की सुरक्षा के लिए व्याकुल हो उठी और चल पड़ी सोये व् अत्याचारी ,लापरवाह व् निरंकुश सरकार व् प्रशासन को जगाने .न केवल दिल्ली बल्कि सम्पूर्ण देश -पूरी दुनिया ने इस मामले का संज्ञान लिया और हिला कर रख दिया आज के राजनीतिज्ञों के रवैय्ये को जिसके परिणाम स्वरुप सरकार के बड़े बड़े चेहरे कभी जनता के बीच आकर, कभी दामिनी के घर जाकर हमदर्दों की सूची में जुड़ने की कोशिश करने लगे लेकिन जनता ने केवल उनको इस दुर्दांत घटना के लिए जिम्मेदार माना और उन्हें किसी  तरह का कोई स्थान अपनी भावनाओं के बीच नहीं लेने दिया .जो विरोध प्रदर्शन दामिनी के साथ हुई बर्बरता से आरम्भ हुए थे वे उसकी दुर्दांत मृत्यु के पश्चात् भी चलते रहे थे और चलते रहते यदि न्यायालय की कार्यवाही में उन्हें कोई भी लापरवाही का अंश दिखाई देता .जिस दिन से दामिनी गैंगरेप कांड हुआ उस दिन से तो देश भर की अदालतें ऐसे मामलों में अति सक्रिय हो गयी .और ऐसे अपराधों के त्वरित विचारण व् निबटारे के लिए प्रयत्नशील हो गयी .न्यायालयों की ऐसी कार्यवाही ने जनता में ये विश्वास उत्पन्न किया ''कि दामिनी को अवश्य न्याय मिलेगा.''
            किन्तु शायद ये विश्वास दामिनी के पिता को नहीं हो पाया और इसी का परिणाम है कि वे न्यायालयों से ज्यादा राजनीतिज्ञों में भरोसा कर रहे हैं .कभी वे  सोनिया गाँधी तो कभी राहुल गाँधी से मिलने  की इच्छा जताते हैं और वे क्या नहीं समझते कि ये जनता की उनसे हमदर्दी व् चुनाव २०१४ के निकट होने का ही परिणाम है कि ये दोनों उनके घर पहुँच जाते हैं .
          क्या वे नहीं समझ पाते हमारी राजनीति को जो आज फ़ोन नंबर दे व्यक्तिगत संपर्क में रहने की बात कह रहे हैं चुनाव पश्चात् सामने उपस्थित को भी पहचानने  में भी अनभिज्ञता जताते देर नहीं करेंगे .
       राजनीतिज्ञों द्वारा फ़्लैट दिए जाने को दामिनी का परिवार समस्या से निजात पाने के रूप में देख रहा है क्या अनभिज्ञ है इस बात से कि राजनीतिज्ञ ही वे शख्सियत होते हैं जो शहीदों के परिवार को आवंटित प्लॉट तक निगल जाते हैं और डकार तक नहीं लेते .  
   अभी ताज़ा घटना क्रम में दामिनी के पिता ने राष्ट्रपति जी से मुलाकात के लिए समय माँगा है क्या औचित्य है इस मुलाकात का ?अभी न तो दामिनी कांड के आरोपियों को मृत्यु दंड मिला है जो मिलने पर आरोपी राष्ट्रपति जी से क्षमादान की अपील कर सकते हैं और न ही राष्ट्रपति जी संविधान के अनुच्छेद ७२ के अंतर्गत उन्हें मिलने वाले मृत्यु दंड का क्षमादान ,प्रविलंबन ,विराम या परिहार ही कर रहे हैं और न ही हमारे यहाँ कार्यपालिका को न्यायपालिका को न्याय करने के सम्बन्ध में निर्देश देने की कोई शक्ति ही दी गयी है .
     राजनीतिज्ञों के प्रति जनता का वर्तमान रवैय्या कोई  एक दिन की उपज नहीं है यह धीरे धीरे हुए अनुभवों का परिणाम है जिसके कारण आज राजनीतिज्ञ अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं .ये तो वह ईद का चाँद भी नहीं जो साल भर में दिखाई देता है ये तो उस कड़कती बिजली के सामान हैं जो जब जब बादल रुपी चुनाव सिर पर आते हैं चमकना शुरू कर देती है .और फिर कहीं न कहीं गिरकर आग लगा देती है .ऐसे में दामिनी के पिता को चाहिए कि वे न्याय व्यवस्था पर यकीन करते हुए अपने घर को ऐसी बिजली से बचाएं जो केवल तबाह करना जानती है बिलकुल वैसे ही जैसे कारगिल शहीद संदीप उन्नीकृष्णन के माता पिता ने राजनीतिज्ञों के लिए अपने घर के दरवाजे बंद कर अपने घर को उनसे बचाया था .
     आज की स्थितियों में तो ये राजनीतिज्ञ उन्हें चुनाव लड़ दिल्ली के मुख्यमंत्री का पद तक प्रस्तावित कर सकते हैं किन्तु चुनाव पश्चात् इनके तरीके जैसे कि सभी जानते हैं ''रात गयी बात गयी ''की तरह ये उन्हें कहीं का भी नहीं छोड़ेंगे जैसे बीजेपी ने कानूनी मामले के कारण मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से उमा भारती जी  से इस्तीफा तो ले लिया किन्तु मामला समाप्त होने पर पहले तो उन्हें मुख्यमंत्री पद वापस नहीं किया और तो और बीजेपी छोड़ने को ही विवश कर दिया .
     अतः मेरा दामिनी के  पिता से यही अनुरोध है कि वे हमारी न्याय व्यवस्था पर विश्वास करें और इन राजनीतिज्ञों से दूरी बनाये रखें और इस प्रकार राजनीतिज्ञों से जुड़कर  दामिनी के संघर्ष को जो उसे वर्तमान व्यवस्था के पंगु होने के कारण करना पड़ा और जनता के विरोध प्रदर्शन ,जो उसे दामिनी को न्याय दिलाने व् सबकी सुरक्षा के लिए करने पड़े ,पर पानी न पड़ने दें .
                    शालिनी कौशिक
                         {कौशल }

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

राजनीतिक सोच :भुनाती दामिनी की मौत

राजनीतिक सोच :भुनाती दामिनी की मौत

''आस -पास ही देख रहा हूँ मिट्टी  का व्यापार ,
चुटकी भर मिट्टी की कीमत जहाँ करोड़ हज़ार
और सोचता हूँ आगे तो होता हूँ हैरान ,
बिका हुआ है  मिट्टी के ही हाथों इंसान .''
    कविवर गोपाल दास ''नीरज ''की ये पंक्तियाँ आज एकाएक याद आ गयी जैसे ही समाचार पत्रों में ये समाचार आँखों के सामने आया ''कि दामिनी के परिवार को मिलेगा दिल्ली में फ्लैट ''समाचार अपने शीर्षक में ही समेटे था आज के राजनीतिक दलों की सोच को जो इंसानी जज्बातों की कीमत लगा रही है .
     दामिनी के साथ १६ दिसंबर २०१२ को जो दरिंदगी हुई उसके बाद भड़के जनाक्रोश ने सत्तारूढ़ दल  की नींद तोड़ी और सरकार को इस सम्बन्ध में कठोर कदम उठाने को धकेला[जिस तरह से सो सो कर सरकारी  मशीनरी ने इस दरिंदगी को ध्यान में रख काम किया उसके लिए धकेला शब्द ही इस्तेमाल किया जायेगा क्योंकि जो इच्छा शक्ति और अपने कर्तव्य के लिए सरकारी मशीनरी के सही कदम थे वे कहीं पूर्व में उठते नहीं दिखाई दिए  थे ]इस दरिंदगी का एक प्रमुख कारण प्रशासनिक विफलता थी जो अगर न होती तो ऐसी दुर्दांत घटना को रोका  जा सकता था और जिस कदर इसके खिलाफ जनांदोलन हुए उससे ये तो साफ हो गया कि वर्तमान में सत्तारूढ़ सरकारों  पर इस दुर्दांत घटना का प्रभाव अवश्य पड़ेगा और फलस्वरूप आरम्भ हुआ वह दौर जो चुनाव २०१४ को देखते हुए कुछ अधिक तत्परता से उठाये जा रहे हैं .कभी रेल ,कभी अस्पताल दामिनी के नाम से संचालित किये जाने की बातें हो रही हैं तो कभी लाखों रुपयों से उसके परिवार की आर्थिक सहायता की जा रही है फिर अभी एक नया प्रस्ताव और सामने आ गया है जिसने दामिनी की पीड़ा को पैसे से दबाने के संकेत दिए हैं और वह है ''दामिनी के परिवार को द्वारिका में फ्लैट ''
इन सभी प्रस्तावों पर यदि हम गौर करें तो निम्न प्रश्न मस्तिषक में उपजते हैं -
१-क्या दामिनी का परिवार किसी दंगे का शिकार हुआ है ?
२-क्या ये कथित कल्पित दंगे उनका मकान विनिष्ट कर चुके हैं?
३-क्या दामिनी अपने परिवार की एकमात्र कमाऊ सदस्य थी ?
क्या इनमे से एक भी वजह हमारे राजनीतिक दल यहाँ पाते  हैं जो दामिनी के परिवार की ऐसी मदद कर उन्हें भ्रमित करना चाह रहे हैं .आज चुनावों की घडी समीप है और हमारे राजनीतिक दल ऐसे मुद्दों की खोज में रहते हैं जिसमे वे आम जनता की भावनाओं को भुना सकें और जिस तरह से दामिनी के साथ हुई दरिंदगी के खिलाफ पूरा देश उठ खड़ा हुआ उसे देखते हुए ये मुद्दा आज की ''टॉप लिस्ट ''में है .
   दामिनी के साथ हुई दरिंदगी पर देश का खड़ा होना एक तो उसके लिए न्याय की मांग करने के लिए और दूसरे  भविष्य में किसी अन्य को दामिनी न बनने देने के लिए था .जस्टिस जे.एस.वर्मा की रिपोर्ट के मद्देनज़र सरकार इस दिशा में कुछ सक्रिय हुई है किन्तु उसका प्रशासनिक अमला क्या कर रहा है क्या उस और भी कोई कड़ाई सरकारी मशीनरी ने दिखाई है शायद नहीं और इसकी ज़रुरत भी नहीं समझी गयी जबकि अगर लूट के शिकार व्यापारी की रिपोर्ट लिखी जाती और उस पर त्वरित कार्यवाही की जाती तो ये घटना होती ही नहीं ऐसे में उस मशीनरी के उस सूत्र वाक्य की विश्वसनीयता भी खो जाती है जो कहती है कि ''दिल्ली पुलिस आपके साथ ''कानून केवल बनाने से कुछ नहीं होता उसे लागू करने के लिए भी प्रतिबद्धता होनी चाहिए और ये देखना कानून बनाने वाली व् उसे लागू करने वाली कार्यपालिका का काम है .जो पूरी तरह से सत्तारूढ़ दल की ही होती है इसलिए उसकी जिम्मेदारी इस दिशा में कुछ ज्यादा बन जाती है और जब ये जिम्मेदारी सही तरह से निर्वाह नहीं की जाती तो उथल-पुथल मचना स्वाभाविक है .ऐसे में दामिनी के परिवार को जिस तरह की सहायता  देकर उन्हें और उनके हमदर्द भारतवासियों का ध्यान भटकाने  का प्रयास सत्तारूढ़ दल व् अन्य दलों द्वारा किये जा रहे हैं वे गैर ज़रूरी हैं ज़रूरी केवल दामिनी को न्याय व् आगे से ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना है .
   ये लुभावने प्रयास केवल एक रूप में ही स्वीकार किये जा सकते हैं कि सत्तारूढ़ दल अपने भविष्य को लेकर आशंकित है और ये आशंका सही भी कही जा सकती है क्योंकि ये सर्वदा सत्य है कि जब भी अन्याय -अत्याचार चरम पर पहुँच जाते हैं तो उनका अंत निश्चित  है .कविवर गोपाल दास ''नीरज''जी के ही शब्दों में मैं अपनी लेखनी को विराम दूँगी और अपने राजनीतिक दलों को चेतावनी भी -
 ''वक़्त को जिसने नहीं समझा उसे मिटना पड़ा है ,
  बच गया फूल से तो तलवार से कटना पड़ा है ,
  क्यों न कितनी ही बड़ी हो ,क्यों न कितनी ही कठिन हो ,
    हर नदी की राह से चट्टान को हटना पड़ा है ,
       उस सुबह से संधि कर लो ,
      हर किरण की मांग भर लो ,
है जगा इंसान तो मौसम बदलकर ही रहेगा ,
जल गया है दीप तो अंधियार ढलकर ही रहेगा .''
                  शालिनी कौशिक
                        [कौशल ]

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

बेटी न जन्म ले यहाँ कहना ही पड़ गया .


 

पैदा हुई है बेटी खबर माँ-बाप ने सुनी ,
खुशियों का बवंडर पल भर में थम गया .


चाहत थी बेटा आकर इस वंश को बढ़ाये ,
रखवाई का ही काम उल्टा सिर पे पड़ गया .

बेटा जने जो माता ये है पिता का पौरुष ,
बेटी जनम का पत्थर माँ के सिर पे बंध गया .


गर्मी चढ़ी थी आकर घर में सभी सिरों पर ,
बेडा गर्क ही जैसे उनके कुल का हो गया .

गर्दिश के दिन थे आये ऐसे उमड़-घुमड़ कर ,
बेटी का गर्द माँ को गर्दाबाद कर गया .

बेठी है मायके में ले बेटी को है रोटी ,
झेला जो माँ ने मुझको भी वो सहना पड़ गया .


न मायका है अपना ससुराल भी न अपनी ,
बेटी के भाग्य में प्रभु कांटे ही भर गया .

न करता कदर कोई ,न इच्छा है किसी की ,
बेटी का आना माँ को ही लो महंगा पड़ गया .

सदियाँ गुजर गयी हैं ज़माना बदल गया ,
बेटी का सुख रुढियों की बलि चढ़ गया .


 सच्चाई ये जहाँ की देखे है ''शालिनी ''
बेटी न जन्म ले यहाँ कहना ही पड़ गया .
      शालिनी कौशिक
           [कौशल]

शब्दार्थ-गर्दाबाद-उजाड़ ,विनाश



राजीव गांधी :अब केवल यादों में - शत शत नमन

एक  नमन  राजीव  जी  को  आज उनकी जयंती के अवसर  पर.राजीव जी बचपन से हमारे प्रिय नेता रहे आज भी याद है कि इंदिरा जी के निधन के समय हम सभी क...