गुरुवार, 31 जनवरी 2013

नसीब सभ्रवाल से प्रेरणा लें भारत से पलायन करने वाले



http://www.ourtripvideos.com/images/PicturesForBlog/2013/RepDayIndGbltMD12/Big/DSC_1210.jpg Republic Day Parade




 अभी अभी देश ने पूर्ण श्रृद्धा और उल्लास से अपना ६४ वां गणतंत्र दिवस मनाया और ये बात गौर करने लायक है कि ये श्रृद्धा और उल्लास जितना भारत में निवास करने वालों में था उससे कहीं अधिक विदेश में रह रहे भारतीयों में था [आखिरकार ये ही कहना पड़ेगा क्योंकि वैसे भी भारत में रह रहे लोग कुछ ज्यादा ही विदेश में रह रहे भारतीयों के आकर्षण में बंधें हैं ]इसलिए उनके द्वारा मनाया गया भारत का कोई भी पर्व धन्य माना जाना चाहिए और फिर ये तो है ही गर्व की बात कि वे आज भी भारतीय गणतंत्र से जुड़े हैं और इसके प्रति श्रृद्धा रखते हैं भले ही इसके लिए अपना जो योगदान उन्हें करना चाहिए उसे यहाँ की सरकार की,अर्थव्यवस्था की आर्थिक मदद द्वारा सहयोग कर अपने  इस देश के प्रति उसी प्रकार कर्तव्य की इति श्री कर लेते हैं जैसे हम सभी किसी आयोजन चाहे धार्मिक हो या सामाजिक ,पारिवारिक हो या वैवाहिक में अपने पास किसी वस्तु न होने की स्थिति में रूपये /पैसे दे उसकी आपूर्ति  मान लेते हैं .

       हम अगर अपने देश से प्रेम करते हैं और इसकी तरक्की के आकांक्षी हैं तो क्या ये सही है कि हम सभी तरह की योग्यता ग्रहण कर मात्र अधिक कमाई के फेर में अपने देश को छोड़ कर किसी और देश में जा बसें ?क्या देश को उन्नति पथ गामी बनाना  हमारा कर्तव्य नहीं है ? इस तरह के कई सवाल हमारे मन में कौंधते हैं किन्तु हम अपनी उन्नति को वरीयता दे इन सवालों को दरकिनार कर देते हैं किन्तु हर देश वासी ऐसा नहीं होता और इसलिए वह रत्न होता है और ऐसे ही एक रत्न हैं पानीपत [हरियाणा ] के नसीब सभ्रवाल .[अकी],आज केवल मैं कह रही हूँ कल आप भी कहेंगे   दैनिक जागरण के झंकार में ६ जनवरी को ''मेरी कहानी मेरा जागरण''शीर्षक के अंतर्गत नसीब सभ्रवाल की कहानी पढ़ी और मन कर गया कि इसे आप सभी से साझा करूँ ताकि जैसे मेरा सिर नसीब जी के देशप्रेम के आगे नत हो गया ऐसे ही अन्य देशवासियों का भी हो .
    नसीब जी बताते हैं कि बात उन दिनों की है जब वे मुंबई में क्राफ्ट इंस्ट्रक्टर का कोर्स कर रहे थे पढाई के दौरान उन्हें अपनी कक्षा के सभी छात्रों के साथ समुंद्री जहाज बनाने के प्रसिद्द सरकारी उपक्रम मंझगांव  डाकयार्ड   में  जाकर कुछ सीखने का अवसर प्राप्त हुआ वहां कार्यरत एक वरिष्ठ  इंजीनियर उनका मार्गदर्शन करते हुए कंपनी की प्रत्येक गतिविधि से अवगत करा रहे थे उन्होंने उन्हें बताया कि कंपनी में शिवालिक ,सह्याद्रि और सतपुड़ा नाम के तीन बड़े युद्धपोत बनाने का कार्य तेज़ी से चल रहा है इसके अतिरिक्त वहां कई पनडुब्बी बनाई जा रही थी .नसीब जी आगे कहते हैं ''जब वह वरिष्ठ इंजीनियर उस संस्थान की उपलब्धियों का बखान कर रहे थे ,तब मेरा ध्यान कहीं और था .दरअसल ,उस वक्त मेरा चयन दुबई की एक कंपनी में अच्छे पैकेज पर हो चुका था .वहां जाने के  लिए मेरा वीजा भी जल्दी मिलने वाला था,जिसको लेकर मैं खासा उत्साहित  था .मुझे कहीं और ध्यान मग्न देखकर कम्पनी के इंजीनियर और उस वक्त हमारे मार्गदर्शक ने मुझे बीच में ही टोक दिया .उनके टोकते ही मैं कल्पना लोक से सीधे यथार्थ  की ज़मीन पर आ गिरा .उन्होंने मुझ पर अपना गुस्सा निकलते हुए कहा ,''आपके लिए तो यह एक नाटक चल रहा होगा ?''नहीं सर आपको कुछ ग़लतफ़हमी हो गयी है .दोस्तों के सामने अपनी फजीहत से बचने के लिए नसीब जी ने घबराहट में जल्दी से अपना बचाव किया मगर वे कहते  हैं कि इससे उनके वे इंजीनियर साहब संतुष्ट नहीं हुए .वे समझ गए थे कि बात क्या है .वे फिर से उनपर बरस पड़े .उन्होंने उन नवनिर्मित जहाजों की ओर इशारा करते हुए कहा ,''बेटा ,इन्हें बनाने  में हमारे साथियों ने अपनी सारी उम्र लगा दी ,तब कहीं जाकर हम यहाँ तक पहुंचे हैं .बरसों पहले जब हम यहाँ आये थे ,उस वक्त भी दूसरे मुल्क हमें लाखों डालर के पैकेज देने के लिए तैयार थे ,परन्तु अपने देश के लिए हमने यहाँ कुछ हज़ार रुपये की पगार पर ही बरसों गुजार दिए .''बात करते करते उस प्रौढ़ उम्र के इंजीनियर की आँखों में मुझे इत्मिनान और आत्मविश्वास के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे .उन्होंने बताया कि''हमारे डाक्टर  ,वैज्ञानिक व् इंजीनियर भारत से बड़ी बड़ी डिग्रियां हासिल करके विदेश निकल जाते हैं .जीवन भर विदेश में काम करके भारत लौटते हैं तो कितनी आसानी से कह देते हैं -''भारत आज भी वैसा ही है जैसा बीस साल पहले था .इतने सालों में यहाँ कोई बदलाव नहीं आया .कोई तरक्की नहीं हुई ,जबकि हम यह कभी नहीं सोचते कि हमने देश के लिए क्या किया है ?''  
    इंजीनियर की बातों का नसीब जी के मस्तिष्क पर गहरा असर हो चला था .उन्होंने कहा ,''भारत आपसे और हमसे मिलकर ही बनता है .इसकी तरक्की के लिए भी एक एक आदमीं का सहयोग अपेक्षित है .दूसरे मुल्क हमारी प्रतिभाओं को ऊँची कीमत पर खरीद लेते हैं और उन्हीं के बूते वे तरक्की के पायदान चढ़ते जा रहे हैं ,जबकि हम उनसे पिछड़ जाते हैं .''उस प्रबुद्ध  इंजीनियर के निश्छल देश प्रेम ने नसीब जी के शब्दों में ''मुझे अन्दर तक झकझोर दिया था .''उन्हें लगा कि जब ये काम तनख्वाह पाकर भी देश के लिए इतना कुछ कर रहे हैं तो क्या मैं ....?उनकी बातें सुनकर नसीब जी की आत्मा ग्लानि से भर गयी और उनके अन्दर भी देश प्रेम की  भावना दम भरने लगी .
       ''मैंने उसी वक्त विदेश न जाने का  दृढ निश्चय कर लिया उस इंजीनियर की देश प्रेम से ओत-प्रोत बातों ने मेरे अन्दर भी देश के प्रति कर्तव्य बोध का जागरण कर दिया था .''ये कहते हुए देश प्रेम से गर्वित होते नसीब जी आज तक एक स्थानीय इंजीनियरिंग कॉलेज  में शिक्षक के पद पर कार्य कर रहे हैं और अपने देश के विकास में थोडा किन्तु महत्वपूर्ण योगदान दे उसकी तरक्की में भागीदार बन रहे हैं .
    ये थोडा ही सही किन्तु बहुत महत्वपूर्ण ही कहा जायेगा क्योंकि सभी जानते हैं कि ''बूँद बूँद से ही घड़ा भरता है ''और आज विकास की राह पर अग्रसर अपने भारत वर्ष की तरक्की में यदि हम सच्चे देश भक्त हैं तो हमें माखन लाल चतुर्वेदी जी की ''पुष्प की अभिलाषा ''को ही अपनी अभिलाषा बनाना होगा ताकि हमारा देश विश्व में सिरमौर के रूप में सुशोभित हो सके -
   ''चाह नहीं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं ,
      चाह नहीं प्रेमी माला में विन्ध नित प्यारी को ललचाऊँ ,
    चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरी डाला जाऊं ,
    चाह नहीं देवों के सिर पर चढूं ,भाग्य पर इठलाऊँ ,
मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर देना फैंक
मातृभूमि पर शीश चढाने
जिस पथ जाएँ वीर अनेक .''
नसीब जी के देश प्रेम की ये भावना समस्त भारतीयों  के नयनों का स्वप्न बन जाये और यहाँ से पलायन करने वाली प्रतिभाओं के पैर यहाँ जमा दे तो मेरा ये आलेख लिखने का उद्देश्य सफल हो जाये .नसीब जी को मेरा सादर प्रणाम .
   शालिनी कौशिक
     [कौशल ]
  

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

मानवाधिकार व् कानून :क्या अपराधियों के लिए ही बने हैं ?

मानवाधिकार व् कानून :क्या अपराधियों के लिए ही बने हैं ?
Updated on: Tue, 29 Jan 2013 02:28 PM (IST)
Delhi Gangrape Case : sixth accused in the case as minor as unfortunate, says father
।[दैनिक जागरण से साभार ]

 आज सारा विश्व मानवाधिकार की राह पर चल रहा है और समस्त विश्व का फौजदारी कानून सबूतों से अपराध साबित होने की राह पर ,भले ही जिन्हें मानव अधिकार दिए जा रहे हैं वे उन्हें पाने के अधिकारी हों या न हों ,भले ही वे सबूत कैसे भी जुटाएं जाएँ इस पर ध्यान देने की कोई ज़रुरत कहीं दिखाई ही नहीं दे रही .दोनों ही स्थितियों का फायदा जितना अपराध करने वाले उठा रहे हैं उतना कोई नहीं .कसाब को फांसी दी जाती है तो किसी को ये  याद नहीं रहता कि इस दरिन्दे ने किस दुर्दांत घटनाक्रम को अंजाम दिया था ?कितने लोगों को मौत के घाट उतारा था ?सभी की जुबान पर ''फांसी की जल्दबाजी ''ही सवाल बन जाती है और मानवीय अधिकार इस कदर हिलोरे मारते  हैं कि एक बरगी सरकार  का यह कार्य गैर कानूनी लगने लगता है .
   सबूत के सही होने पर हम सभी सवाल उठा सकते हैं और उन्हें स्वीकारने वाले कानून पर भी .अपराधी अपराध करता है और उसी समय अपने को कहीं और दिखा देता है और भारतीय कानून साक्ष्य अधिनयम की धारा ११ में अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक [plea  of  alibi ]में उसे साबित हो जाने पर सुसंगत मान लेता   है और अपराधी को  बा-इज्ज़त रिहा कर देता है .कहने का मतलब यह है कि किसी ने कोई अपराध किया और अपने को कहीं और दिखा दिया साधारण रूप में देखे तो यहाँ इन दोनों बातों का कोई मेल नहीं किन्तु सबूतों के रूप में ये एक साथ जुड़ जाते हैं क्योंकि जब कोई यह कहता है कि जब अपराध हुआ तब मैं अपराध किया जाने की जगह से इतनी डोर था कि मैं इस अपराध को कर ही नहीं सकता था तो इनका एक साथ मेल हो जाता है और साबित हो जाने पर कानून में उसे छूट मिल जाती है जबकि ये सबूत किस तरह जुटाया गया इस और ध्यान नहीं दिया जाता और सारी कानून व्यवस्था को इस तरह के बहुत से सबूत जुटा कर ध्वस्त कर दिया जाता है .शरीर पर सिक्के से घाव कर अपने को मेडिकल के जरिये घायल दिखाया जाता है .अधिकांश बड़े सफेदपोश अपराधियों द्वारा गिरफ़्तारी से बचने के लिए अस्पतालों की शरण ली जाती है और झूठे बीमारी  के प्रमाण  पत्र प्रस्तुत किया जाते हैं क्या ऐसे ही सबूतों को हमारी कानून व्यवस्था अपने निर्णय का आधार बनाती रहेगी?
     और अगर करें मानवाधिकारों की बात तो वे भी इन्ही के पक्ष में खड़े दिखते हैं दैनिक जागरण ने इतवार २६ जनवरी को जस्टिस जे.एस.वर्मा का साक्षात्कार प्रस्तुत किया जिसमे उनसे पूछा गया -
दुष्कर्मी को नपुंसक बनाने का कानून दुनिया में कई जगह लागू है और काफी हद तक सफल भी है तो फिर आपने प्रयोग के तौर पर इसे कानून में शामिल करना ज़रूरी क्यों नहीं समझा ?
जिसमे वे भी अपराधियों के मानवाधिकार के लिए काफी जागरूक हो कहते हैं-
   ''यह एक तरह की यातना है .इससे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन होता है .कानून किसी के अंग-भंग की इज़ाज़त  नहीं देता .'' 

     ऐसे सबूत और ऐसे मानवाधिकार, जो केवल अपराधियों के हित में ही हों [यही कहना पड़ता है क्योंकि अपराधी तो अपराध करते वक़्त नहीं देखता पीड़ित का मानवाधिकार ,जबकि कानून सजा देते वक़्त इस पहलू पर गौर अवश्य करता  है ,और सबूत वे भी अपराधी सृजित कर लेते हैं जबकि पीड़ित दुःख शोक में उन्हें नष्ट करने से जैसा कृत्य भी कर जाते हैं ]और इन पर अवलंब रखने वाली हमारी कानून व्यवस्था और विश्व व्यवस्था आज अविश्वास की और ही बढ़ रही हैं .
   दिल्ली गैंग रेप में नाबालिग करार दिए गए अपराधी के बारे में उसके हैड मास्टर के बयाँ को प्रमुखता दी गयी -''कि उसके पिता ने उसकी जन्म तिथि ४ जून १९९५ बताई थी .''स्कूलों के ये दस्तावेज कितने असली हैं इसके बारे में हम सभी जानते हैं .प्रवेश के लिए बहुत से स्कूल शपथ पत्र द्वारा जन्म तिथि की जानकारी मांगते हैं और कितने ही बच्चों के मता पिता से ये शपथ पत्र बनाते वक़्त जब  मैं उनकी जन्म तिथि पूछती हूँ तो वे कह देते हैं कि जो भी ठीक समझो आप लिख दो तब मैं कक्षा के अनुसार कितने ही बच्चों की जन्मतिथि १ जुलाई बना चुकी हूँ और वर्ष के तो कहने ही क्या अगर कश ६ में आ रहा है बच्चा तो ११ साल और अगर ९ में तो १४ पता नहीं कितने बच्चों की लिख चुकी हूँ बस एक सलाह उन्हें दे देती हूँ कि आगे से सभी जगह यही लिखी जाएगी .अब पढने के मामले में तो इस पर विश्वास करना ठीक है क्योंकि किसी की पढाई मात्र उम्र की अज्ञानता के कारण नहीं रोकी जनी चाहिए किन्तु  यदि वही बच्चा कोई अपराध करता है तो क्या ये प्रमाण पत्र विश्वास के योग्य माना जाना उचित है ?
   पूर्व थल सेनाध्यक्ष वी.के.सिंह जी का जन्मतिथि विवाद तो सभी जानते हैं .सैन्य सचिवालय दस्तावेजों में १० मई १९५० और उसकी एजुटेंट शाखा में १० मई १९५१ .मैट्रिक प्रमाण पत्र में दर्ज जन्म तिथि १० मई १९५१ थी जिसे रक्षा मंत्रालय ने ख़ारिज कर दिया और बाद में वी.के सिंह जी द्वारा भी अपनी याचिका वापस ले ली गयी .क्यों नहीं यहाँ उनकी प्रमाण पत्र की जन्म तिथि को सही माना गया ?
   इसी तरह से जन्मतिथि का विवाद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डॉ.ए.एस.आनंद का भी रहा .जन्मतिथि के बारे में इस तरह के विवाद जब तब सामने आते ही रहे हैं और रहेंगे क्योंकि ये दर्ज करने गए परिजन कितनी सही जन्मतिथि दर्ज करते हैं सभी जानते हैं .''बच्चा कहीं फेल होकर पीछे न रह जाये ''इए सोच से ग्रसित परिजन बच्चे की उम्र एक दो साल तो यूँ ही बढ़ा देते हैं .

     फिर कानून कानून में ही अंतर क्यों ?एक जगह कानून अपराधी के अपराध करने की परिपक्वता को आधार मानता है और एक जगह उसकी उम्र को देखता है .भारतीय दंड सहिंता के ]]साधारण अपवाद ''अध्याय में धारा ८३ में कानून कहता है कि सात वर्ष से ऊपर और १२ वर्ष से नीचे के बच्चे का कार्य अपराध नहीं है यदि वह अपने अपराध की प्रकृति व् परिणाम नहीं जानता इसका साफ मतलब ये है कि यदि वह इस उम्र के बीच का है और अपने अपराध की प्रकृति व् परिणाम जानता है तो वह अपराधी है जैसे कि एक ११ वर्ष का बच्चा चाकू लेके किसी के पीछे भागे और कहे कि मैं तुझे मार दूंगा और ये  कहते हुए चाकू मार दे  तो वह अपराधी है क्योंकि वह जानता है कि वह क्या कर रहा है और इसका क्या परिणाम होगा .
ऐसे में दिल्ली गैंग रेप के इस आरोपी को उसके स्कूल प्रमाण पत्र के आधार पर नाबालिग मानना कहाँ तक सही है ?सर्वप्रथम तो वह इस दया का अधिकारी ही नहीं है क्योंकि जो कृत्य उसने किया है उसमे कहीं भी नाबालिग की मासूमियत नहीं दिखती .दूसरे उसका प्रमाण पत्र सबूत के तौर पर ग्रहण करने योग्य नहीं है .और अंत में केवल यही कि ये बात कि हड्डी जाँच प्रक्रिया कठिन है उसे छूट का अधिकारी नहीं बनाती क्योंकि वह किसी मानवाधिकार का अधिकारी नहीं है .उसके मानवाधिकार को देखने से पहले हमारे कानून को ''दामिनी ''के मानवधिकार को देखना होगा जिसे इस दरिन्दे ने तार तार कर दिया और जिसकी व्यथित आत्मा उसके परिजनों के मुख से केवल और केवल न्याय की मांग कर रही है और  कह रही है '''उस हैवान को जिंदा जला दो'' यदि कानून इस और अपने ठीक कदम नहीं बढाता  तो यही कहना हम सब भारतीयों को पड़ेगा कि ''मानवाधिकार और कानून केवल अपराधियों के लिए ही बने हैं ''
     शालिनी कौशिक
         [कौशल]

   

रविवार, 27 जनवरी 2013

विवाहित स्त्री होना :दासी होने का परिचायक नहीं

 
आज जैसे जैसे महिला सशक्तिकरण की मांग जोर  पकड़ रही है वैसे ही एक धारणा और भी बलवती होती जा रही है वह यह कि विवाह करने से नारी गुलाम हो जाती है ,पति की दासी हो जाती है और इसका परिचायक है बहुत सी स्वावलंबी महिलाओं का विवाह से दूर रहना .मोहन भागवत जी द्वारा विवाह संस्कार को सौदा बताये जाने पर मेरे द्वारा आक्षेप किया गया तो मुझे भी यह कहा गया कि एक ओर तो मैं अधिवक्ता होते हुए महिला सशक्तिकरण की बातें  करती हूँ और दूसरी ओर विवाह को संस्कार बताये जाने की वकालत कर विरोधाभासी बातें करती हूँ जबकि मेरे अनुसार इसमें कोई विरोधाभास है ही नहीं .
    यदि हम सशक्तिकरण की परिभाषा में जाते हैं तो यही पाते हैं कि ''सशक्त वही है जो स्वयं के लिए क्या सही है ,क्या गलत है का निर्णय स्वयं कर सके और अपने निर्णय को अपने जीवन में कार्य रूप में परिणित कर सके ,फिर इसका विवाहित होने या न होने से कोई मतलब ही नहीं है .हमारे देश का इतिहास इस बात का साक्षी है कि हमारे यहाँ कि महिलाएं सशक्त भी रही हैं और विवाहित भी .उन्होंने जीवन में कर्मक्षेत्र न केवल अपने परिवार को माना बल्कि संसार के रणक्षेत्र में भी पदार्पण किया और अपनी योग्यता का लोहा मनवाया .
     मानव सृष्टि का आरंभ केवल पुरुष के ही कारण नहीं हुआ बल्कि शतरूपा के सहयोग से ही मनु ये कार्य संभव कर पाए .
   वीरांगना झलकारी बाई पहले किसी फ़ौज में नहीं थी .जंगल में रहने के कारण उन्होंने अपने पिता से घुड़सवारी व् अस्त्र -शस्त्र सञ्चालन की शिक्षा ली थी .उनकी शादी महारानी लक्ष्मीबाई  तोपखाने के वीर तोपची पूरण सिंह के साथ हो गयी और यदि स्त्री का विवाहित होना ही उसकी गुलामी का परिचायक मानें तो यहाँ से झलकारी की जिंदगी मात्र  किलकारी से बंधकर रह जानी थी किन्तु नहीं ,अपने पति के माध्यम से वे महारानी की महिला फौज में भर्ती  हो गयी और शीघ्र ही वे फौज के सभी कामों में विशेष योग्यता वाली हो गयी .झाँसी के किले को अंग्रेजों ने जब घेरा तब जनरल ह्यूरोज़ ने उसे तोपची के पास खड़े गोलियां चलाते देख लिया उस पर गोलियों की वर्षा की गयी .तोप का गोला पति के लगने पर झलकारी ने मोर्चा संभाला पर उसे भी गोला लगा और वह ''जय भवानी''कहती हुई शहीद हो गयी उसका बलिदान न केवल महारानी को बचने में सफल हुआ अपितु एक महिला के विवाहित होते हुए उसकी सशक्तता का अनूठा दृष्टान्त सम्पूर्ण विश्व के समक्ष रख गया .
          भारत कोकिला  ''सरोजनी नायडू''ने गोविन्द राजलू नायडू ''से विवाह किया और महात्मा गाँधी द्वारा चलाये गए १९३२ के नमक सत्याग्रह में भी भाग लिया .
        कस्तूरबा गाँधी महात्मा गाँधी जी की धर्मपत्नी भी थी और विवाह को एक संस्कार के रूप में निभाने वाली  होते हुए भी महिला सशक्तिकरण की पहचान भी .उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में महिलाओं में सत्याग्रह का शंख फूंका .
      प्रकाशवती पाल ,जिन्होंने २७ फरवरी १९३१ को चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद क्रांति संगठन की सूत्र अपने हाथ में लेकर काम किया १९३४ में दिल्ली में गिरफ्तार हुई .पहले विवाह से अरुचि रखने वाली व् देश सेवा की इच्छुक प्रकाशवती ने बरेली जेल में यशपाल से विवाह किया किन्तु इससे उनके जीवन के लक्ष्य में कोई बदलाव नहीं आया .यशपाल ने उन्हें क्रन्तिकारी बनाया और प्रकाशवती ने उन्हें एक महान लेखक .
      सुचेता कृपलानी आचार्य कृपलानी  की पत्नी थी और पहले स्वतंत्रता संग्राम से जुडी कर्तव्यनिष्ठ क्रांतिकारी और बाद में उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला मुख्यमंत्री .क्या यहाँ ये कहा जा सकता है कि विवाह ने कहीं भी उनके पैरों में बंधन डाले या नारी रूप में उन्हें कमजोर किया .
      प्रसिद्ध समाज सुधारक गोविन्द रानाडे की पत्नी रमाबाई रानाडे पति से पूर्ण सहयोग पाने वाली ,पूना में महिला सेवा सदन की स्थापक ,जिनकी राह में कई बार रोड़े पड़े लेकिन न तो उनके विवाह ने डाले और न पति ने डाले  बल्कि उस समय फ़ैली पर्दा  ,छुआछूत ,बाल विवाह जैसी कुरीतियों ने डाले और इन सबको जबरदस्त टक्कर देते हुए रमाबाई रानाडे ने स्त्री सशक्तिकरण की मिसाल कायम की .
        देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने फ़िरोज़ गाँधी से अंतरजातीय विवाह भी किया और दो पुत्रों राजीव व् संजय की माँ भी बनी और दिखा दिया भारत ही नहीं सारे विश्व को कि एक नव पल्लवित लोकतंत्र की कमान किस प्रकार कुशलता से संभालकर पाकिस्तान जैसे दुश्मनों के दांत खट्टे किये जाते हैं .क्या यहाँ विवाह को उनका कारागार कहा जा सकता है .पत्नी व् माँ होते हुए भी  बीबीसी की इंटरनेट न्यूज़ सर्विस द्वारा कराये गए एक ऑनलाइन  सर्वेक्षण में उन्हें ''सहस्त्राब्दी की महानतम महिला [woman of the millennium ]घोषित   किया गया .
      भारतीय सिनेमा की  प्रथम अभिनेत्री देविका रानी पहले प्रसिद्ध  निर्माता निर्देशक हिमांशु राय की पत्नी रही और बाद में विश्विख्यात रुसी चित्रकार स्वेतोस्लाव रोरिक की पत्नी बनी और उनके साथ कला ,संस्कृति तथा पेंटिंग के क्षेत्र में व्यस्त हो गयी कहीं कोई बंदिश नहीं कहीं कोई गुलामी की दशा नहीं दिखाई देती उनके जीवन में कर्णाटक चित्रकला को उभारने में दोनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा .१९६९ में सर्वप्रथम ''दादा साहेब फाल्के '' व् १९५८ में ''पद्मश्री ''महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय स्थान रखते हैं .
     ''बुंदेलों हरबोलों के मुहं हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ''कह राष्ट्रीय आन्दोलन में नवतेज भरने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान ''कर्मवीर'' के संपादक लक्ष्मण सिंह की विवाहिता थी किन्तु साथ ही सफल राष्ट्र सेविका ,कवियत्री ,सुगृहणी व् माँ थी .स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे मध्य प्रदेश विधान सभा की सदस्य भी रही .गुलाम  भारत  की इस राष्ट्र सेविका के जीवन में हमें तो  कहीं भी गुलामी की झलक नहीं मिलती जबकि जीवन में जो जो काम समाज ने, समाज के नियंताओं ने ,भगवान् ने वेद ,पुराण में लिखें हैं वे सब से जुडी थी . 
         बुकर पुरुस्कार प्राप्त करने वाली ,रैली फॉर द वैली  का नेतृत्त्व  कर नर्मदा बचाओ आन्दोलन को सशक्त करने वाली अरुंधती राय फ़िल्मकार प्रदीप कृष्ण से विवाहित हैं .
       पुलित्ज़र पुरुस्कार प्राप्त झुम्पा लाहिड़ी विदेशी पत्रिका के उपसंपादक अल्बर्टो वर्वालियास से विवाहित हैं और अपने जीवन को अपनी मर्जी व् अपनी शर्तों पर जीती हैं .
       वैजयन्ती माला ,सोनिया गाँधी ,सुषमा स्वराज ,शीला  दीक्षित  ,मेनका  गाँधी ,विजय राजे सिंधिया ,वनस्थली विद्या पीठ की संस्थापिका श्रीमती रतन शास्त्री ,क्रेन बेदी के नाम से मशहूर प्रथम महिला पुलिस अधिकारी किरण बेदी ,प्रसिद्ध समाज सेविका शालिनी ताई मोघे, प्रथम भारतीय महिला अन्तरिक्ष यात्री कल्पना चावला ,टैफे की निदेशक मल्लिका आदि आदि आदि बहुत से ऐसे नाम हैं  जो सशक्त हैं ,विवाहित हैं ,प्रेरणा हैं ,सद गृहस्थ हैं तब भी कहीं कोई बंधन नहीं ,कहीं कोई उलझन नहीं .
          अब यदि हम विवाह संस्कार की बात करते हैं तो उसकी सबसे महत्वपूर्ण रस्म है ''सप्तपदी ''जिसके  पूरे होते ही किसी दम्पति का विवाह सम्पूर्ण और पूरी तरह वैधानिक मान लिया जाता है .हिन्दू विवाह कानून के मुताबिक सप्तपदी या सात फेरे इसलिए भी ज़रूरी हैं ताकि दम्पति शादी की हर शर्त को अक्षरशः स्वीकार करें .ये इस प्रकार हैं -
 १- ॐ ईशा एकपदी भवः -हम यह पहला फेरा एक साथ लेते हुए वचन देते हैं कि हम हर काम में एक दूसरे  का ध्यान पूरे प्रेम ,समर्पण ,आदर ,सहयोग के साथ आजीवन करते रहेंगे .
  २- ॐ ऊर्जे द्विपदी भवः -इस दूसरे फेरे में हम यह निश्चय करते हैं कि हम दोनों साथ साथ आगे बढ़ेंगे .हम न केवल एक दूजे को स्वस्थ ,सुदृढ़ व् संतुलित रखने में सहयोग देंगे बल्कि मानसिक व् आत्मिक बल भी प्रदान करते हुए अपने परिवार और इस विश्व के कल्याण में अपनी उर्जा व्यय करेंगे .
 ३-ॐ रायस्पोशय  त्रिपदी भवः -तीसरा फेरा लेकर हम यह वचन देते हैं कि अपनी संपत्ति की रक्षा करते हुए सबके कल्याण के लिए समृद्धि का वातावरण बनायेंगें .हम अपने किसी काम में स्वार्थ नहीं आने देंगे ,बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानेंगें .
 4- ॐ मनोभ्याय चतुष्पदी  भवः -चौथे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि आजन्म एक दूजे के सहयोगी रहेंगे और खासतौर पर हम पति-पत्नी के बीच ख़ुशी और सामंजस्य बनाये रखेंगे .
 ५- ॐ प्रजाभ्यःपंचपदी भवः -पांचवे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि हम स्वस्थ ,दीर्घजीवी संतानों को जन्म  देंगे और इस तरह पालन-पोषण करेंगे ताकि ये परिवार ,समाज और राष्ट्र की अमूल्य धरोहर साबित हो .
 ६- ॐ रितुभ्य षष्ठपदी  भवः -इस छठे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि प्रत्येक उत्तरदायित्व साथ साथ पूरा करेंगे और एक दूसरे का साथ निभाते हुए सबके प्रति कर्तव्यों का निर्वाह करेंगे .
     ७-ॐ सखे सप्तपदी भवः -इस सातवें और अंतिम फेरे में हम वचन देते हैं कि हम आजीवन साथी और सहयोगी बनकर रहेंगे .
   इस प्रकार उपरोक्त ''सप्तपदी ''का ज्ञान विवाह संस्कार की वास्तविकता को हमारे ज्ञान चक्षु खोलने हेतु पर्याप्त है .
          इस प्रकार पति-पत्नी इस जीवन रुपी रथ के दो पहिये हैं जो साथ मिलकर चलें तो मंजिल तक अवश्य पहुँचते हैं और यदि इनमे से एक भी भारी पड़ जाये तो रथ चलता नहीं अपितु घिसटता है और ऐसे में जमीन पर गहरे निशान टूट फूट के रूप में दर्ज कर जाता है फिर  जब विवाहित होने पर पुरुष सशक्त हो सकता है तो नारी गुलाम कैसे ?बंधन यदि नारी के लिए पुरुष है तो पुरुष के लिए नारी मुक्ति पथ कैसे ?वह भी तो उसके लिए बंधन ही कही जाएगी .रामायण तो वैसे भी नारी को माया रूप में चित्रित  किया गया है और माया तो इस  सम्पूर्ण जगत वासियों के लिए बंधन है .
        वास्तव में दोनों एक दूसरे के लिए प्रेरणा हैं ,एक राह के हमसफ़र हैं और दुःख सुख के साथी हैं .रत्नावली ने तुलसीदास को
     ''अस्थि चर्ममय देह मम तामे ऐसी प्रीति,
           ऐसी जो श्री राम में होत न तो भव भीति . ''
       कह प्रभु श्री राम से ऐसा जोड़ा कि उन्हें विश्विख्यात कर दिया वैसे ही भारत की प्रथम महिला चिकित्सक कादम्बिनी गांगुली जो कि विवाह के समय निरक्षर थी को उनके पति ने पढ़ा लिखा कर देश समाज से वैर विरोध झेल कर विदेश भेज और भारत की प्रथम महिला चिकित्सक के रूप में प्रतिष्ठित किया .

    इसलिए हम सभी यह कह सकते हैं कि सशक्तिकरण को मुद्दा बना कर नारी को कोई भटका नहीं सकता .अपनी मर्जी से अपनी शर्तों पर जीना सशक्त होना है और विवाह इसमें कोई बाधा नहीं है बाधा है केवल वह सोच जो कभी नारी के तो कभी पुरुष के पांव में बेडी बन जाती है .
              इस धरती पर हर व्यक्ति भले ही वह पुरुष हो या नारी बहुत से रिश्तों से जुड़ा है वह उस रूप में कहीं भी नहीं होता जिसे आवारगी की स्थिति कहा जाता है और कोई उस स्थिति को चाहता भी नहीं है और ऐसे में सहयोग व् अनुशासन की स्थिति तो होती है सही और बाकी सभी स्थितियां काल्पनिक बंधन कहे जाते हैं और वे पतन की ओर ही धकेलते हैं .अन्य सब रिश्तों पर यूँ ही उँगलियाँ नहीं उठती क्योंकि वे जन्म से ही जुड़े होते हैं और क्योंकि ये विवाह का नाता ही ऐसा है जिस हम  स्वयं जोड़ते हैं इसमें हमारी समझ बूझ ही विवादों  को जन्म देती है और इसमें गलतफहमियां इकट्ठी कर देती है .इस रिश्ते के साथ यदि हम सही निर्णय व् समझ बूझ से काम लें तो ये जीवन में कांटे नहीं बोता अपितु जीवन जीना आसान बना देता है .यह पति पत्नी के आपसी सहयोग व् समझ बूझ को बढ़ा एक और एक ग्यारह की हिम्मत लाता  है और उन्हें एक राह का राही बना मंजिल तक पहुंचाता है .
  और फिर अगर एक स्थिति ये है
 Man beating woman,silhouette photo
तो एक स्थिति ये भी  तो है 
 
             
                    शालिनी कौशिक
                             [कौशल]





शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

फहराऊं बुलंदी पे ये ख्वाहिश नहीं रही .


फ़िरदौस इस वतन में फ़रहत नहीं रही ,
पुरवाई मुहब्बत की यहाँ अब नहीं रही .

Flag Foundation Of IndiaFlag Foundation Of India

नारी का जिस्म रौंद रहे जानवर बनकर ,
हैवानियत में कोई कमी अब नहीं रही .

 stock photo : Dramatic portrait of a young woman crying and covering her eyes on a black background with space for textstock photo : Closeup of crying woman with tears

 फरियाद करे औरत जीने दो मुझे भी ,
इलहाम रुनुमाई को हासिल नहीं रही .


Forgiveness : Young and beautiful girl praying   Stock PhotoForgiveness : Young woman in prayer position Stock Photo
अंग्रेज गए बाँट इन्हें जात-धरम में ,
इनमे भी अब मज़हबी मिल्लत नहीं रही .

 
 फरेब ओढ़ बैठा नाजिम ही इस ज़मीं पर ,
फुलवारी भी इतबार के काबिल नहीं रही .

 
 लाये थे इन्कलाब कर गणतंत्र यहाँ पर ,
हाथों में जनता के कभी सत्ता नहीं रही .

 Women participate in a candlelight vigil to show solidarity with a rape victim at India Gate in New Delhi December 21, 2012. REUTERS/Adnan Abidi
  वोटों में बैठे आंक रहे आदमी को वे ,
खुदगर्जी में कुछ करने की हिम्मत नहीं रही .

 
  इल्ज़ाम लगाते रहे ये हुक्मरान पर ,
अवाम अपने फ़र्ज़ की खाहाँ नहीं रही .  

Indian protesters hold placards

फसाद को उकसा रहे हैं रहनुमा यहाँ ,
ये थामे मेरी डोर अब हसरत नहीं रही .

 

खुशहाली ,प्यार,अमन बांटा फहर-फहर कर ,
भारत की नस्लों को ये ज़रुरत नहीं रही . 


Click to see larger imagesIndian Flag Wallpapers
गणतंत्र फ़साना बना हे ! हिन्दवासियों ,
जलसे से जुदा हाकिमी कीमत नहीं रही .

 
Video : India celebrates 63rd Republic Day

तिरंगा कहे ''शालिनी'' से फफक-फफक कर ,
फहराऊं बुलंदी पे ये ख्वाहिश नहीं रही .

 

शब्द अर्थ -फ़िरदौस-स्वर्ग ,पुरवाई-पूरब की ओर से आने वाली हवा ,इलहाम -देववाणी ,ईश्वरीय प्रेरणा ,रुनुमाई-मुहं दिखाई ,इन्कलाब -क्रांति ,खाहाँ -चाहने वाला ,मिल्लत-मेलजोल ,हाकिमी -शासन सम्बन्धी ,फ़साना -कल्पित साहित्यिक रचना ,इतबार-विश्वास ,नाजिम-प्रबंधकर्ता ,मंत्री ,फुलवारी-बाल बच्चे ,
        शालिनी कौशिक
            [कौशल]









सोमवार, 21 जनवरी 2013

करें अभिनन्दन आगे बढ़कर जब वह समक्ष उपस्थित हो .

 Can Rahul's emotional pitch for change turn the tide for Cong?BJP recalls Rajiv Gandhi's speech as inspiring, dismisses Rahul's

भावनाएं वे क्या समझेंगे जिनकी आत्मा कलुषित हो ,
अटकल-पच्चू  अनुमानों से मन जिनका प्रदूषित हो .

सौंपा था ये देश स्वयं ही हमने हाथ फिरंगी के ,
दिल पर रखकर हाथ कहो कुछ जब ये बात अनुचित हो .

डाल गले में स्वयं गुलामी आज़ादी खुद हासिल की ,
तोल रहे एक तुला में सबको क्यूं तुम इतने कुंठित हो .

देश चला  है प्रगति पथ पर इसमें मेहनत है किसकी ,
दे सकता रफ़्तार वही है जिसमे ये काबिलियत हो .

अपने दल भी नहीं संभलते  कहते देश संभालेंगें ,
क्यूं हो ऐसी बात में फंसते जो मिथ्या प्रचारित हो .

आँखों से आंसू बहने की हंसी उड़ाई जाती है ,
जज्बातों को आग लगाने को ही क्या एकत्रित हो .

गलती भूलों  से जब होती माफ़ी भी मिल जाती है ,
भावुकतावश हुई त्रुटि पर क्यूं इनपर आवेशित हो .

पद लोलुपता नहीं है जिसमे त्याग की पावन मूरत हो ,
क्यूं न सब उसको अपनालो जो अपने आप समर्पित हो .

बढें कदम जो देश में अपने करने को कल्याण सभी का ,
करें अभिनन्दन आगे बढ़कर जब वह समक्ष उपस्थित हो .

हाथ करें मजबूत उन्ही के जिनके हाथ हमारे साथ ,
करे ''शालिनी ''प्रेरित सबको आओ हम संयोजित हों .
          शालिनी कौशिक 
           [कौशल ]

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

कलम आज भी उन्हीं की जय बोलेगी ......

कलम आज भी उन्हीं की जय बोलेगी ......
आर.एन.गौड़ ने कहा है -
   ''जिस देश में घर घर सैनिक हों,जिसके देशज बलिदानी हों.
     वह देश स्वर्ग है ,जिसे देख ,अरि  के मस्तक झुक जाते हों .''
News Photo: Martyr Hemraj Singhs wife Dharmwati and his mother…Army Chief may meet slain soldier's family
सही कहा है उन्होंने ,भारत देश का इतिहास ऐसे बलिदानों से भरा पड़ा है .यहाँ के वीर और उनके परिवार देश के लिए की गयी शहादत  पर गर्व महसूस करते हैं .माताएं ,पत्नियाँ और बहने स्वयं अपने बेटों ,पतियों व् भाइयों के मस्तक पर टीका लगाकर रणक्षेत्र में देश पर मार मिटने के लिए भेजती रही हैं और आगे भी जब भी देश मदद के लिए पुकारेगा तो वे यह ही करेंगीं किन्तु वर्तमान में भावनाओं की नदी ने एक माँ व् एक पत्नी को इस कदर व्याकुल कर दिया कि वे देश से अपने बेटे और पति की शहादत की कीमत [शहीद हेमराज का सिर]वसूलने को ही आगे आ अनशन पर बैठ गयी उस अनशन पर जिसका आरम्भ महात्मा गाँधी जी द्वारा देश के दुश्मनों अंग्रेजों के जुल्मों का सामना करने के लिए किया गया था और जिससे वे अपनी न्यायोचित मांगे ही मनवाते थे . 
         हेमराज की शहादत ने जहाँ शेरनगर [मथुरा ]उत्तर प्रदेश का सिर  गर्व  से ऊँचा किया वहीँ हेमराज की पत्नी व् माँ ने हेमराज का सिर वापस कए जाने की मांग कर सरकार व् सेना पर इतना अनुचित दबाव डाला कि आखिर उन्हें समझाने के लिए सेनाध्यक्ष को स्वयं वहीँ आना पड़ा .ये कोई अच्छी शुरुआत नहीं है .सेनाध्यक्ष की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है और इस तरह से यदि वे शहीदों के घर घर जाकर उनके परिवारों को ही सँभालते रहेंगे तो देश की सीमाओं को कौन संभालेगा?
   यूँ तो ये भी कहा जा सकता है कि सीमाओं की सुरक्षा के लिए वहां सेनाएं तैनात हैं किन्तु ये सोचने की बात है कि नेतृत्त्व विहीन स्थिति अराजकता की स्थिति होती है और जिस पर पहले ही देश के दुश्मनों से जूझने का दबाव हो उसपर अन्य कोई दबाव डालना कहाँ तक सही है ?
    साथ ही वहां आने पर सेनाध्यक्ष को मीडिया के उलटे सीधे  सवालों  के जवाब देने को भी बाध्य होना पड़ा .सेना अपनी कार्यप्रणाली के लिए सरकार के प्रति जवाबदेह है न कि मीडिया के प्रति ,और आज तक कभी भी शायद किसी भी सेनाध्यक्ष को इस तरह जनता के बीच आकर सेना के बारे में नहीं बताना पड़ा .ये सेना का आतंरिक मामला है कि वे देश के दुश्मनों से कैसे निबटती हैं और उनके प्रति क्या दृष्टिकोण रखती हैं और अपनी ये योग्यतायें सेना बहुत से युद्धों में दुश्मनों को हराकर साबित कर चुकी है .
     इसलिए शहीद हेमराज के परिवारीजनों द्वारा उनका सिर लाये जाने के लिए दबाव बनाया जाना भारत जैसे देश में यदि अंतिम बार ही किया गया हो तभी सही है क्योंकि हम नहीं समझते कि अपने परिवारीजनों का ये कदम स्वर्ग में बैठे शहीद की आत्मा तक को भी स्वीकार्य होगा ,क्योंकि कोई भी वीर ऐसी शहादत पर अपने सिर की कीमत में दुश्मनों की किसी भी मांग को तरजीह नहीं देना चाहेगा जिसके फेर में सरकार ऐसी अनुचित मांग को पूरा करवाने की जद्दोजहद में फंस सकती है बल्कि ऐसे में तो हम ही क्या देश का प्रत्येक वीर यही कहेगा कि एक ही क्यों हम अरबों हैं ,काटो कितने सिर काटोगे ,आखिर सजाओगे तो अपने मुल्क  में ही ले जाकर.ऐसे में हम तो रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में ही अपनी बात शहीदों के परिजनों तक पहुँचाना चाहेंगे-
  ''जो चढ़ गए पुण्य वेदी पर
          लिए बिना गर्दन का मोल
              कलम आज उनकी जय बोल .''
                     शालिनी कौशिक
                           [कौशल ]

बुधवार, 16 जनवरी 2013

दामिनी की मूक शहादत :



दामिनी की मूक शहादत

image photo : Indaian  punjabi village girlimage photo : Indian Village Life
जुर्म मेरा जहाँ में इतना बन नारी मैं जन्म पा गयी ,
जुर्रत पर मेरी इतनी सी जुल्मी दुनिया ज़ब्र पे आ गयी .

जब्रन मुझपर हुक्म चलकर जहाँगीर ये बनते फिरते ,
जांनिसार ये फितरत मेरी जानशीन इन्हें बना गयी .

जूरी बनकर करे ज़ोरडम घर की मुझे जीनत बतलाएं ,
जेबी बनाकर जादूगरी ये जौहर मुझसे खूब करा गयी .

जिस्म से जिससे जिनगी पाते जिनाकार उसके बन जाएँ ,
इनकी जनावर करतूतें ही ज़हरी बनकर मुझे खा गयी .

जांबाजी है वहीँ पे जायज़ जाहिली न समझी जाये ,
जाहिर इनकी जुल्मी हरकतें ज्वालामुखी हैं मुझे बना गयी .

बहुत सहा है नहीं सहूँगी ,ज़ोर जुल्म न झेलूंगी ,
दामिनी की मूक शहादत ''शालिनी''को राह दिखा गयी .
दैनिक  जनवाणी में प्रकाशित 
                                          

शब्दार्थ  :-जुर्म -अपराध ,जुर्रत-साहस  ,ज़ब्र -जुल्म ,जब्रन-जबरदस्ती से ,जर्दम-तानाशाही ,जीनत-शोभा ,जिनाकार-परस्त्री गमन करने वाला ,जानवर-जानवर ,जाहिली -मुर्खता ,जेबी-जेब में रखने लायक ,जूरी -पंचों का मंडल ,जहाँगीर-विश्व विजयी, जानशीन-अधिकारी की अनुपस्थिति में उसके पद पर बैठने वाला व्यक्ति .
       शालिनी कौशिक [एडवोकेट]
            [कौशल]

रविवार, 13 जनवरी 2013

''ऐसी पढ़ी लिखी से तो लड़कियां अनपढ़ ही अच्छी .''

ऐसी पढ़ी लिखी से तो अनपढ़ ही अच्छी लड़कियां 

दैनिक जागरण के 13 जनवरी 2013 के''झंकार ''में दुर्गेश सिंह के साथ चित्रांगदा सिंह की बातचीत के अंश पढ़े , तरस आ गया चित्रांगदा की सोच पर ,जो कहती हैं -
 Chitrangada Singh WallpaperChitrangada Singh
   ''  मुझे कुछ दिनों पहले ही एक प्रैस कांफ्रेंस में एक वरिष्ठ महिला पत्रकार मिली ,उन्होंने मुझसे कहा कि अपनी इस हालत के लिए महिलाएं ही जिम्मेदार हैं ,कौन कहता है उनसे छोटे कपडे पहनने के लिए ?मैं दंग रह गयी इतनी पढ़ी लिखी महिला की यह दलील सुनकर ...........''
    दंग तो चित्रांगदा आपको ही नहीं सभी को होना होगा ये सोचकर कि क्या पढ़े लिखे होने का मतलब ये है कि शरीर को वस्त्र विहीन कर लिया जाये ?सदियों पहले मानव सभ्यता की शुरुआत में जैसे जैसे खोजकर कपड़ों  का निर्माण आरम्भ हुआ और मानव ने अपने तन को वस्त्र से ढंकना आरम्भ किया नहीं तो उससे पहले तो मनुष्य नंगा ही घूमता था देखिये ऐसे -
 
और आज की लड़कियां अपने तन की नुमाइश कर आदि काल की  ओर खिसकती जा रही हैं और समझ रही हैं खुद की अक्ल से खुद को आधुनिक .सही कपडे पहनकर कॉलिज आने वाली छात्राओं की हंसी स्वयं कपड़ों के लिए तरसती लड़कियों द्वारा उड़ाई जाती है और ''बहनजी''
 
   कहकर उन्हें अपनी तरह बनाने का प्रयास किया जाता है .
    यही नहीं लड़कियों में एक और प्रवर्ति भी है जो आज उनके  शोषण के लिए जिम्मेदार कही जाएगी वह है ''उनका नकलची बन्दर होना ''

 Monkey : Monkey in deep thought.
 आज आधुनिक कहलाने की होड़ में लड़कियां अपने परंपरागत शोभनीय वस्त्रों का त्याग कर चुकी हैं और वे कपडे जो स्वयं लड़कों पर भी नहीं सुहाते उन्हें तक पहनने में संकोच नहीं कर रही हैं .लड़कों में आजकल ''हाफ पेंट ''का चलन है और इसे बहुत ही आधुनिक वेशभूषा के रूप में वे अपना रहे हैं यहाँ तक की जो कल  तक धोती कुर्ते में गर्मी काट  देते थे वे भी आज हाफ पेंट व् टी शर्ट में सड़कों को व् बहुत से अन्य सार्वजानिक स्थलों को बिगाड़ रहे हैं ये वेशभूषा जहाँ तक सही रूप  में देखा जाये तो घर में काम करते  समय नीचे कपड़ों के ख़राब होने की स्थिति में धारण करने की है या फिर कामगार मजदूर ही इस वेशभूषा को काम के लिए अपनाते  हैं किन्तु  लड़के  इससे  आधुनिक बन  ही रहे हैं किन्तु  चलिए  वे तो अपने ही कपडे पहन रहे हैं किन्तु  ये लड़कियां पागल हो रही हैं मॉडर्न बनने के लिए ये भी इसे पहन सड़कों का माहौल बिगाड़ रही हैं .सलवार सूट की जगह जींस शर्ट ने ले ली है .स्कर्ट की जगह हाफ पेंट ने .कोई इन्हें  समझाए भी तो कैसे कि जब लड़के लड़कियों के कपडे सलवार सूट साड़ी पहनने को आकर्षित नहीं होते तो लड़कियां क्यों उनके कपड़ों को पहन गर्वित महसूस करती हैं ये तो वही बात हुई कि हम भारतीय अपनी भाषा हिंदी  को तो गंवारू ,पिछड़ी कहते हैं और गुलामी करते हैं अंग्रेजी की .
        ये हमारे यहाँ कि एक प्रसिद्ध  लोकाक्ति है -
       ''खाओ मन भाया ,पहनो जग भाया.''

 और ये बात सही भी है .आज लड़कियां लड़का बनने की कोशिश में लगी हैं क्या कपडे ही लड़की को लड़का बनायेंगी ?लड़कियों को लड़का बनने की ज़रूरत ही क्या है वे लड़की रहकर भी सब कुछ करने में सक्षम हैं 
 
.कपडे कम करने से वे आधुनिक नहीं हो जाएँगी अपितु यदि उन्हें आधुनिक होना है तो ये होड़ छोडनी होगी लड़का बनने की कोशिश ही उनके दिमाग को दिवालिया बना रही है .
   कपडे शरीर की शोभा होते हैं .तुलसीदास भी कह गए हैं -
    ''वसन हीन नहीं सोह सुरारी ,
      सब भूषण भूषण बर नारी .''
मानव शरीर नग्न यदि सुन्दर लगा करता तो सभ्यता के विकास के साथ मानव वस्त्र कभी भी धारण नहीं करता और यदि पढ़े लिखे होने का मतलब शरीर से वस्त्र कम करना या सोच को नग्न करना है तो ये ही कहना होगा कि -
  ''ऐसी पढ़ी लिखी से तो लड़कियां अनपढ़ ही अच्छी .''
        शालिनी कौशिक
           [कौशल ]



बुधवार, 9 जनवरी 2013

भारत सदा ही दुश्मनों पे हावी रहेगा .


File:Flag of the Indian Army.svg
गूगल से साभार    

कितनी ही करो जुर्रतें ये कौल रहेगा ,
भाई का दिल भाई से ही जुड़ा रहेगा .


कितने ही मौके आये देखी हैं आफतें ,
फिर भी दिलों में अपने ये मल्हार रहेगा .

खाएं हैं धोखे तुमसे हमने कदम-कदम पर ,
सुधरोगे एक दिन कभी विश्वास रहेगा .

हमले किये हैं बार-बार पलट-पलटकर ,
मानोगे हार सिर यहाँ झुककर ही रहेगा .


तोड़ी हैं हिम्मतें तेरी वीरों ने हमारे ,
कटवाने को सिर कारवां बढ़ता ही रहेगा .
   Body of the soldier who was killed

अरबों की बात लेखनी से कहती ''शालिनी '',
भारत सदा ही दुश्मनों पे हावी रहेगा .

 
  

           शालिनी कौशिक 
                 [कौशल ]

मोहन -मो/संस्कार -सौदा /.क्या एक कहे जा सकते हैं भागवत जी?


    Marriage is a social contract : mohan bhagwat
इंदौर [जागरण न्यूज नेटवर्क]। हाल ही में दुष्कर्म की घटनाओं पर विवादास्पद बयान देकर आलोचना का शिकार हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक और विवादित बयान दिया है। इस बार उन्होंने कहा कि शादी एक कान्ट्रैक्ट यानी सौदा है और इस सौदे के तहत एक महिला पति की देखभाल के लिए बंधी है। उनके इस बयान पर भी लोगों की तीखी प्रक्रिया सामने आई है।
भागवत ने इंदौर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की रैली के दौरान कहा, 'वैवाहिक संस्कार के तहत महिला और पुरुष एक सौदे से बंधे हैं, जिसके तहत पुरुष कहता है कि तुम्हें मेरे घर की देखभाल करनी चाहिए और तुम्हारी जरूरतों का ध्यान रखूंगा। इसलिए जब तक महिला इस कान्ट्रैक्ट को निभाती है, पुरुष को भी निभाना चाहिए। जब वह इसका उल्लंघन करे तो पुरुष उसे बेदखल कर सकता है। यदि पुरुष इस सौदे का उल्लंघन करता है तो महिला को भी इसे तोड़ देना चाहिए। सब कुछ कान्ट्रैक्ट पर आधारित है।'
भागवत के मुताबिक, सफल वैवाहिक जीवन के लिए महिला का पत्नी बनकर घर पर रहना और पुरुष का उपार्जन के लिए बाहर निकलने के नियम का पालन किया जाना चाहिए। महिला और पुरुष में एक दूसरे का ख्याल रखने का कांट्रैक्ट होता है। अगर महिला इसका उल्लंघन करती है तो उसे बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिए।''

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@मोहन भागवत जी-अब और बंटवारा नहीं .

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Hindu_wedding : CHENNAI, INDIA - AUGUST 29: Indian (Tamil) Traditional Wedding Ceremony on August 29, 2010 in Chennai, Tamil Nadu, India Stock Photo

  
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Hindu_wedding : Happy indian adult people couple
ये है भारतीय विवाह का सुखद स्वरुप 

                     शालिनी कौशिक 
                        ^ कौशल *
                      

शनिवार, 5 जनवरी 2013

@मोहन भागवत जी-अब और बंटवारा नहीं .


Is crime against women an issue of 'Bharat' versus 'India'?

'' बंटवारे की राजनीति ने देश अपाहिज बना दिया ,
    जो अंग्रेज नहीं कर पाए वो हमने करके दिखा दिया -अज्ञात ''

 भारत वर्ष एक ऐसा देश जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और ये तो भारत संविधान निर्माण के पश्चात् हुआ उससे बहुत सदियाँ पहले से भारत विश्व की विभिन्न संस्कृतियों  का शरणदाता रहा .हमारा इतिहास बहुत सुदृढ़ है और नई पुरानी बहुत सी संस्कृतियों के सम्मिलित होने पर भी इसका अस्तित्व कभी विच्छिन्न नहीं हुआ बल्कि एक विशाल समुंद्र की तरह  और भी विस्तृत होता गया और यही इतिहास कहता है -

   ''भारत में वर्तमान में अधिकांश जनसँख्या [आदिवासी को छोड़कर]आर्यों की है .ये भारत के मूल निवासी नहीं हैं .इनके आगमन के बारे में विद्वानों में काफी मतभेद हैं .आधुनिक इतिहासवेत्ताओं के अनुसार इनका मूल निवास उत्तरी-पूर्वी ईरान ,कैस्पियन सागर के समीप क्षेत्र या मध्य एशिया ,यूरोप के आल्पस क्षेत्र में था जबकि दूसरे कुछ इसे अंग्रेजी हुक्मरानों का तर्क बताते हुए आर्यों को यहाँ का मूल निवासी मानते हैं .

    वैदिक आर्यों ने उत्तर पश्चिम की ओर बहने वाली नदी को सिन्धु कहकर पुकारा बाद में ईरानियों ने इसे ही हिन्दू नदी का नाम दिया और इसी [सिन्धु'हिन्दू']नदी के नाम पर इस देश का नाम हिंदुस्तान पड़ा .
     यूनानियों और रोम निवासियों ने क्योंकि इस नदी को 'इंडस'कहा ,इसलिए उसी के आधार पर इस देश का नाम 'इंडिया 'पड़ा .''-प्राचीन भारतीय इतिहास -भारत ज्ञान कोष की प्रस्तुत जानकारी ''

      भारत ज्ञान कोष कहता है कि सिन्धु नदी को यूनानियों और रोम निवासियों ने इंडस कहा और उसके आधार पर हमारे देश का नाम इंडिया पड़ा .इंडिया जो गांवों और शहरों में कोई विभाजन नहीं करता हुआ सभी को अपने साथ लेकर चलता है किन्तु देश का स्वयं सेवक कहने का दम भरने वाले आर.एस.एस.प्रमुख देश के वसुधैव कुटुम्बकम की धारणा को ठेंगा दिखाते हुए यहाँ भी विभाजन ले आते हैं और कहते हैं -''इस तरह की घटनाएँ इंडिया [शहरों]में होती हैं ,भारत[गावों]में नहीं.''

     आखिर इतना अल्प ज्ञान लेकर और केवल विदेशी विरोध की भावना से ग्रसित होकर वे इतने संवेदनशील मुद्दे पर अपने विचार किस अधिकार से रखते हैं ?देश के इतने विशिष्ट संगठन के प्रमुख होकर क्या देश के वर्तमान संकट से निपटने के लिए वे अपने राजनीति को ही प्रमुखता देते हैं ?देश के इस भयावह मुद्दे पर ऐसे वक्तव्य देने का हक़ उन्हें कहाँ से मिला ''भारतीय संविधान''से या ''इंडियन कोन्सटीट्यूशन  ''से ?

 क्या समाचार  पत्रों में निरंतर छपते हुए ये समाचार उनके  कथित भारत के नहीं हैं -
१-गाँव पांचली बुजुर्ग ,सरूरपुर मेरठ में धर्म स्थल में एक किशोरी से गैंगरेप -४ जनवरी ,मुख्य पृष्ठ अमर उजाला .
२-गाँव जिटकरी ,थाना सरधना मेरठ के युवक द्वारा शामली की किशोरी को शादी का झांसा दे ३ साल तक यौन  शोषण -५ जनवरी २०१३ ,दैनिक जागरण /शामली जागरण
३-गाँव तिसंग ,जानसठ ,किशोरी से सामूहिक दुष्कर्म ,५ जनवरी २०१३ ,दैनिक जागरण/शामली मुजफ्फरनगर जागरण .

    क्या ये गाँव मोहन भागवत  जी के भारत के नहीं हैं ?
आज सारा भारत ,सारी इंडिया ऐसी घटनाओं से आक्रांत हैं ,त्रस्त हैं और यदि वे केवल राजनेता हैं तो ही उनसे ऐसे ही वक्तव्यों  की ही उम्मीद की जा सकती है किन्तु यदि वे वास्तव में स्वयं सेवक हैं ,सच्चे भारतीय हैं और सबसे पहले एक इन्सान हैं तो ऐसी घटनाएँ भले ही शहरों में हों या गांवों में वे इन्हें समस्त देश की ही मानेंगे और इनमे इतना तुच्छ विश्लेषण कर अपनी जिम्मेदारी जो एक नागरिक के तौर पर है उससे मुहं नहीं मोडेंगे.  

     जैसे कि कवि गोपाल दास ''नीरज''जी ने कहा है-
 ''अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाये ,
     जिसमे इंसान को इंसान बनाया जाये .
आग बहती है यहाँ गंगा में भी ,झेलम में भी,
     कोई बतलाये कहाँ जाके नहाया जाये .
मेरे दुःख दर्द का तुझ पर हो असर ऐसा ,
    मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाये .''

  शालिनी कौशिक
   [कौशल]


  

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