शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

रहे सब्ज़ाजार,महरे आलमताब भारत वर्ष हमारा.


रहे सब्ज़ाजार,महरे आलमताब भारत वर्ष हमारा.


     ग़ज़ल 
तू ही खल्लाक ,तू ही रज्ज़ाक,तू ही मोहसिन है हमारा.
रहे सब्ज़ाजार,महरे आलमताब भारत वर्ष हमारा.

एक आशियाँ बसाया हमने चैनो -अमन  का   ,
नाकाबिले-तकसीम यहाँ प्यार हमारा.

कुदरत के नज़ारे बसे हैं इसमें जा-ब-जा,
ये करता तज़्किरा है संसार हमारा.

मेहमान पर लुटाते हैं हम जान ये अपनी ,
है नूर बाज़ार-ए-जहाँ ये मुल्क  हमारा.

आगोश में इसके ही समां जाये ''शालिनी''
इस पर ही फ़ना हो जाये जीवन ये हमारा.

कुछ शब्द अर्थ-
खल्लाक-पैदा करने वाला,रज्ज़ाक-रोज़ी देने वाला
मोहसिन-अहसान करने वाला,सब्ज़ाजार-हरा-भरा
महरे आलमताब -सूरज,नाकाबिले-तकसीम--अविभाज्य
तज़्किरा-चर्चा,बाज़ार-ए-जहाँ--दुनिया का  बाज़ार
आगोश-गोद या बाँहों में,जा-ब-जा--जगह-जगह
शालिनी कौशिक

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