गुरुवार, 30 जून 2011

जम्मू-कश्मीर में पहली बार पंचायती राज‏



खुशबू(इन्द्री)
 जम्मू पंचायती राज कानून देश में भले ही तीन दशक पहले लागू हो गया हो, लेकिन जम्मू कश्मीर में तो यह पहली बार पूर्णतया और प्रभावी रूप से लागू होने जा रहा है। सूबे के 22 जिलों की 81 तहसीलों के 7050 गांवों में तीन महीनों तक चली 16 चरणों वाली चुनाव प्रक्रिया संपन्न हो चुकी है। राज्य सरकार 30 जून कर पंचायती राज अधिनियम 1989 के तहत नोटिफिकेशन जारी कर सूबे में पंचायती राज लागू कर देगी। इसके साथ ही ग्रामीणों को दस साल बाद एक बार फिर अपने फैसले खुद करने का अधिकार हासिल हो जाएगा। इतना ही नहीं, राज्य को केंद्र की ओर से ग्रामीण विकास के लिए सालाना करीब पांच सौ करोड़ की राशि जारी होने लगेगी, जो पंचायतें न होने के कारण पिछले पांच सालों से नहीं मिल रही थी। राज्य के विभिन्न 22 जिलों की 81 तहसीलों के 7050 गांव हैं, जिनमें 16 चरणों में मतदान की प्रक्रिया 18 जून तक चली। इनमें 4130 सरपंच और 29719 पंच चुने गए हैं। राज्य के कुल 143 ब्लॉकों में से 141 की डाटा एंट्री की प्रक्रिया जोरों पर है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी बीआर शर्मा 27 जून को कारगिल के दो ब्लॉकों में चुनाव करवाने के बाद पंचायत चुनाव प्रक्रिया संपन्न होने संबंधी सारा डाटा सरकार को सौंप देंगे। इसके मिलते ही राज्य सरकार पंचायतीराज अधिनियम 1989 के तहत नोटिफिकेशन जारी कर देगी। ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए लोगों को पंचायत चुनाव का वर्षाें से इंतजार था। नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकाल में 2001 में राज्य में 23 साल बाद पंचायत चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन यह पहले चरण तक ही सिमट गई थी। कश्मीर घाटी की अधिकतर पंचायतों में चुनाव न होने से पंचायती राज औपचारिकता बनकर रह गया था। 2006 से राज्य में पंचायतों को भंग किए जाने के बाद से चुनाव का इंतजार हो रहा था। चुनाव न होने से राज्य को गत पांच सालों में अरबों का नुकसान हुआ, क्योंकि केंद्र सरकार ने ग्रामीण विकास के लिए चिह्नित योजनाओं के लिए धनराशि जारी ही नहीं की। सूबे के पंचायती राज्यमंत्री एजाज अहमद खान का कहना है कि सरकार पंचायती राज कायम करने के प्रति गंभीर है। पंचायती राज के तीन चरणों को प्रभावी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। उन्होंने कहा, 2001 के पंचायत चुनाव में राज्य में 38,02,302 मतदाता थे, जबकि 2011 में 50,68,975 लोगों ने मताधिकार का प्रयोग किया। राज्य में दस साल पूर्व 2702 सरपंच व 20559 पंच पद थे। एक दशक के इस अंतराल में राज्य में आठ नए जिले व 22 नए ब्लॉक बने। नए जिलों का गठन 2007 में हुआ। खान ने कहा, अब सरकार के लिए अगली चुनौती पंचायत कमेटियां, उनके चेयरमैन, जिला विकास बोर्ड के चेयरमैन व विधान परिषद के दो एमएलसी बनाना होगा।
    ख़ुशी जी को आप अपने विचार निम्न मेल पर भेज सकते हैं-
    media1602 @gmail .कॉम
    लेखिका-खुशबू गोयल  
    प्रस्तुति-शालिनी कौशिक 

बुधवार, 29 जून 2011

वो जैसे भंवर में फंसा कर गए.


ज़रा आये ठहरे चले फिर गए,
     हमारे दिलों में जगह कर गए.
न कह पाए मन की  न सुन पाए उनकी ,
   बस देखते आना जाना रह गए.

बिछाए हुए थे उनकी राहों में पलकें,
   नयन भी हमारे खुले रह गए.
न रुकना था उनको नहीं था ठहरना ,
  फिर आयेंगे कहकर चले वो गए.

न मिलने की चाहत न रुकने की हसरत,
   फिर आने का वादा क्यों कर गए.
हमें लौट कर फिर जीना था वैसे ,
   वो जैसे भंवर में फंसा कर गए.
         शालिनी कौशिक 

मंगलवार, 28 जून 2011

महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक कदम:महिलाओं को समर्पित देश का पहला हाट तैयार‏

 
नई दिल्ली महिलाओं को समर्पित देश में पहला महिला हाट जल्द ही गुलजार होने जा रहा है। स्टॉल सिर्फ महिलाओं को ही सामान की बिक्री के लिए आवंटित किए जाएंगे। साथ ही इनमें खरीददारी करने के लिए सिर्फ कपल्स को ही जाने की इजाजत होगी। महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के मकसद से एमसीडी ने वर्ष 2007 में इसका निर्माण शुरू किया था। तत्कालीन मेयर आरती मेहरा ने इसकी नींव रखी थीं। गत महीने जब निर्माण कार्य संपन्न हुआ तो एमसीडी ने वह शर्ते भी तैयार कर ली जिसके आधार पर महिलाओं को स्टॉल आवंटित किए जाएंगे। राजधानी के दक्षिणी, बाहरी और पश्चिमी दिल्ली स्थित आईएनए, पीतमपुरा और जनकपुरी दिल्ली हाट की तर्ज पर एमसीडी ने महिला हाट तैयार किया है। आसिफ अली रोड की भूमिगत पार्किग के ऊपर बने इस हाट की खासियत यह होगी कि यहां के 39 स्टॉल सिर्फ महिलाओं को आवंटित किए जाएंगे। इसे वे चलाएंगी। खाने-पीने के सामान की बिक्री के लिए जो दो कैफेटेरिया बनाए गए हैं, इनका संचालन भी महिलाएं करेंगी। कैफेटेरिया का लाइसेंस दो साल के लिए एमसीडी जारी करेगी। हस्तकरघा सामान की प्रदर्शनी और बिक्री के लिए एक महिला को 30 दिन के लिए ही स्टॉल दिए जाएंगे। 80 फीसदी स्टॉल दिल्ली की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे। बाकी स्टॉल अन्य राज्यों की महिलाओं के लिए होंगे। एक साल में कोई महिला सिर्फ एक बार ही स्टाल अपने नाम बुक करा सकेगी। स्टॉल के एवज में उन्हें एक हजार रुपये बतौर फीस के रूप में एमसीडी को देना होगा। सुबह 10 बजे से रात नौ बजे तक महिला हाट खुला रहेगा। एमसीडी के प्रवक्ता दीप माथुर बताते हैं कि इसका मकसद यह था कि दिल्ली के अन्य इलाकों की तरह मध्य दिल्ली में भी हाट हो। बाद में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के मकसद से इसे महिला हाट बनाने का फैसला लिया गया। यह बनकर तैयार हो चुका है। इसके आवंटन आदि की शर्ते बुधवार को स्थायी समिति की बैठक में प्रस्तुत की जाएंगी। स्थायी समिति व सदन से स्वीकृति मिलते ही महिला हाट में स्टॉल आवंटित करने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

आप ख़ुशी जी को अपने विचार लेख के सम्बन्ध में इस मेल पर भेज सकते हैं-media1602 @gmail .com
लेखिका _खुशबू [इन्द्री]{करनाल}
प्रस्तुति-शालिनी कौशिक 

शनिवार, 25 जून 2011

महंगाई तो मार ही गयी पर हमारी महत्वाकांक्षा का क्या....

महंगाई तो मार ही गयी पर हमारी महत्वाकांक्षा  का क्या. आप सोच रहे होंगे की मैं फिर उलटी बात करने बैठ गयी आज सभी समाचार पत्रों में गैस ,डीजल और केरोसिन के दाम बढ़ने की सूचना  प्रमुखता से प्रकशित है .सरकार की जिम्मेदारी जनता जनार्दन के बजट की बेहतरी देखना है ये मैं मानती हूँ और यह भी मानती हूँ की सरकार इस कार्य में पूर्णतया विफल रही है किन्तु जहाँ तक सरकार की बात है उसे पूरी जनता को देखना होता है और एक स्थिति एक के लिए अच्छी तो एक के लिए बुरी भी हो सकती है किन्तु हम हैं जिन्हें केवल स्वयं को और अपने परिवार को देखना होता है और हम यह काम भी नहीं कर पाते.
       आज जो यह महंगाई की स्थिति है इसके कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं .मेरी इस सोच के पीछे जो वजह है वह यह है की मैं देखती हूँ कि  हमारे क्षेत्र में जहाँ पैदल भी बहुत से कार्य किये जा सकते हैं लोग यदि सुबह को दूध लेने भी जाते हैं तो मोटर सायकिल पर बैठ कर जाते हैं जबकि वे  यदि सही ढंग से कार्य करें तो  मोर्निंग वाक के साथ दूध लाकर अपनी सेहत भी बना सकते हैं.सिर्फ यही नहीं कितने ही लोग ऐसे हैं जो सारे दिन अपने स्कूटर .कार को बेवजह दौडाए फिरते हैं .क्या इस तरह हम पेट्रोल का खर्चा नहीं बढ़ा  रहे और यह हमारी आने वाली पीढ़ी को भुगतना होगा जब उसे वापस साईकिल और बैलगाड़ी पर सवार होना होगा.
ये तो हुई छोटी जगह की बात अब यदि बड़े शहरों की बात करें तो वहां भी लोगों के ऑफिस एक तरफ होने के  बावजूद वे  सभी अलग अलग गाड़ी से जाते हैं और इस तरह पेट्रोल का खर्चा भी बढ़ता है और सड़कों पर वाहनों  की आवाजाही भी जो आज के समय में दुर्घटनाओं का मुख्य कारण है.
     अब आते है गैस के मुद्दे पर जबसे गाड़ियाँ गैस से चलने लगी हैं लोगों का सिलेंडर घर में खर्च होने के साथ साथ गाड़ी में भी लगने लगा है और गैस की आपूर्ति पर भी इसका बहुत फर्क पड़ा है.अब बहुत सी बार घर में चुल्हा जलने के लिए गैस मिलना मुश्किल हो गया है और सरकार के द्वारा गाड़ी के लिए अलग सिलेंडर उपलब्ध करने के बजूद घरेलू गैस ही इस कार्य में इस्तेमाल हो रही है.क्योंकि गाड़ी के लिए मिलने वाले सिलेंडर घरेलू गैस के मुकाबले ज्यादा महंगे होते हैं.
    हम हर कार्य में अपनी जिम्मेदारी से ये कहकर की ये सब हमारी जिम्मेदारी नहीं है अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते क्योंकि हम भी इस सब के लिए उत्तरदायी हैं .आजकल ये स्थिति आ चुकी है की बच्चा पैदा बाद में होता है उसके हाथ में वाहन  पहले आ जाता है.व्यापार आरम्भ बाद में होता है और गोदाम में भण्डारण पहले आरम्भ हो जाता है क्या ये हमारी जिम्मेदारी नहीं है कि हम भी अपनी ऐसी आदतों पर अंकुश लगायें और देश में समस्याओं से निबटने में सरकार को सहयोग करें.
                              शालिनी कौशिक 

शुक्रवार, 24 जून 2011

उत्तर प्रदेश की पुलिस उत्पीड़न में नंबर वन‏

खुशबू(इन्द्री)नोएडा में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों पर कार्रवाई के लिए आलोचनाएं झेल रही उत्तर प्रदेश पुलिस के खिलाफ वर्ष 2010-11 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सर्वाधिक शिकायतें मिली हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2010-11 में यूपी पुलिस के खिलाफ आयोग को 8,768 शिकायतें मिलीं। इनमें हिरासत में मौत, प्रताड़ना, अत्याचार, फर्जी मुठभेड़ और कानूनी कार्रवाई करने में नाकामी जैसे मामले शामिल हैं। पुलिस के खिलाफ मिली शिकायतों के मामले में राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली।,023 शिकायतों के साथ दूसरे स्थान पर है। इसके बाद हरियाणा (782 शिकायतें), राजस्थान (571), बिहार (533) का नंबर है। शिकायतों का यह सिलसिला 2011-12 में भी जारी है और यूपी से 25 अप्रैल तक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को 619 शिकायतें और दिल्ली से 85 शिकायतें मिल चुकी हैं। पुलिस के खिलाफ दादरा और नागर हवेली से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को एक शिकायत, नगालैंड से दो शिकायतें, मिजोरम तथा त्रिपुरा से तीन-तीन और पुडुचेरी तथा अरुणाचल प्रदेश से सात-सात शिकायतें मिली हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को वर्ष 2010 से 12 में उत्तर प्रदेश से हिरासत में प्रताड़ना की 654 शिकायतें, अनुसूचित जातियों -जनजातियों के खिलाफ ज्यादती की 93 और फर्जी मुठभेड़ की 40 शिकायतें मिलीं। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि राज्य से मिलने वाली शिकायतों की संख्या घटी है। वर्ष 2009-10 में आयोग को 10,191 और 2008 - 09 में 10,740 शिकायतें मिली थीं। नक्सल प्रभावित राज्यों में पुलिस संबंधी शिकायतें बढ़ी हैं। उड़ीसा में 2009-10 में इनकी संख्या जहां 87 थी वहीं 2010-11 में यह संख्या बढ़ कर 182 हो गई। झारखंड में पुलिस के खिलाफ 2009 -10 में 208 और 2010 -11 में 254 शिकायतें, छत्तीसगढ़ में इसी अवधि में 53 और 58, मध्यप्रदेश में 336 और 355, पश्चिम बंगाल में 113 और 161 शिकायतें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को मिलीं। महाराष्ट्र में इनकी संख्या कम हुई है। उग्रवाद प्रभावित मणिपुर से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को 2011-12 के दौरान फर्जी मुठभेड़ की आठ शिकायतें मिलीं। थाने में युवक की मौत दो उप निरीक्षक निलंबित बस्ती, जासं : यूपी पुलिस की वर्दी रविवार को दागदार हो गई। दुबौलिया थाने की हवालात में एक युवक की जान चली गई। परिवारजनों का आरोप है कि पुलिस की क्रूरता से वह मरा, जबकि एसपी इसे खुदकुशी का मामला बता रहे हैं। फिलहाल उन्होंने थाने के दो उप निरीक्षकों को निलंबित कर दिया है, जबकि जिलाधिकारी ने घटना की मजिस्ट्रेटी जांच के निर्देश दिए हैं। जानकारी के अनुसार दुबौलिया पुलिस ने विशुनदासपुर निवासी भगवंत सिंह के पुत्र नागेन्द्र कुमार सिंह उर्फ झिन्नू (35) को शनिवार को कटरिया से गिरफ्तार किया था। गांव पट्टीदारी की दर्जा नौ की एक छात्रा को 11 मई की रात जबरन उठा ले जाने का उस पर आरोप था। रविवार को दिन के 11 बजे नागेन्द्र की थाने की हवालात में मौत हो गई। इसके बाद पुलिस के हाथ-पांव फूल गए। इस दौरान आनन-फानन में पुलिस ने चालाकी दिखाते हुए शव हवालात से बाहर निकाल दिया व जिला अस्पताल लाकर उसे मॉर्चरी में रख दिया। जिला मुख्यालय पहुंचे नागेन्द्र के भतीजे रजनीकांत उर्फ सिंपल सिंह ने कहा कि पुलिस ने शनिवार को गिरफ्तार करने के बाद बेरहमी से उसकी पिटाई की और उसके हाथ की अंगुलियां तोड़ डाली। इसी वजह से हवालात में ही जान चली गई।
ख़ुशी जी का ये आलेख आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत किया गया है आप इसके सम्बन्ध में अपने विचार उन्हें इस इ-मेल पर भेज सकते हैं.media1602 @gmail .com 
प्रस्तुति-शालिनी कौशिक  

बुधवार, 22 जून 2011

एक उसी लम्हे का ख्याल रह गया..

मुस्कुरा कर कहा उसने एक बार जो,
     सुनते ही दिल मेरा बाग-बाग हो गया.
कोई और चाह न रही मन में,
     एक उसी लम्हे का ख्याल रह गया.

भूली कितना गम सहा मेरे मन ने,
     शब्द सुनते ही यहाँ  दिल रम गया.
कोई और चाह न रही मन में,
     एक उसी लम्हे का ख्याल रह गया.

हमने चाहा उनसे मिलकर कुछ कहें,
     पास उनके जिंदगी भर हम रहें.
सोचते ही सोचते दिल थम गया,
     एक उसी लम्हे का ख्याल रह गया.
                     साभार गूगल 
                                      शालिनी कौशिक 

रविवार, 19 जून 2011

''रिश्ते''







कभी हमारे मन भाते हैं,
     कभी हैं इनसे दिल जलते,
कभी हमें ख़ुशी दे जाते हैं,
      कभी हैं इनसे गम मिलते,
कभी निभाना मुश्किल इनको,
     कभी हैं इनसे दिन चलते,
कभी तोड़ देते ये दिल को,
      कभी होंठ इनसे हिलते,
कभी ये लेते कीमत खुद की,
      कभी ये खुद ही हैं लुटते,
कभी जोड़ लेते ये जग को,
     कभी रोशनी से कटते,
कभी चमक दे जाते मुख पर,
     कभी हैं इनसे हम छिपते,
कभी हमारे दुःख हैं बांटते,
     कभी यही हैं दुःख देते,
इतने पर भी हर जीवन के प्राणों में ये हैं बसते,
और नहीं कोई नाम है इनका हम सबके प्यारे''रिश्ते''
                   शालिनी  कौशिक 


शुभकामनायें सब पापा को

     बस कुछ शब्दों में-
''एक बच्चे के जीवन में ऊर्जा का प्रमुख स्रोत ''

               शालिनी कौशिक

शुक्रवार, 17 जून 2011

लोकनिर्माण विभाग क्या कर रहा है?

आजकल सभी और अफरातफरी का माहौल है आप सभी को पता भी होगा  और कितने ही होंगे जो इस विपदा को झेल भी रहे होंगे .चलिए पहले कुछ चित्र ही देख कर समझ लें- 
अमर उजाला व् हिंदुस्तान दैनिक से साभार 
देखा आपने यही हाल है बरसात के इस मौसम में 

जानते हैं  मैं  क्या कहना चाह रही हूँ यही  कि उत्तर प्रदेश का लोक निर्माण विभाग सड़कों का निर्माण कुछ इस प्रकार कर रहा है कि जो घर सड़क से काफी ऊँचे बनाये गए थे वे धीरे धीरे सड़क पर ही आते जा रहे हैं.कहने का मतलब ये है कि जब वे घर बनाये गए थे तो सड़क से इतने ऊँचे बनाये गए थे कि बारिश का पानी उन में नहीं घुस सकता था किन्तु अब स्थिति ये है कि जरा सी बारिश होते ही बारिश का पानी घरों में घुस जाता है और स्थिति यही होती है जो ऊपर के चित्रों में दिखाई दे रही है.सड़कें जब भी बनाई जा रही हैं तब ही हर बार वे ऊँची उठ जाती हैं.हाल ये है कि एक समय जो चबूतरे दीखते थे आज वे सड़क का भाग ही दिखाई दे रहे हैं.
  इसके साथ ही सड़कों पर पहले जो नालियां बनती थी वे ऐसी बनती थी कि उन पर कोई चैनल न लगा होने पर भी वे सही रहती थी और बरसात में उनमे इतनी जल्दी भराव की स्थिति नहीं आती थी और आज ये कहा जा रहा है कि नई तकनीक आ गयी है और ये नई तकनीक ऐसी है जिसके कारण हर  ओर परेशानी का आलम है.बारिश में ही क्या बिन बारिश भी सड़कों पर नाली से बाहर पानी बहता रहता है .आज लोक निर्माण विभाग की नौकरी को बहुत आमदनी वाली नौकरी माना जाता है हो सकता है कि ऐसे बढ़िया कार्यों से उनकी कुछ ज्यादा ही आमदनी हो जाती हो.पर जन साधारण के लिए तो ये लोक निर्माण विभाग एक सिरदर्द ही बनता जा रहा है.    

गुरुवार, 16 जून 2011

गरीबों और भिखारियों का देश भारत‏


भारत देश को आज़ाद हुए 63 साल बीत चुके हैं|इन 63 सालों में भारत ने तकनीकी,,आर्थिक.राजनीतिक एवं सांस्कृतिक आदि सभी शेत्रों में प्रगति के शिखर को छुआ| आज भारत का औद्योगिक ढांचा इतना मजबूत हो चुका है कि विदेशी कम्पनियां भारत में निवेश करने कि इच्छुक हैं|  बावजूद इस प्रगति के भरत की सामाजिक स्थिति आज भी निम्न स्तर की है|आज भी भारत गरीबों और बिखारियों का देश है|आज भी भारत की 35 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा से निचे जीवन बसर कर रही है|देश की 27 प्रतिशत जनसंख्या भिखारियों का जीवन बिता रही है|कहा जाये तो देश का उच्च वर्ग तो हर तरह की प्रगतिशील और विकासपरक सुख सुविधाएँ प्राप्त कर रहा है|मध्यम वर्ग को तो हाडतोड़ मेहनत कर दो वक्त की रोटी जुटानी पडती है|लेकिन देश का निम्न वर्ग इतना विकास होने के बाद भी गरीब है|यहाँ तक कि इस वर्ग को भीख मांग मांग कर अपना पेट भरना पड़ता है|न तो इनके लिए रोजगार की व्यवस्था है न ही शिक्षा की| देश में दिन प्रतिदिन इस तरह के लोगों की संख्या बढती जा रही है|जब कभी हम घर से बहर निकलते हैं तो सड़क पर,रेड सिग्नलों पर,बस स्टेंड पर,अस्पतालों में महिलाओं को,बच्चों को और वृद्ध आदमियों,औरतों को भीख मांगते डेक सकते हैं|कुछ लोग इन्हें दुत्कार देते हैं तो कुछ लोग तरस खाकर इन्हें एक दो रुपया दे देते हैं|यहाँ विशेष बात ये हैं कि इस भिखारी वर्ग को बनाने का जिम्मेवार कौन है|अगर सोचा जाये तो और कोई नही बल्कि हम लोग ही जेम्मेवार हैं इसके लिए|क्योंकि इस वर्ग में ज्यादातर वे बच्चें होते हैं जो बाप कि शराब पीने कि लत के चलते अपना और अपने माँ ,भाई ,बहन का पेट भरने के लिए भीख मांगते हैं|वे औरतें और उनके साथ वे बच्चियां भी हैं जिन्हें लोग लडकी पैदा होने पर या अपाहिज होने की सज़ा भिखारी बना कर देते हैं|इनमे वे बूढ़े माँ बाप भी होते हैं जिन्हें बेटे बहू बोझ समझके दर दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ देते हैं|कई बार तो ये भिखारी ज्यादा पाने की चाह में अपराध तक कर बैठते हैं| अक्सर लोग इनके बारे में सुझाव देते नजर आते हैं जैसे इन्हें भीख नही देनी चाहिए|बल्कि कुछ काम काज या मेहनत मजदूरी करने के लिए प्रेरित करना चाहिए| ठीक भी है|पर ऐसा तो केवल अच्छा खासा आदमी या औरत ही ऐसा कर सकती है|बाकी के लोग क्या करेंगे जो अपाहिज हैं या वे बच्चे क्या करेंगे जो छोटे होने के चलते मेहनत मजदूरी नही कर सकते|क्योंकि वे तो अपनी लाचारी और भूख से बिलखते पेट के कारण भीख मांगने को मजबूर होते हैं|शौक किसे होता है भीख मांगने का|
सही कहा है किसी ने इंसान ही इंसान का दुश्मन होता है|इनके अपने ही जिम्मेवार है इनकी इस दयनीय स्थिति के लिए|श्रम आणि चाहिए उन लोगों को जो अपनों को बोझ समझते हैं|जो लडकी का पैदा होना एक अभिशाप समझते हैं|श्रम आणि चाहिए उन माँ बाप को जो बच्चें पैदा तो कर देते हैं लेकिन उन्हें पाल नही सकते|उनका पेट नही भर सकते|यहाँ सरकार को भी जिम्मेवार ठहराया जा सकता है|देश में भिक्षावृति पर रोक लगाने के लिए सरकार ने भिक्षावृति निरोधक अधिनियम बनाया हुआ है|पर कोई फायदा नही|क्योंकि सरकार कानून बना तो देती है पर कानून का लागू होना या न होना अधिकारियों के हाथ में होता है|ये भरतीय कानूनों की पहचान है|बहरहाल सरकार का क्या वह तो सिर्फ कानून बनाकर इन्हें कुछ राहत प्रदान कर सकती है|नैतिक जिम्मेवारी तो इन भीख मांगने वालों के अपनों की है|वैसे आज के समाज में रिश्ते नाते,अपनापन नाम की कोई चीज नही रह गयी है|पर सुधार करने  की एक कोशिश की जा सकती है|
खुशबू(इन्द्री)करनाल 
खुशबू जी ने ये आलेख मुझे इ-मेल से १० जून को भेजा था जिसे मैं अपने इ-मेल में परेशानी को लेकर प्रकाशित करने में देरी कर गयी.आप सभी के विचारों का  ख़ुशी   जी को निम्न     इ-मेल पर    इंतजार   रहेगा  .
media1602@gmail.com

बुधवार, 15 जून 2011

मेरा मेल मुझे वापस मिल गया -हिप हिप हुर्रे ;;;;

बहुत खुश हूँ मैं इस वक़्त और आप सभी मेरी ख़ुशी में बराबर के हिस्सेदार हैं क्योंकि आप सभी के सहयोग और मुझ पर विश्वास ने मुझे इतनी दिमागी राहत  दी की मैं अपना इ-मेल आई डी पुनः प्राप्त करने में सफल हो गयी.रात १.३० पर मेरी बहन शिखा के निरंतर प्रयत्न ने हमें वापस मेरे मेल के पास पहुंचा दिया और तब जाकर मुझे राहत मिली और मैं रात को चैन से सो पाई.
मेरे मेल जो मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण  हैं उनके खोने से मेरे दिमाग ने काम  करना ही बंद कर दिया था और सबसे ज्यादा दुःख हो रहा था जब मेरे दिमाग में आया की ख़ुशी गोयल करनाल का एक आर्टिकिल अभी मेरे मेल में ही है जो मैं प्रकाशित नहीं कर पाई हूँ.जब मेरे मेल मुझे वापस मिले तब शिखा ने यही कहा की देखो  ख़ुशी जी के आर्टिकिल ने हमें मेल वापस दिला दिए.अभी तक मैंने यही महसूस किया है की जिन मेल आई डी पर मैंने अभी दो तीन दिन में मेल भेजे थे उन मेल पर ही हैकर ने मेल भेज कर उन्हें परेशान किया है.जब मैंने अपने मेल का मुख्य पृष्ठ देखा तो उसमे हैकर  ने निम्न परिवर्तन किये थे-
१-जन्म तिथि-२४.मार्च १९८८ कर दी थी .
२-प्लेस-united states कर दी गयी थी  .
३-स्टेट -अलबामा कर दिया गया था.
४-सिकुरिटी प्रश्न भी बदल दिया गया था.
                 चलिए फ़िलहाल तो मेरे दिमाग को राहत मिल गयी है और आगे के लिए सबक भी कि सावधानी की बहुत ज़रुरत है.जिनको मेरे इ-मेल हेक  से परेशानी भुगतनी पड़ी है उनसे मैं अपनी और से क्षमा मांगती हूँ की मेरी   लापरवाही से आप को कष्ट  हुआ है आगे से मैं टिप्पणियों के रूप    में प्राप्त  आप सभी    के मार्ग दर्शन में ही रहकर  अपने   कार्य करूंगी.एक बार फिर मैं अपनी ख़ुशी में आप सभी  को सम्मिलित    करती  हूँ और आप सभी  का  धन्यवाद्  भी.

मंगलवार, 14 जून 2011

मेरा इ-मेल हैक हो गया.

  आज दिन से मेरे मेल नहीं खुल रहे थे और मैं सोच रही थी कि शायद गूगल में ही कुछ परेशानी आ गयी होगी किन्तु अभी रात्रि ९:५१ पर मेरा फोन बजा और जब मैंने फोन उठाया तो वह फोन मुझे ओपन बुक ऑनलाइन के संस्थापक श्री गणेश जी बागी का था और वे बता रहे थे कि उनके मेल में मेरे मेल से कोई १५०० यूरो का कोई मेल आया है बाद में वे भी ये ही मान गए कि 
मेरा इ-मेल हैक हो गया.और उन्हें जो मेल मिला है वह ऊपर देखें .आप सभी में से यदि किसी को भी मेरे मेल से ऐसा मेल मिले तो कृपया इग्नोर करें और यदि हो सके तो मुझे ये बताएं कि मुझे क्या करना चाहिए.
            शालिनी कौशिक  

सोमवार, 13 जून 2011

माचिस उद्योग है या धोखा उद्योग

पिछले कई महीनो से झेल रही हूँ इसीलिए आज लिख रही हूँ कि आज माचिस उद्योग अपने उपभोक्ताओं के साथ धोखा कर रहा है.हालाँकि ब्लॉग जगत में से अधिकांश लाइटर का इस्तेमाल करते होंगे किन्तु जहाँ तक मेरा मानना है मैं माचिस को इसके मुकाबले ज्यादा सही समझती हूँ मैंने भी अपनी आंटी के यहाँ लाइटर इस्तेमाल किया और या तो ये कहें कि मुझे इस्तेमाल करना नहीं आया या कहें कि उसे इस्तेमाल करने के लिए बहुत ताक़त चाहिए तो मुझमे वो भी नहीं है और मैं इसी वजह से कह लें तब भी माचिस को ही ज्यादा महत्व देती हूँ.
              चलिए अब सुनिए मेरी आप बीती माचिस  के बारे में.मेरे कितने ही कपड़ों में इसकी तीली का मसाला उछल कर छेद कर चुका है और एक बार तो मेरी आँख भी इसके मसाले के हमले से बाल बाल बच गयी.इतना कुछ तो फिर भी माचिस के ब्रांड पलट पलट कर हम बर्दाश्त करते रहे किन्तु अब तो हद हो गयी है यदि ४-५ तीली न जला लो तो आप गैस जला ही नहीं सकते और हमारे क्षेत्र में आने वाली एक मात्र आई.एस.आई.ब्रांड ''ऊँट  ''भी इसी श्रेणी में है.उसे हम बहुत समय पहले उसके इन्ही कमियों के कारण छोड़ चुके हैं और अब यहाँ आने वाली ''ढोलक.मिर्च '''आदि ब्रांड भी इसी श्रेणी में गिरती दिख रही हैं.एक बार तो किसी उपभोक्ता ने किसी माचिस कम्पनी पर माचिस में कम तीली आने पर मुकदमा भी किया था किन्तु हमारे क्षेत्र में ये काम मुश्किल है क्योंकि उपभोक्ता अदालते जिला स्तर पर होती हैं और उनमे जाकर शिकायत करने का समय निकलना हर आदमी के वश में नहीं होता और इसी कारण ये उद्योग गलत काम करके भी साफ बचे रहते हैं.
    किसी माचिस में मसाला आग नहीं पकड़ता और किसी माचिस में मसाला जलता रहता है और उसकी लकड़ी आग नहीं पकडती.हालाँकि है छोटी से चीज़ किन्तु बहुत काम की चीज़ है और इसमें यदि कोई भी बेईमानी  सामने आती है तो खून खोल उठता है और वह भी बिना चूल्हा जलाये जबकि चूल्हा जलाने को तो माचिस चाहिए.
                               शालिनी  कौशिक  

शनिवार, 11 जून 2011

भ्रष्ट भारत की तस्वीर‏


भारत को आजाद हुए 63 साल बीत चुके हैं। इन सालों में भारत ने हर क्षेत्र में इतनी उन्नति की आज भारत सूचना तकनीकी के शिखर पर है। आज भारतीयों के हाथ में मोबाइल,एटीएम,पैनकार्ड,थ्रीजी सेवाएं हैं। मीडिया के बाद सूचना प्रोद्यौगिकी को देश का पांचवां स्तम्भ माना जा चुका है। औद्योगिक स्तर पर भारत विश्व स्तर पर चमक रहा है। इन सभी के बावजूद आज भारत घोटालों,भ्रष्टाचार,गरीबी,बेरोजगारी,आतंकवाद,वोटबैंक की राजनीति के स्तर पर भी खड़ा है। कहने को सरकार गरीबी उन्मूलन एवं कल्याण योजनाएं बनाती है। सस्ते दामों पर आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराती है। हर साल करोड़ों का बजट जनता  की सेवा में अर्पित किया जाता है। रोजाना शिक्षा विकास हेतु नए-नए सुझाव दिए जाते हैं। अब तो स्कूली बच्चों को दोपहर का भोजन और नि:शुल्क किताबें उपलब्ध करायी जाती हैं। सालाना हजारों नौकरियों के अवसर दिए जाते हैं और भी न जाने कितनी सुविधाएं यह देश अपनी एक अरब जनता को उपलब्ध कराता है। बावजूद इसके देश की जनता गरीबी की मार झेल रही है। आज भी लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती। नौकरियों के अवसर होने पर भी पढ़े-लिखे डिग्री होल्डर अनुभवी प्रतिभाएं सडक़ों पर खाक छान रही हैं। क्योंकि नौकरियां तो रसूखदारों,सिफ ारिशियों और नेता या मंत्री के रिश्तेदारों को दे दी जाती हैं। योजनाएं,परियोजनाएं और सेवाएं तो मंत्रियों,अधिकारियों के लिए काली कमाई का जरिया बन गयी हैं। जनता को इनका फ ायदा मिले या न मिले कोई मतलब नहीं। आंकड़ों में हेराफ ेरी कर अपनी जेबें भरते हैं। शहीदों की विधवाओं के लिए मकान बनाए जाते हैं और इनमें रहते हैं देशके मंत्री और प्रशासनिक एवं सैन्य अधिकारी। मिड-डे मील बच्चों के लिए पर गला सड़ा कीड़ों वाला अनाज। वास्तव आज का भारत भ्रष्टाचारियों और घोटालेबाजों का देश बन कर रह गया है। जिसका ताजा उदाहरण है वर्तमान समय में उजागर हो रहे घोटाले। इस समय देश की कांग्रेस सरकार घोटालों की सरकार साबित हो रही है। टूजी मामले में तो प्रधानमंत्री साहब ने अपना बचाव करते हुए राजा को मंत्री बनाना गठबंधन हेतु अपनी मजबूरी बताया। मतलब यह कि देश के शासक सत्ता में बने रहने के लिए गलत का साथ देने से भी नहीं चूकेंगे। संक्षेप में आज भारत में लोकतंत्र नहीं बल्कि भ्रष्टाचार के लिए,भ्रष्टाचारियों द्वारा,भ्रष्टाचार के हित में चलाया जा रहा भ्रष्टतंत्र है।

खुशबू इन्द्री करनाल
आप ख़ुशी जी को अपनी प्रतिक्रियाएं निम्न इ-मेल पर भेज सकते हैं-
media1602 @gmail .कॉम
               लेखक-खुशबू इन्द्री करनाल 
                       प्रस्तुति-शालिनी कौशिक 

गुरुवार, 9 जून 2011

सौतेला तो शब्द बुरा




आमतौर पर यदि हम ध्यान दें तो जहाँ देखो सौतेली माँ की ही बुराई जोरों पर होती है.किसी भी बच्चे की माँ अगर सौतेली है तो उसके साथ सभी की सहानुभूति होती है किन्तु कहीं भी सौतेले बाप का जिक्र नहीं किया जाता जबकि मेरी अपनी जानकारी में यदि मैं देखती हूँ तो हर जगह भेदभाव ही पाती हूँ.अभी हाल में ही मेरी जानकारी की एक लड़की का निधन हो गया  वह लम्बे समय से बीमार थी किन्तु कहा गया कि लम्बे इलाज के बाद भी वह ठीक नहीं हो पाई.सभी को उसके पिता से बहुत सहानुभूति थी और सभी यही कह रहे थे कि ये तो अपनी लड़की से बहुत प्यार करते थे और दुःख में इनके आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं.ये मुझे बाद में पता चला की वह लड़की अपनी माँ के साथ आयी थी अर्थात उसकी माँ की ये दूसरी शादी थी और उस लड़की के वे दूसरे पिता थे.अब कीजिये गौर इसके दूसरे पहलू पर यदि यह स्थिति किसी महिला के साथ होती तो सब क्या कहते-''सौतेली माँ थी मगरमच्छी आंसू बहा रही थी.इसीने उसकी कोई देखभाल नहीं की इसीलिए वह मर गयी.''आखिर ये हर जगह नारी और पुरुष की स्थिति में अंतर क्यों कर दिया जाता है?
      मेरी सहेली की बहन की जिससे शादी हुई है उसके पहले से ही दो बेटियां हैं और वह उन दोनों बेटियों को भी अपने बच्चों की तरह ही पाल रही है.और ये नहीं कि ये   कोई दो दिन की बात है लगभग १५ साल पहले हुई इस शादी की सफलता मेरी सहेली की बहन पर ही निर्भर रही है.जबकि मेरे पड़ोस की ही एक लड़की जिसका तलाक हुआ है और जिसके एक लड़का है उसके दूसरी शादी होने पर उसके माता पिता ने उसके लड़के को अपने पास रखा है क्योंकि उसका दूसरा पति उसके बेटे को अपनाने को तैयार नहीं था.
                 मेरी एक सहपाठिनी मित्र जिसके पिता की मृत्यु पर उसकी मम्मी की शादी एक ऐसे पुरुष से हो गयी जिसके बच्चे भी उसके मम्मी से बड़े थे और मेरी सहपाठिनी को उसके पूर्व पिता की ओर से कुछ संपत्ति भी मिली थी किन्तु इस सबके बावजूद उसके चेहरे पर हर वक़्त सहमापन रहता था और आज अपनी छोटी बहन की शादी वह ही करवा चुकी है ओर स्वयं सरकारी नौकरी कर रही है किन्तु उसके सौतेले पिता को उसकी जिंदगी की कोई सुध नहीं.
          मेरा तो यही कहना है कि जब भी सौतेले शब्द का जिक्र हो तो केवल वही बुराई का केंद्र बिंदु हो न कि सौतेले माँ या बाप.क्योंकि जहाँ एक ओर अब्राहम लिंकन की सौतेली माँ की महानता हमारे सामने है वही सौतेले बाप द्वारा कई बच्चों को गंडासे से काटने के उदहारण भी हमारे समक्ष हैं.
                शालिनी कौशिक 

बुधवार, 8 जून 2011

जीवन की सच्चाई से हम बने रहे अंजान

नैनों में अश्रु बन छाया,होठों पर मुस्कान,
जीवन की सच्चाई से हम बने रहे अंजान

जीवन में सब पाने की जब अपने मन में ठानी,
तभी सामने आ गयी जीवन की बेईमानी .

देने को हमें कुछ न लाया ये जीवन महान,
जीवन की सच्चाई से हम बने रहे अंजान,

हमने जब कुछ भी है चाह हमें नहीं मिल पाया,
जो पाया था इस जीवन में उसे भी हमने गंवाया,

फिर क्यों हालत देख के अपनी होते हैं हैरान,
जीवन की सच्चाई से हम बने रहे अंजान.
                  शालिनी कौशिक 

मंगलवार, 7 जून 2011

आदमियों को हैवान बनाती जिस्मानी भूख‏

आजकल दुनिया में महिलाओं से सम्बन्धित जिस जिस तरह के दर्दनाक वाकये सुनने में आ रहे हैं,से ये बात बखूबी साबित हो जाती है कि जिस्मानी भूख मिटाने के लिए आदमी हैवानियत कि किसी भी हद तक जा सकता है|आदम जात के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या होगी कि उनके कारण दूध पीती बच्चियां तक सुरक्षित नही हैं आज|हाल ही में कुरुक्षेत्र की स्वीटी के साथ जो कुछ भी हुआ,आदम जात की दरिंदगी का अब तक का सबसे भयानक चेहरा है| 23 दिनों की मशक्कत  के बाद हरियाणा की बदनाम पुलिस ने हत्यारों को पकड़ तो लिया अब सवाल ये उठता है कि इन हत्यारों को उनके किये की मुक्कमल सज़ा मिल पायेगी|क्या स्वीटी को सही में न्याय मिल पायेगा|हर किसी की जुबान पर ये सवाल हैं|क्योंकि भारतीय न्याय व्यवस्था पर लोग विश्वास नही करते| इससे भी पहले कई हादसे ऐसे हो चुके हैं जिनमे आदम जात ने अपनी हैवानियत के नमूने पेश किये हैं| कुछ दिन पहले नई दिल्ली राजधानी से एक युवक द्वारा एक युवती का शव अजमेर पार्सल करने का मामला सामने आया था| पुलिस मामले की जांच में जुटी हुई है| इस मामले में पुलिस जांच बेशक किसी भी दिशा में जा रही हो, मगर इस दौरान सामने आए तथ्य चौंकाने वाले हैं। अकेले दिल्ली में मार्च में 18 से 30 आयु वर्ग की डेढ़ सौ से अधिक युवतियां लापता हो चुकी हैं।
दिल्ली में ही नही देश भर में लगभग सभी राज्यों में हर महीने इस तरह की घटनाएँ होती रहती हैं|कभी बलात्कार तो कभी अपहरण|बालिग़ ही नही नाबालिग यहाँ तक की छोटी छोटी बच्चियों तक को ये दर्द झेलना पड़ता है| पुलिस अधिकारी तर्क देते हैं कि बालिग युवतियों अपनी मर्जी से कभी प्रेम प्रसंग तो कभी परिवार से नाराज होकर घर छोड़ देती हैं। लेकिन यही एकमात्र कारण नही हो सकता महिलाओं के प्रति इन अपराधो का|महिला संगठन और लोग इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि सभी लडकियां तो अपने आप घर नही छोडती या प्रेम प्रसंग में नही होती| इसके पीछे कोई गहरी साजिश होती  है।क्योंकि हाल ही में उजागर हुए युवतियों को बहला-फुसलाकर बेचे जाने के कई मामले भी कुछ इसी तरफ इशारा कर रहे हैं। मार्च में दिल्ली से जो 153 युवतियां लापता हुई हैं। सभी बालिग थीं। जबकि दिल्ली पुलिस का कहना है कि बालिग के लापता होने के पीछे अक्सर प्रेम प्रसंग या परिवार से अनबन की वजह सामने आती हैं। प्रेम विवाह के लिए युवतियां परिवार को बिना बताएं अचानक लापता हो जाती हैं। कई मामलों में कुछ माह बाद ऐसी युवतियां वापस लौट आती हैं। नौकरी या फिल्मों में कैरियर तलाशने के लिए भी मुंबई भागने के मामले भी सामने आ चुके हैं। राजधानी में बालिग युवतियों के लापता होने के पीछे कोई संगठित या अपराधी गिरोह सामने नहीं आया है।लेकिन इस बात को कोई भी हजम नही क्र प् रहा कि इतने बड़े पैमाने पर लापता हो रही युवतियां अपनी मर्जी से घर छोड़कर जा रही हैं या प्रेम प्रसंग में होती हैं। एक-दो मामलों को छोड़ दें तो अधिकांश युवतियां एक बार लापता होने के बाद लौटकर नहीं आतीं। 
अगर और राज्यों की बात करें तो हाल ही में उत्तर प्रदेश से नौकरी की तलाश में दिल्ली आई 19 वर्षीय युवती का मामला दो दिन पुराना ही है। रेलवे स्टेशन पर एक बुजुर्ग ने नौकरी दिलाने में मदद करने के बहाने उसे दो युवकों के हवाले कर दिया। तीन माह तक दोनों युवकों ने उसे कभी पानीपत, कभी नोएडा तो कभी सीमापुरी इलाके में बंधक बनाकर रखा। इस दौरान उसके साथ दुष्कर्म भी किया गया। किसी तरह मामला पुलिस तक पहुंचा तब जाकर सीमा को मुक्त करा दोनों आरोपियों को दबोचा गया। इसी प्रकार दक्षिण दिल्ली में नौकरी के नाम पर बिहार से लाई गई युवती से भी दुष्कर्म व उसे बेचने की कोशिश में एक गिरोह पकड़ा जा चुका है। पति का इलाज कराने आई बिहार की एक महिला को गिरोह ने हरियाणा के गांव में बेचकर उसकी शादी तक करा दी थी।
कहा जा रहा है कि इन मामलों में पुलिस को गंभीर होने की जरूरत है। अब यहाँ महत्वपूर्ण सवाल ये उठता है कि न्याय दिलाने वाले या रक्षक कही जाने वाली यह पुलिस खुद कितनी साफ छवि वाली है|या कहें तो इन सब के लिए जिम्मेवार कौन है|क्योंकि महिलाओं के प्रति दुष्कर्म यौन उत्पीडन जैसी शिकायतें तो पुलिस वालों के खिलाफ भी होती हैं|जबकि वास्तविकता ये है कि इन सबके लिए जिम्मेवार है आदम जात|चाहे वो किसी भी रूप में हो|पुलिस कर्मी हो या नेता हो|राह चलते गुंडे हों या प्रेम प्रसंग में युवतियों को फसाते मनचले लड़के|हैं तो आदम जात के ही और सभी वहशीपन के शिकार हैं|लड़की या औरत दिखी नही कि उनका मन मचलने लगता है|तब तो ये रिश्तों कि मयादा को भी दाव पर लगा देते हैं|और तो और इन्हें मार कर शव को पार्सल कर देने,जला देने,दफना देने या छुपा देने या फैंक देने जैसे जानवरों वाली हरकतें तक कर देते हैं|मतलब उस समय तो उनमे इंसानियत नाम की कोई चीज़ भी नही रह जाती|  
ऐसे में कहाँ तक महिलाएं खुद को सुरक्षित मान सकती हैं|आखिर किस किस तरह के कानून बनाकर सरकार इन्हें सुरक्षा दे सकती है जबकि सरकार के अपने बाशिंदे ही इन्हें नही छोड़ते|जरूरत कानून की या सुरक्षा दे देने की ही नही है|जरूरत है अपनी सोच बदलने की|इंसान बनने की|रिश्तों की मर्यादा समझने की और अपनी मर्यादा रहने की|केवल औरत जात को ही जिम्मेवार ठहरा देने से कुछ नही होगा|आदम जात को खुद पर भी काबू रखना होगा|तभी आदम जात बदनाम होने से बच पायेगी वरना वो दिन दूर नही जब लोग बेटों का पैदा होना भी बोझ समझने लगेंगे|
खुशबू(इन्द्री)करनाल    




खुशबू  जी  का  ये  आलेख भी मुझे इ-मेल से प्राप्त हुआ है और उनके हर आलेख की तरह यह भी सूचनाओं का भंडार है.आप अपनी प्रतिक्रियाओं से खुशबू जी को निम्न इ-मेल पर भेज सकते हैं-
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शनिवार, 4 जून 2011

इन्हें कुछ मत दें.....

आजकल सडको पर जब हम जाते हैं तो झोले लटकाए टीका लगाये कभी गंदे कपड़ों में तो कभी साफ कपड़ों में कुछ आदमी और कुछ औरतें दिखाई दे जाती हैं.कभी कभी बच्चे भी दिखाई देते हैं और इन सभी का एक ही मकसद होता है जहाँ से भी मिले जैसे भी मिले पैसे बटोरना.हमारे घर के पास कुछ दुकाने  हैं और दोपहर १२-०० बजे के करीब वहां ५-६ लोग आते हैं और हर दुकान में घुसते हैं और जो निश्चित कर रखे हैं १-१ रुपैया लेकर निकलते हैं.ऐसे जैसे शहरों में हफ्ता बंधा होता है ऐसे ही कस्बों में लगता है कि हर दिन का दुकानदारों पर कुछ जुर्माना बांध दिया गया है.अभी कल ही की बात है हम अपने डॉ.अंकल के क्लिनिक पर थे कि एक औरत वहां आई और उसने उनसे कुछ कहा भी नहीं और वे अपने मेज की दराज में कुछ ढूँढने लगे.थोड़ी देर में हमने देखा कि वे उसे दो रूपए देकर उससे एक रूपया ले रहे थे.ऐसा लगा कि ये उनकी क्लिनिक का भी रोज़ का ही प्रचलन हो गया है.
और हम और आप दोनों ही इसके लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि जब हम एक को मांगने पर इस तरह पैसे देते हैं तो उसे देख दुसरे का भी हाथ अपनी और अनचाहे ही बढवा लेते हैं.हम अपने यहाँ घर से किसी भी मांगने वाले को पैसे नहीं देते हाँ अगर कोई भूखा दिखाई देता है तो उसे ज़रूर कुछ खाना दे देते हैं और और इसका ही ये परिणाम है कि हमारे घर इस तरह के लोगों का ताँता नहीं लगता जबकि पास पड़ोस में झोले लटकाए हठे-कट्टे दिखाई देते है रहते हैं .ये तो हम सभी जानते हैं कि ये लोग केवल मांगने के लिए ही नहीं घुमते हैं बल्कि इनका मकसद जैसे भी हो कुछ हासिल करना होता है और इस तरह हम इन्हें स्वयं योगदान दे रहे हैं.एक बार तो हमारे घर में एक औरत कुछ मांगने को घुसी मैंने उसे बाहर ही मना कर दिया और अन्दर आ गयी किन्तु हमारा घर ऐसे है कि उसका गेट कभी दिन में बंद नहीं होता तो वो मेरे अन्दर आने पर घर के और भी अन्दर जाने लगी मैंने उसे रोका तो वो भड़क कर बोली-कमबख्त टोक दिया ''भला मैं उसे अपने घर में जाने से रोक रही थी या उसके किसी प्लान में रोक लगा रही थी''.आज कल ऐसे घटनाएँ बढरही हैं और ये हमारी भलमनसाहत और लापरवाही ही है जो घरो में लूट डकैती की घटनाये बढ़ा रही है एक ओर तो हम इन लोगों को पैसे देकर समाज में भिखारी बढ़ा रहे हैं और दूसरी ओर इन्हें अपने घरों में घुसने के नए रस्ते दिखा रहे हैं .इधर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पूरे परिवार के सफाए की घटनाये बढ़ रही हैं और इन सभी घटनाओ में हमारी लापरवाही भी एक महत्वपूर्ण तत्त्व है ऐसे में हमें अगर अपने घरों में ऐसी घटनाये रोकनी हैं और समाज को भिखारियों से बचाना है तो इन्हें पैसे दे पुण्य कमाने की प्रवर्ति पर रोक लगानी होगी.
         शालिनी कौशिक 

गुरुवार, 2 जून 2011

प्रतिबंध के बावजूद कुले आम बिक रहे प्लास्टिक पैकिंग में गुटखे, अधिकारी और प्रशासन बने मूकदर्शक‏: खुशबू(इन्द्री)करनाल


यूँ तो भारत सरकार देश की सामाजिक व्यवस्था में सुधार करने के उदेश्य से आये दिन कोई न कोई कानून बना कर लागू  करती रहती है|  पर इस सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की बदकिस्मती देखिये की यहाँ कानून लागू  कर दिए जाते हैं लेकिन दिखावे के लिए क्योंकि उनका पालन सुनिश्चित नही कराया जाता|कहीं पर लोग कानून का पालन नही करते तो कहीं  पर खुद प्रशासनिक अधिकारी|लोगों को तो क्या कहें सबसे बड़ी खामी प्रशासन की है|हमारे अधिकारी कानूनों का सख्ती से पालन करने के लिए प्रतिबद्ध नही हैं|उन्हें बैठे बैठे खाने की आदत है|एक बार कानून बना दिया और लागू कर दिया बस यहाँ उनकी जिम्मेवारी खत्म हो जाती अहि|जबकि कानून लागू  हो जाने के बाद उसकी पालना सुनिश्चित करना भी उनकी जिम्मेवारी है|आजकल देश में प्लास्टिक पैकिंग पर तथा प्लास्टिक पोलीथिन के प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा हुआ है|  सुप्रीम कोर्ट ने भी आदेश जारी कर इस पर प्रतिबंध लगाया है|लेकिन सुप्रीम कोर्ट के प्लास्टिक गुटखा पैकिंग के प्रतिबन्धित करने के बाद से गुटखा के थोक व फुटकर विक्रेताओं की चांदी हो गई है।जिसके चलते फुटकर विक्रेताओं ने एक रूपये प्रिंट वाला गुटखा खुलेआम दो रूपये से लेकर तीन रूपये मे बेचा जा रहा है।वहीं 20रू0 प्रिंट वाला रजनीगन्धा 25रू0 में बिक रहा है एक दुकानदार संजय ने बताया कि हम क्या करें हमें तो थोक विक्रेता ही प्रिंट से अधिक रेट पर माल देता है साथ ही अधिक माल भी नहीं देता जिस कारण गुटखे व पान मसाले खैनी आदि की हमेशा कमी बनी रहती है। कानूनन कोई भी दुकानदार किसी भी वस्तु को अंकित मूल्य से अधिक मूल्य पर नहीं बेच सकता किन्तु यहां पर सारे कानून बेकार साबित हो रहें हैं।आखिर क्यो नहीं हो पा रही है इन गुटखाओ के थोक व फुटकर विक्रेताओं के विरूद्ध कार्यवाही? पुरे जनपद में बिक रहे हैं अनेको प्रकार के गुटखे भी अब महंगे हो गए हैं,जिसके कारण गुटखा खाने वाले लोग चूने वाली तम्बाकू या फिर कपूरी खाने को विवश हैं। कुछ समय पूर्व गुटखे की किमत 50पै0 या 1रू0 का एक पाउच थी लैकिन अब जबसे सर्वाेचय न्यायालय के आदेश से प्लास्टिक पाउच की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगा है तब से एक रूपये का गुटखा तीन रूपये या उससे अधिक में बिकने लगा है। ग्रमीण क्षेत्रों मे तो एक गुटखा चार या पॉच रूपये में भी बिकते हैं वहीं कस्बो में 10रू0 के 3 गुटखे भी मिल जाते हैं महंगे गुटखो के चलते जो लोग दिन में 20 से 30गुटखे खाते थे उन्हें आज दिन में 5-6 गुटखो से गुजारा करना पड रहा है। कुछ विक्रेताओं ने बताया की महंगाई के कारण गुटखों की बिक्री चौथाई ही रह गई है,गुटखे महंगे होने से कपूूरी व पान की बिक्री अधिक होने लगी है। पूर्व प्रधान उमेश चन्द्र ने बताया गुटखा के ब्लैक मे बिकने से जहां गुटखा खाने वालो की जेब पर डाका पड रहा है वहीं महंगाई के चलते 50 गुटखे प्रतिदिन खाने वाले लोग 5 गुटखा प्रतिदिन खाने लगे है जो गुटखा खाने वालो के स्वास्थ्य के लिए काफी हीतकर है इंसानो के लिए गुटखा रोकने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि सरकार को प्रति गुटखा 10रू0 मैं बिकवाना चाहिए जिससे गुटखे की  बिक्री न के बराबर रह जाएगी।
खुशबू(इन्द्री)करना

ख़ुशी जी के आलेख मुझे इ-मेल के जरिये प्राप्त होते हैं और ये जानकारियों का भंडार हैं और आज ये प्रसन्नता की बात है की अमर उजाला हिंदी दैनिक की रूपायन मेग्जिन  में ख़ुशी जी के ''भूखे  पेट सोना पड़ता है ''आलेख को मेरे ब्लॉग कौशल से लिया गया  है ये मेरे लिए प्रसन्नता की बात है क्योंकि ख़ुशी जी के आलेख ने मेरे ब्लॉग का सम्मान बढाया है.ख़ुशी जी का मैं हार्दिक धन्यवाद् करती हूँ.
           
शालिनी कौशिक 

बुधवार, 1 जून 2011

माँ को शीश नवाना है.



होगा जब भगवान् से मिलना हमें यही तब कहना है,
नमन तुम्हे करने से पहले माँ को शीश नवाना है.

माँ ने ही सिखलाया हमको प्रभु को हर पल याद करो,
मानव जीवन दिया है तुमको इसका धन्यवाद् करो.
माँ से ही जाना है हमने क्या क्या तुमसे कहना है,
नमन तुम्हे करने से पहले माँ को शीश नवाना है.

जीवन की कठिनाइयों को गर तुम्हे पार कर जाना है ,
प्रभु के आगे काम के पहले बाद में सर ये झुकाना है.
शिक्षा माँ की है ये हमको तुमको ही अपनाना है,
नमन तुम्हे करने से पहले माँ को शीश नवाना है.

माँ कहती है एक बार गर प्रभु के प्रिय बन जाओगे,
इस धरती पर चहुँ दिशा में बेटा नाम कमाओगे.
तुमसे मिलवाया है माँ ने इसीलिए ये कहना है,
नमन तुम्हे करने से पहले माँ को शीश नवाना है.
               शालिनी कौशिक 

राजीव गांधी :अब केवल यादों में - शत शत नमन

एक  नमन  राजीव  जी  को  आज उनकी जयंती के अवसर  पर.राजीव जी बचपन से हमारे प्रिय नेता रहे आज भी याद है कि इंदिरा जी के निधन के समय हम सभी क...